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हरि शंकर गोयल

Comedy

4  

हरि शंकर गोयल

Comedy

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता

10 mins
256


अपने घुटन्ना मित्र हंसमुख लाल जी का फोन आया कि भाईसाहब कल से सुबह घूमने चलेंगे । मुझे बड़ा अच्छा लगा कि आखिर में हंसमुख लाल जी को अक्ल आ ही गई । चलो , देर आयद दुरस्त आयद । शुभ कार्य कभी भी किया जा सकता है । सुबह सुबह हम दोनों दोस्त सैर के लिए निकले । जैसे ही गेट से बाहर निकले तो देखा कि घर के बाहर सड़क पर लाइन से गाड़ियां खड़ी हैं । लोग भी बड़े अजीब हैं । घर बनाते वक्त ना तो सैट बैक छोड़ते हैं और ना ही पार्किंग के लिए गैराज बनवाते हैं । गाड़ियों का शौक इतना रखते हैं कि एक एक घर में दो दो कार दो दो मोटरसाइकिल खरीद लेते हैं पर रखने को जगह नहीं है । इसलिए ये सब वाहन सड़क पर ही खड़े होते हैं । 30 फुट की सड़क 10 फुट की रह जाती है । उस पर तुर्रा यह कि गाड़ी भी आड़ी तिरछी खड़ी करते हैं । यदि किसी को कुछ कह दो तो वह "भौंकना" शुरू कर देता है । सच में ऐसा लगता है कि आजाद भारत में लोग पूरी तरह आजाद हैं । 

कुछ आगे चले तो एक दो महाशय अपने अपने "डॉगी" के साथ मॉर्निंग वॉक करते नजर आये । उन्हें देखकर हंसमुख लाल जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे "लोग कितने जागरूक हो गये हैं । अपने साथ साथ डॉगी को भी मॉर्निंग वॉक करा रहे हैं" 

हंसमुख लाल जी के भोलेपन पर मुझे हंसी आ गई । मैंने कहा "वे डॉगी को मॉर्निंग वॉक नहीं करा रहे , वे उनका 'नित्य कर्म ' कराने के लिए आये हैं" 

"तो क्या सड़क पर ही" ? 

"हां , और कहां करायेंगे ? सड़क तो सबके बाप की है न । जो मर्जी आये वही काम करेंगे" 

"क्या इन लोगों में अक्ल की कमी है" ? 

अबकी बार फिर से हंसी आ गई मुझे "ये डेढ़ होशियार लोग हैं । गरीब आदमी अपने परिवार का पेट पाल ले, उतना ही बहुत है । कुत्तों को मंहगे मंहगे बिस्किट कहां से लाए ? ये तो ज्यादा पढे लिखे , अमीर , आधुनिक, पशु प्रेमी लोग हैं जो कुत्ते पालते हैं । ये लोग इंसानों को तो "काट" खाने को दौड़ते हैं पर कुत्तों पर जान छिड़कते हैं । चिकन, मटन खाने के बाद कुत्ता पालकर अपने पापों का प्रायश्चित कर लेते हैं । सड़क पर कुत्ते को पॉटी करवाते हैं और स्वच्छता पर ज्ञान बघारते हैं" । घृणा से हम दोनों ने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया । 

थोड़ा आगे चले तो देखा कि कल सड़क पर जो हाईलाइटर्स नगर निगम ने लगवाये थे, उनमें से आधे गायब थे । हंसमुख लाल जी बोले "इनको सड़क निगल गई या आसमान खा गया" 

"दोनों ही निर्दोष हैं बेचारे । दरअसल इन्हें दारू निगल गई" 

"दारू ? वो कैसे" ? उन्होंने आश्चर्य से पूछा 

"लोग इन हाईलाइटर्स को उखाड़ कर कबाड़ी को बेच देते हैं और उन पैसों की दारू पी जाते हैं । रात को दारू के नशे में स्ट्रीट लाइट पर पत्थर से निशाना लगाकर ओलंपिक में शूटिंग का गोल्ड मेडल लाने की तैयारी करते हैं । कभी कभी तो बाहर खड़ी गाड़ियों पर हॉकी से भरपूर प्रहार करके अपनी हॉकी की तैयारियों को भी जता देते हैं । आजाद भारत के आजाद लोग हैं भई । सब अपनी मर्जी के मालिक । जो चाहते हैं वही करते हैं । कोई रोक टोक पसंद नहीं हैं इन्हें । ये सड़क देख रहे हो ? कितनी चौड़ी लग रही है अभी । मगर दस बजे बाद यह एक पगडंडी सी लगने लगती है । पता है क्यों" ? 

उन्होंने इंकार में सिर हिला दिया । हमें बताना पड़ा "सड़क के दोनों ओर दुकानें हैं । जब ये दुकानें खुलती हैं तो दुकानदार अपनी दुकानों के आगे अपना सामान लगा देते हैं । अपने और ग्राहकों के वाहन भी वहीं खड़े करते हैं । रही सही कसर "ठेले वाले" पूरी कर देते हैं । यह 80 फुट की सड़क मुश्किल से 20 फुट की रह जाती है जिससे यहां आये दिन जाम लगा रहता है" 

"सरकार कुछ करती क्यों नहीं" ? 

"सरकारों को इन दुकानदारों के वोट नहीं लेने हैं क्या" ? 

मैं कुछ कहता इससे पहले ही सामने से एक कार वाला रेड लाइट में ही कार को दौड़ाता हुआ मेरे बगल में से निकाल कर ले गया । मैं बाल बाल बच गया । 

"ये क्या है भाईसाहब ? ट्रैफिक नियम भी कोई चीज है कि नहीं" ? 

"मैंने कहा ना कि हम आजाद देश के आजाद नागरिक हैं । मनमर्जी करते हैं । नियम कानून ताक पर रखते हैं । ट्रैफिक नियम तो होते ही तोड़ने के लिए हैं । ज्यादातर दुर्घटनाऐं इसीलिए होती हैं कि हम ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते हैं । हैलमेट इसलिए नहीं लगाते कि इससे सिर का बचाव होगा, बल्कि इसलिए लगाते हैं कि नहीं लगाने पर चालान कट जायेगा । सीट बेल्ट भी इसीलिए लगाते हैं । बीच सड़क पर गाड़ी खड़ी करके बातचीत में मशगूल हो जाते हैं या शॉपिंग करने लग जाते हैं । आखिर पूरे आजाद लोग हैं हम । अगर पुलिस रोके टोके तो उसी पर पिल पड़ते हैं और अपनी आजादी का प्रमाणदे देते हैं" । 

"वो आप कुछ कह रहे थे दुकानदारों के वोट के बारे में" हंसमुख लाल जी मुझे उसी जगह पर ले आये जहां मैंने टॉपिक छोड़ दिया था । 

"वोट बहुत बड़ी चीज है लोकतंत्र में । सरकार वोटों से ही बनती है इसलिए एक एक वोट कीमती है । वोटों के लिए क्या क्या नहीं करते हैं नेता और राजनीतिक दल ? आतंकवादियों तक की पैरवी करते हैं , उन पर चल रहे देशद्रोह के मुकदमे वापस ले लेते हैं । संविधान बनाते समय आरक्षण केवल 10 वर्ष के लिए ही लागू किया था मगर आजादी के 75 सालों बाद आज भी न केवल लागू है बल्कि और बढ रहा है । वोटों की खातिर ही ना ? 

लोग वोट किस आधार पर देते हैं ? क्या वे यह सोचते हैं कि कौन सी पार्टी देश का ईमानदारी से सबसे ज्यादा विकास करवायेगी ? लोगों को देश और विकास से कोई लेना देना नहीं है । वे तो यह देखते हैं कि उनका फायदा किसमें है ? अब अपने 'फोकट राम' जी को ही देख लो । मालूम है उन्होंने किसे वोट दिया ? जो "मुफ्त" में बिजली, पानी देने का वादा कर रहे थे , उन्हीं को वोट दे आये । उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ऐसी पार्टियां देश का कितना नुकसान कर रही हैं । उन्हें तो बस इतना पता है कि 100 यूनिट बिजली और 10000 लीटर पानी मुफ्त मिल रहा है । वे इसके लिये किसी "गधे" को भी वोट दे सकते हैं । वो अपने चौधरी जी हैं ना, बैंक वाले , वे अपनी जाति वाले को ही वोट देते आये हैं अब तक ,चाहे वह अनपढ, अपराधी, भ्रष्ट ही क्यों न हो ? और वो अपने रहीम चाचा हैं ना , उन्हें विकास , आजादी , शिक्षा आदि से कोई मतलब नहीं है । उनका वोट एक अलग ही पैमाने पर पड़ता है । वो अग्रवाल साहब हैं ना , उनको कभी वोट देते देखा है क्या" ? 

"नहीं , कभी नहीं । पर ऐसा क्यों" ? 

"उनकी सोच है कि वोट देने जाने पर दुकान बंद करनी पड़ेगी । वोट देने से उन्हें क्या मिलेगा , बल्कि दुकान बंद करने से 'अमुक' राशि का नुकसान हो जायेगा ? इसलिए वे वोट डालने जाते ही नहीं हैं । 

वो पाठक साहब की दलील बिल्कुल ही अलग है । वे एक आला अधिकारी हैं और एक आला अधिकारी वोट की लाइन में लगेगा क्या ? अब आप ही बताइए कि एक चपरासी और एक आला अधिकारी एक साथ आगे पीछे लाइन में कैसे खड़े हों ? फिर उनके तो ऑफिस, घर और गाड़ी सबमें सरकारी AC लग रहा है । वोट के लिए तो धूप में खड़ा होना पड़ता है । फिर हर आदमी यह सोचता है कि एक वोट से क्या फर्क पड़ जायेगा ? बस इसी बात का फायदा ये नेता और दल उठाते हैं और जो लोग थोक में जाति धर्म के नाम पर वोट देते हैं, ये उनकी जायज नाजायज सभी बातें मानते हैं, उनके देवरा पर ढोक लगाते हैं । आम आदमी जाये भाड़ में" 

इतने में हम पार्क में आ गये । पार्क के गेट पर बहुत सारी मोटरसाइकिलें इस तरह खड़ी थीं कि पार्क में अंदर जाने में समस्या आ रही थी । हंसमुख लाल जी बड़बड़ाने लगे "जब पार्क में घूमने के लिए आते हैं तो अपनी मोटरसाइकिल दस कदम दूर नहीं रख सकते थे क्या ? पर आदत ही ऐसी डाल रखी है तो क्या करें" । 

"भैया, आजाद भारत के आजाद लोग हैं इसलिए गेट से सटाकर खड़ी करते हैं" 

हम लोग पार्क में घूमने लगे । हमारे दांयें और बांयें अनेक प्रकार की बोतलें पड़ी थीं । हंसमुख लाल जी चौंके "भाईसाहब, ये बोतलें यहां कैसे पड़ी हैं" ? 

"बड़े भोले हो हंसमुख लाल जी । पार्क और सड़क को हर आदमी अपनी जागीर समझता है । जो काम घर में बैठकर करना चाहिए वो काम पार्क में करते हैं लोग । लोग इस देश की रंगीन संस्कृति जैसे रंगीन मिजाज हैं । रातों को और भी रंगीन बनाने के लिये इन बोतलों में भरा "रंगीन" पानी पीने के लिए पार्क से बढिया और कौन सी जगह मिलेगी उन्हें । रंग बिरंगी प्राकृतिक छटा देखते देखते रंगीन पानी पीकर उनकी तबीयत भी रंगीन हो जाती है । फिर वे यहीं लुढ़क कर रंगीन सपने देखने लग जाते हैं । सुबह जब आंख खुलती है तो अपने घर चले जाते हैं । इससे बीवी भी खुश और शराबी भी खुश । 

आजकल पार्क युवक युवतियों का "मिलन स्थल" भी बन गये हैं । मैं रोज शाम को सात आठ बजे भी यहां आता हूं तो देखता हूं कि पेड़ों के झुरमुट में थोड़ी थोड़ी दूर पर हर एक बैंच पर एक एक "जोड़ा" बैठा रहता है । उन्हें देखकर दिल को तसल्ली सी मिलती है कि पार्क में मोगरे और गुलाब के साथ साथ प्रेम के पुष्प भी खिल रहे हैं । तब महसूस होता है कि "फूल खिले हैं गुलशन गुलशन और फल फूल रहा है इश्क का मधुवन" । आखिर यह पीढी आजाद खयालों की है तो उन्हें शादी से पहले ही सब कुछ कर लेना है । यही तो "आजादी" है । कोई वर्जना उन्हें बर्दाश्त नहीं है । तब महसूस होता है कि हम वाकई पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, आजाद हैं । तन मन धन सबसे" । 

इस अद्भुत ज्ञान से हंसमुख लाल जी लाभान्वित हो गये और उन्होंने वादा कर लिया कि वे अब रोज मॉर्निंग वॉक पर आयेंगे और ताजी हवा के साथ साथ मेरे परम ज्ञान का सेवन भी करेंगे । 


 


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