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उदय भाग २८

उदय भाग २८

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इस बार की उदय की तालीम काफी कठिन थी लेकिन अब उदय का जोश पहले से कुछ अलग था। असीमानंद से मिली हार और उस हार के बावजूद भभूतनाथ जी ने उसमे दिखाया हुआ विश्वास ही उसके प्रेरणास्तोत्र थे। वो मानसिक रूप से भी तैयार हो रहा था की अब अगर असीमानंद से सामना हो तो वो उसका मुकाबला बेहतर तरीके से कर सके। सबसे पहले उसे भावनाओं पर नियंत्रण करना सिखाया फिर उसे रूप बदलने की कला, जिसमे सब से कठिन था जिसका रूप लिया हो उसके हावभाव और आवाज़। वो अब रूप बदलने की कला में माहिर हो चुका था और उसे सिखाया गया अलग अलग प्राणी और पक्षी की आवाज़ की नक़ल करना।

तालीम में उसे अजीब अजीब हथियार चलाना सिखाया गया जो उसने अपने जीवन काल में कभी नहीं देखे थे उसमे उसका पसंदीदा हथियार था खांडव जो की भाला और कुल्हाड़ी का मिश्रण था एक तरफ भाला और दूसरी तरफ दोनों और निकली हुई कुल्हाड़ी। वो खांडव चलाने में इतना माहिर हो गया था की वो इसे जब घुमाता था तो कोई तीर उस तक नहीं पहुंच पता था। उसे शक्तिपात करना भी सिखाया गया।

दस दस घंटे की तालीम के बाद सिर्फ दो घंटे की नींद लेता था। इन सारी तालीमों के साथ में वो योगाभ्यास के लिए भी समय निकालता था। तीन दिन के अंत में अगले दिन की योजना की चर्चा के लिए भभूतनाथ ने उदय को बुलाया। उन्होंने योजना समझाते हुए कहा की "अभी रावण के औजार की शुद्धि की विधि चल रही है जिसमे सब से आखिर में एक कंवारी स्त्री की बलि देंगे उसके लिए वो लोग एक स्त्री को अपहरण करके लाये भी है। तुम्हारा काम होगा की वहां जाकर उस स्त्री का रूप धारण करके जब बलि देने ले जाये तब औजार पर इस हथियार से वार करना ऐसा कहकर एक तलवार दिखाई। इससे जब वार करोगे तो वो औजार नष्ट हो जायेगा। बरसों पहले महाशक्ति ने महाराजा राम नाम से जन्म लिया था तब उनके छोटे भाई लक्ष्मण को उन्होंने ये दी थी। और लक्ष्मण ने युद्ध के अंत में मुझे पुरस्कार के रूप में दी थी। इस धरती पर यही एक हथियार है जिससे उस औजार को अप्रभावित किया जा सकता है क्योंकि ये तलवार कुछ अलग धातु की बनी है। और एक बात इस तलवार का उपयोग सिर्फ रावण के औजार पर करना किसी व्यक्ति पर या असीमानंद पर मत करना। अगर उससे युद्ध करने की नौबत आये तो खांडव या उरुमी का उपयोग करना। लक्ष्मण जी की तलवार को अपवित्र मत करना।

इस अभियान में तुम्हारी मदद सर्वेश्वरनाथ करेंगे।"

अगले दिन सर्वेश्वरनाथ और उदय जरायु की बस्ती की तरफ प्रस्थान किया। सर्वेशेवरनाथ ने कहा की "इस तरह चलकर जाने में तो काफी समय लगेगा।" उदय ने कहा की "तो फिर दौड़कर चलते है और फिर दौड़ना शुरू किया।" घंटो तक दौड़ने के बाद वो लोग एक पहाड़ी के पास पहुंचे जिसके पीछे वो बस्ती थी। अभी उजाला नहीं हुआ था, बस्ती के प्रवेशद्वार के नज़दीक एक पेड़ पे चढ़ गए और निरिक्षण करने लगे। उन्होंने अद्वैत को प्रवेश द्वार पे उल्टा लटका हुआ देखा। थोड़ी देर बाद उस प्रवेश द्वार से दो लोगो को निकलते हुए देखा, उदय और सर्वेश्वरनाथ की नजर मिली और उनका पीछा करके उन दो व्यक्तिओ को बेहोश कर दिया फिर उनका रूप लेकर बस्ती में प्रवेश कर गए। अब उन्हें ढूंढनी थी वो गुफा जिसमे शुद्धिकरण की विधि चल रही थी। काफी देर ढूंढने पर भी गुफा नहीं मिली तो उन्होंने एक व्यक्ति को सम्मोहित करके साथ ले लिया। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा की "जिसकी बलि देनी है वह स्त्री कहाँ है" तो वो उन्हें एक कुटिया की तरफ ले गया। वो कुटिया गुफा के ठीक बगल में थी। फिर वो दोनों उस कुटिया में प्रवेश कर गए अंदर जाकर उन्होंने देखा एक युवती को एक खूंटे से बांध रखा है। जब युवती ने उन दोनों को देखा और चिल्लाने जा रही थी तो सर्वेश्वरनाथ ने उसका मुँह अपने हाथ से ढँक दिया और अंग्रेजी में कहा की "हम तुम्हें बचने आये है।" वो उसकी बात समझ तो नहीं पाई लेकिन यह समझ गई के ये दोनों उसे नुकसान नहीं पहुँचाने वाले। थोड़ा पानी पीने के बाद वो लड़की जर्मन भाषा में पूछा की "मैं कहाँ हूँ ?" अगर कुछ समय पहले की बात होती तो उदय को कुछ समझ में नहीं आता लेकिन अब वह काफी सारी भाषाएँ बोल व समझ लेता था। उदय ने जर्मन भाषा में जवाब दिया की "आप अफ्रीका में है और एक कबीले में फँस गई है, ये आदमी आपको आपके घर पे पहुंचा देगा।" इतना कहकर उसे बेहोश कर दिया और सर्वेश्वर नाथ को उसे सही जगह पहुंचाने को कहा। फिर उदय ने उस लड़की का रूप लिया और उस लड़की की जगह पर खुद बंध गया और सर्वेश्वर नाथ लड़की को कंधे पर डालकर वहां से निकल गया।

अब उसे इंतजार था असीमानंद का।


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