स्वास्थ्यकर भोजन
स्वास्थ्यकर भोजन
मामा जी कनाडा से लगभग 10 साल बाद आए थे। रानी की शादी तो उनके कनाडा जाने से पहले ही हो गई थी। प्रिया और गगन की शादी के समय में वे नहीं आ पाए थे। अब 10 साल बाद जब वह भारत आए तो सबसे पहले अपनी बहन और उसके बेटे बहु से दिल्ली में मिले। अपनी बहन की छोटी बेटी प्रिया के घर बंगलुरु में भी रहने के बाद अब 3 दिन पहले ही पानीपत के गांव में रहने वाली बड़ी बेटी रानी के पास आए थे। रानी की छोटी बहन और भाई की शादी में तो वह कनाडा से आ भी नहीं पाए थे इसलिए वह सबसे पहले अपनी बहन और प्रिया के घर गए थे
मामा जी के आने की खुशी में रानी ने घर के दूध से ही बनाए हुए खोए की मिठाइयां और लड्डू मामा जी के लिए बनाए थे। भले ही उनके खेत थोड़ी दूरी पर थे लेकिन ताजी सब्जियां उनके खेत से ही आती थी।
मामा जी पानीपत आकर बहुत खुश है खाना खाते हुए मैं रानी से बोले सच कहता हूं रानी बेटा, मुझे तो लगता है जितने लोग पैसे वाले होते जाते हैं उतना ही गंदा खाना खाते हैं ऐसा आज से नहीं महाभारत काल में भी यही होता था तभी तो कृष्ण जी खाना खाने भी विदुर के ही घर गए थे। सच कहूं तो कितने सालों बाद आज तुम्हारे घर खाकर एक तृप्ति सी महसूस हो रही है।
रानी मुस्कुरा दी तभी उन लोगों के साथ बैठा रानी का बेटा पवन बोला नानाजी आप मम्मी को ऐसे ही मक्खन लगा रहे हो ना वरना प्रिया मौसी के घर तो खाना खाकर मजा ही आ जाता है। नहीं बेटा, ऐसा बिल्कुल नहीं है।
मामा जी कनाडा से लगभग 10 साल बाद आए थे। रानी की शादी तो उनके कनाडा जाने से पहले ही हो गई थी। प्रिया और गगन की शादी के समय में वे नहीं आ पाए थे। अब 10 साल बाद जब वह भारत आए तो सबसे पहले अपनी बहन और उसके बेटे बहु से दिल्ली में मिले। रानी की छोटी बहन प्रिया के घर बंगलुरु में भी रहे और अब 3 दिन पहले ही पानीपत के गांव में रहने वाली रानी के पास आए थे।
मामा जी के आने की खुशी में रानी ने घर के दूध से ही बनाए हुए खोए की मिठाइयां और लड्डू मामा जी के लिए बनाए थे। भले ही उनके खेत थोड़ी दूरी पर थे लेकिन सब्जियां उन्होंने अपने घर के बाहर ही बाग में उगाई हुई थी। उनके आते ही नींबू की शिकंजी बनाई गई थी। गेहूं तो उनके घर का ही होता था। रानी के पति भी चेन्नई में ही साइंटिस्ट थे और रानी अपने सास-ससुर के साथ रहती थी लेकिन जब से सासु मां की मृत्यु हो गई और ससुर जी की तबीयत बहुत खराब हो गई तो रानी के पति चेन्नई से नौकरी छोड़ कर घर पर ही आ गए थे और वह अपनी खेती में ही नए-नए प्रयोग करते थे। बहुत बड़े घर और खेतों के लिए उन्होंने भले ही नौकर रखा हो लेकिन रानी आज भी वैसी ही चुस्त-दुरुस्त बनी हुई थी।
सुबह सुबह उठकर मामा जी जब खेत से आए तो सरसों का साग और चूल्हे वाली मक्की की रोटी , साथ में लस्सी पी कर उनकी तो आत्मा तक तृप्त हो गई। वह रानी से कह रहे थे कि रानी तुम जो खाना खाते हो ना बड़े से बड़े अमीर लोगों को भी ऐसा खाना नसीब नहीं होता। खेत से उठकर अभी-अभी तोड़ी गई ताजी सब्जियों का तो मजा ही कुछ और है। भरवा टिंडे, लोहे की कढ़ाई में बने हुए करेले जिनमें कड़वाहट तो नाम मात्र की भी नहीं प्रत्येक सब्जी में स्वाद की भरमार थी।
पवन के मामा जी को कहने पर कि आप सिर्फ मम्मी को मक्खन लगा रहे हो ना वरना मौसी के घर जब भी मैं बेंगलुरु में गया हूं बहुत शानदार होटलों में मौसी मुझे खाना खिलाती थी। वहां पर जो भी खाना चाहता था,मौसी आनलाइन मंगवा देती थी। हर दिन बढ़िया खाना आता था। नहीं बेटा, मामा जी ने समझाया तुम्हें क्या पता कि वह सब्जियां जो तुमने मंगवाई है वह कितनी ताजी है? या कि कौन सा घी इस्तेमाल किया गया है। तुमने कभी यह बात महसूस करी है कि तुम्हारी मम्मी तुम्हारी मासी से लगभग 7 साल बड़ी है लेकिन फिर भी वह आज भी वैसे ही लग रही है जैसे कि मैं उसे 10 साल पहले छोड़ कर गया था। उतनी ही मेहनती है। क्या तुमने अपनी मौसी को नहीं देखा है उन्हें कितनी बीमारियां घेर चुकी है वह अपना ही खाना बनाने में असमर्थ है अगर मेड ना आए तो बाहर से खाना मंगवाना उसकी मजबूरी बन गई है। भोजन भले ही तुम फाइव स्टार में खा रहे हो या कि किसी ढाबे में, एसा प्यार और भावना किसी भी खाने में नहीं आ सकती।
मैं विदेश में रहता हूं और सच मानो यह बड़े-बड़े होटल जिनकी चेन पूरे संसार में है, वहां के लोग इनकी बजाय इस तरह से घर में बनाए खाने को खाने में अपनी अमीरी समझते हैं। वहां पर ऑर्गेनिक फूड ही सबसे बढ़िया माना जाता है लेकिन यह बेहद दुखदाई है कि हम जो सदा से ऑर्गेनिक ही खाते थे इस तरह से 2 मिनट में बनने वाले फास्ट फूड को खाने में फख्र महसूस करते हैं। कभी सोचा है हमारे कान्हा और हमारे सारे देवी देव 56 भोग खाते थे, खाने के लिए हर तरह की मिठाइयां उपलब्ध है लेकिन फिर भी मीठे के नाम पर चॉकलेट को पसंद करने वाले तुम लोग कभी नहीं समझ पाओगे कि असल सेहत और स्वाद तो तुम्हारे ही पास है।
मुझे तो लगता है कि वह जो घर में बना हुआ सादा , सस्ता और मौसम के अनुरूप खाना खाता है, वही वास्तव में अमीर है। और जो बहुत से पैसे खर्च करके जो होटलों से महंगे और अस्वास्थ्यकर भोजन खाते है। वह मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से भी कमजोर और गरीब ही हैं।मामा जी की बात सुनकर पवन भी एक बार सोच में पड़ गया और रानी मुस्कुरा रही थी। पवन ने सोचा था कि नाना जी जो कि खुद विदेश में रहते हैं वह तो हर समय बढ़िया-बढ़िया फास्ट फूड खाने वाले होंगे लेकिन उनकी इस तरह की बातें और सोच देखकर कुछ सोच में तो वह भी पड़ गया था।
