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Rajeev Rawat

Inspirational


5.0  

Rajeev Rawat

Inspirational


प्राश्चित - - एक कहानी

प्राश्चित - - एक कहानी

10 mins 592 10 mins 592

नवीन एयरपोर्ट से बाहर आया, तभी सामने दरवाजे पर नेहा आंटी खड़ी, उसे देखकर अपने वहां होने का अहसास करा रही थी, उसने नजरें घुमाकर देखा पापा नजर नहीं आये। यानी पापा की तबीयत अभी ठीक नहीं हुई है। तभी ड्राइवर अंकल ने उसकी ट्राली लेकर पकड़ ली। नवीन ने मुस्कराकर नेहा आंटी को नमस्ते की और नेहा आंटी ने उसे गले से लगा लिया"

-नवीन बेटा, तेरे पापा स्वयं आने की जिद कर रहे थे लेकिन डाक्टरों ने उन्हें आराम के लिये बोला था।"

"कोई बात नहीं आंटी, अब पापा ठीक हैं न?""

"एकदम ठीक हैं, बस तुम्हारे दो साल का इंतजार नहीं झेल पाये और थोड़ा सा तनाव पाल बैठे लेकिन अब वह बिल्कुल स्वस्थ्य हैं।"


कार की डिक्की में सामान सेट करने के बाद वह भी पिछली सीट पर नेहा आंटी के साथ बैठ गया और खिड़की से सर टेक कर आंखे बंद कर लीं। उसे बहुत सुकून मिला नेहा आंटी को खुश देख कर उसका गिल्ट कुछ कम हो गया। शायद नेहा आंटी ने उसे माफ कर दिया तभी तो पापा की आज भी केयर करती रहीं और आज एयरपोर्ट पर भी लेनें आयीं। उसे न जाने क्यों एक सुकून सा मिल रहा था।


उसे नहीं याद कि मां कैसी थी? उसने देखा भी तो उस उम्र में जब तक मात्र बच्चा स्पर्श की भाषा ही समझ पाता है। यही कोई आठ - नौ माह का रहा होगा वह, तब मां उसे छोड़कर अपनी नयी जिंदगी बसाने आस्ट्रेलिया चली गयीं थीं, हमेशा के लिये।अब बस उसकी जिन्दगी में पापा थे, जो डबल रोल में थे, मां भी थे और पापा भी लेकिन कभी उन्होंने कोई कमी मां की महसूस ही नहीं होने थी। रात में अपने सीने से लगाये, मेरे रोने पर बिना किसी शिकवे शिकायत के रात रात भर जागते,डाइपर से लेकर सारे काम करते।


सुबह राधा आंटी काम पर आ जाती लेकिन पापा अपनी अनुपस्थिति में पूरा चार्ट बना कर जाते और लौट कर चैक करते कि राधा आंटी ने कोई टास्क अधूरी तो नहीं छोड़ी और आने के बाद मेरे कपड़े बदलने से लेकर हर काम में बिना थकान के लग जाते। घोड़ा बन कर मुझे पीठ पर बिठाकर जब मुझे पूरे गार्डन में टपाटप घुमाते तो कई बार राधा आंटी मुझे मना करती कि - -

"बेटा, तेरे पापा थक कर आफिस से लौटे हैं, थोड़ा आराम कर लेने दे।"

लेकिन मैं कहां मानने वाला और पापा भी राधा आंटी को घर जाने का कह कर स्वयं किचिन में जाकर मेरे लिये कुछ न कुछ बना कर जबरजस्ती मुझे खिलाते और फिर खुद खा कर सीने पर मुझे लिटा कर थपकियाँ देकर सुला देते।पापा मेरे पापा कहां रह गये थे, एक अच्छे दोस्त और मां बन गये थे, इसलिये मेरे दुख से बहुत दुखी हो जाते थे। कब सोते थे पता नहीं बस उनके लिये मैं ही उनका जीवन का आधार बना हुआ था और शायद मेरे लिए पापा भी।कई बार मैंने पापा को अल्मारी से मां की फोटो को निकालकर साफ करके रोते देखा लेकिन अपने दिल की व्यथा कभी मेरे सामने नहीं लाते। कोई इतना प्यार भी कर सकता है? मैं कहां सोच पाता था।

मैं बड़ा हो गया था लेकिन पापा कहां मानने के लिये तैयार होते, कई बार मेरे देर हो जाने पर काॅलेज के दरवाजे पर खड़े मिलते क्योंकि मेरे दोस्त मुझ पर हंसते और मेरे मना करने पर घर की सामने वाली सड़क पर इंतजार में घूमते रहते। मुझ से छिपकर मेरे दोस्तों से मेरी जानकारी लेते रहते। उस समय मुझे गुस्सा भी आता था किंतु आज सोचता हूं कि वह उनका प्यार था , आखिर वह पापा थे।


धीरे - धीरे मैं बड़ा हो रहा था। अब पापा का एक काम और बढ़ गया था, मेरा बैग अपने कांधे पर लेकर मुझे स्कूल बस तक छोड़ने आते और जब तक मैं खिड़की से दिखना बंद नहीं हो जाता, पापा वहीं खड़े खड़े हाथ हिलाते रहते।

पैरेंट्स मीटिंग में सभी बच्चों के मां-पापा आते थे लेकिन मेरी तो मां थी नहीं, इसलिये पापा अकेले ही आते। मुझे अन्य बच्चों की मां को देखकर अब एक कमी सी लगने लगी थी,लगने लगा था कि काश मेरी भी मां होती।

उस दिन पैरेंट्स मीटिंग से हम लौट रहे थे तो मैंने पापा से पूंछ लिया था "पापा, मेरी मम्मी भगवान के पास क्यों चली गयीं?"

पापा खिड़की पर सर टेके कुछ उदास से नजर आये और मात्र यही बोले

"न बेटा, तेरी मां जिंदा है, बस गुस्सा होकर हमें छोड़ कर हमसे दूर चलीं गयी।"

"पापा, मां ऐसा कैसे कर सकती हैं? मां बहुत गंदी हैं ।"

"नहीं बेटा, मां को ऐसा नहीं कहते, वह तो अच्छी थीं इसलिये मेरे पास तेरे जैसा खिलौना छोड़ गयीं वरना मैं किस के सहारे पर जीता।"

उस दिन पापा का दर्द मैं समझ नहीं पाया था लेकिन जब और बड़ा हुआ तब पता चला कि पापा - मम्मी ने लव मैरिज की थी, दोनों साथ ही इंजीनियरिंग कालेज में थे लेकिन वही दीवार सामने आ गयी थी, गरीब-अमीरी की।शायद एक तरफा लव था पापा मम्मी को बहुत प्यार करते थे लेकिन मम्मी को आकर्षण था जो शादी के दो साल बाद मेरे जन्म होने के बाद मां को नौकरी की तीव्र आकांक्षा में स्वाहा होता चला गया। पापा ने मां से तीन साल मांगे थे लेकिन पता नहीं क्यों मां इतना भी नही रुक पायीं और जब मैं छै माह का था, राधा आंटी को काम पर लगा कर स्वयं मल्टीनेशनल कंपनी ज्वाइन कर ली और तीन माह में ही आस्ट्रेलिया चली गयीं और वहीं से तलाक के कागज भिजवा दिये।

पापा टूट गये थे लेकिन कभी मां की बुराई नहीं कि बल्कि हमेशा यही कहते रहे कि शायद मुझ में ही कोई कमी रही होगी वरना कोई यूं ही तो छोड़ कर नहीं जाता।

 पापा के लिए दोबारा शादी के लिये बहुत आफर आये लेकिन पापा ने मुझे सीने से लगाये सभी को मना कर दिया था। उनकी और मेरी जिंदगी में और कोई नहीं था। शायद संबधो से उनका विश्वास उठ गया था।

    जब मैं पांच साल का रहा हूंगा तभी पापा की आफिस में नेहा आंटी ने ज्वाइन किया था। नेहा आंटी जितनी सुंदर थीं उतनी ही समझदार भी। उन्होंने पापा को दिन रात मेहनत और काम करते देखा तो उनकी ओर आकर्षित हो गयीं। एक बार वह बीमार हो गयीं थीं तब पापा जी ने अपने एक कुलिग होने के कारण निस्वार्थ सेवा की थी तब पापा भी उनकी ओर आकर्षित हो गये थे लेकिन मेरे लिये सौतेली मां लाने से डरते थे।


एक दिन मेरे मित्र ने खेलते हुए मजाक मजाक में कहा "नवीन के पापा सौतेली मां ला रहे हैं और वह रानी कैकयी की तरह नवीन को निकाल देगीं और अपना नवीन बाहर भीख मांगेगा"

उसने प्रतिरोध किया था "मेरे पापा, ऐसे नहीं है और नेहा आंटी भी ऐसी नहीं हैं, वह मुझे बहुत प्यार करती हैं।"

सभी बच्चे हंसने लगे थे - -"तू तो बुद्धु है, मेरी मम्मी, शालू आंटी से कह रहीं थी कि देखना जब नयी बीबी के बच्चा होगा तो वह पहले बच्चे को प्यार कहां करेंगी।"

उस दिन मैं बहुत रोया। पापा पूंछते रह गये, रात में बुखार आ गया और पापा ठंडे पानी की पट्टी रखते रहे। मैंने ने पापा का हाथ पकड़ लिया तो पापा ने मेरी ओर देखा - -"पापा, क्या आप नेहा आंटी को मेरी सौतेली मां बनाना चाहते हैं।"

पापा मेरी हथेली सहलाते रहे और बोले -"मेरा राजा बेटा जो चाहेगा, वही होगा!"

"सच्ची पापा"मैंने उनके सीने पर अपना सर रख दिया।

"पापा, मैं आप किसी से शादी नहीं करेंगे।मुझे कोई सौतेली मां नहीं चाहिए।"

मैं उस समय नहीं समझ पाया कि कैकयी मात्र सौतेली मां नहीं होती, पन्ना धाय् ने तो अपना बेटा दूसरे की जान के लिए निछावर कर दिया था। शायद मैं औरत के दूसरे रूप को नहीं देख पाया लेकिन पापा की इच्छाओं को कभी समझ ही नहीं पाया, समझ ही नहीं सका कि किसी का साथ - सहारा जीवन में कितना जरूरी है और पापा जी ने कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि उन्हें मेरे निर्णय से दुख हुआ है और न ही नेहा आंटी ने कभी अपनी मर्यादाओं को तोड़ा और पापा के शादी के मना करने को उनकी मजबूरी को समझा।


आज जब मैं एम एस करने पापा को छोड़कर शिकागो आया, तब अकेलेपन की अहमियत को समझा कि मुझे पापा को छोड़कर आने पर कितना सूनापन लगता है जिन्दगी में और पापा पूरे छब्बीस साल से इस एकाकी पन को आफिस और मेरे प्यार में भरते रहे लेकिन कोई कोना मेरे कारण अधूरा रह गया था।

और उसके शिकागो आने के कुछ दिनों पहले की बात है, पापा सुबह सुबह ऊपर छत पर चुपचाप खड़े थे, वह समझा कि उसके जाने के कारण पापा दुखी हैं। जब वह ऊपर गया तो देखा पापा एक चिड़िया के घोंसले को दिखाते हुए बोले"

"वह देखो, नन्हें बच्चे भूखं से शोर कर रहे हैं और उनकी मां खाना लाने के लिए नीचे गयी थी और पंखे से टकराकर मर गयी।"

फिर पापा चुपचाप नींचे गये और कुछ गीले दाने दाल और गेहूं के लेकर आये और उन नन्हें नन्हें बच्चों को अपने हाथों से खिलाने लगे और ड्रापर से एक एक बूंद पानी पिलाते"धीरे धीरे बच्चे मां को तो भूल गये लेकिन पापा की पदचाप पहचानने लग गये थे और उन्हें ऊपर आते देखकर चींचीं करने लगते""कुछ दिनों बाद वह उड़ना सीख गये और एक दिन पापा ने उसे आवाज दी "नवीन बेटा, जरा ऊपर आओ"

वह तेजी से ऊपर गया ओर देखा पापा घोंसले को निहार रहे हैं, उसमें कोई चिड़िया के बच्चे नहीं थे, सभी उड़ गये थे।

मैंने पापा से कहा था कि"-पापा, इसमें इतने दुखी होनें की क्या बात है? बड़े होकर उन्हें उड़ना ही था।

उस दिन पापा ने मुझसे कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी सूनी आंखो ने मुझसे बहुत कुछ कह दिया था। उस रात को मैंने पापा के सर में बालों में तेल लगाते हुए कहा था "पापा मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इन चिड़ियों की तरह हमेशा के लिये नहीं उंड़ुगां, मैं वापिस आऊंगा।"

उस दिन पापा को पहली बार छुप कर रोते देखा था।

                    मैंनें एम एस करने के बाद भारत में ही मल्टीनेशनल कंपनी में एप्लाई किया था और मेरा वहां के लिए चुनाव हो गया था। इसी बीच मेरा कैलीफोर्निया से भी एक लैटर आ गया, सारे मित्रों ने फ्यूचर के बारे में अगाह किया, किंतु मैं अपने वायदे पर अड़ा रहा। मैंने एकाकी जीवन का कटु अनुभव किया, सारी सुविधाएं होने के बाद भी जो कमी अंदर से अपनेपन की मैं महसूस कर रहा था और पापा के लिये बैचेनी अनुभव कर रहा था।

एक दिन पापा को फोन किया और बातों बातों में नेहा आंटी और उनके परिवार के बारे में पूंछा तो पता चला कि नेहाआंटी के भाई और भाभी का एक्सीडेंट हो गया था और उनकी इकलौती बेटी को नेहा आंटी ने पाला था और अभी छै माह पहले ही उसकी शादी की थी। उसी बच्ची को अपनी बेटी मान कर उन्होंने भी शादी नहीं की थी।

मैं पापा और नेहा आंटी के पुराने दिन तो वापस नहीं ला सकता था लेकिन शायद कुछ कर सकता था। उसका गिल्ट आंसू बन कर छलक गये। नेहा आंटी ने शायद छुपकर आंसू पोंछते देख लिया "बेटा पापा की याद आ रही है?"

उसने हां में सर हिला दिया। सामने उसके बंगले का मैन गेट आ गया था, गेट पर ही पापा खड़े थे। मुस्कराते हुए वह कार के पास आये और उसे गले लगा कर रो पड़े, शायद उन्हें अपने चिड़े के वापस आने की उम्मीद नहीं थी। पापा बहुत दुबले नजर आ रहे थे।

"पापा, आपने क्या हालात बना रखी है?"

"कुछ नहीं बेटा, अब तुम आ गये सब ठीक हो जायेगा"

"हां पापा अब सब ठीक हो जायेगा।"

दूसरे दिन ही उसका जन्म दिन था। पापा ने उसके वापस आने और जन्मदिन के लिये बहुत लोगों को बुलाया था। पापा ने जो सेक्रेरीफाइज मेरे लिए किया था, अब मेरी बारी थी। केक काटा गया तब मैंने पापा से कहा कि "जन्म दिन की खुशी में पापा मुझे आपसे एक गिफ्ट चाहिए।"

पापा और सभी निमंत्रित गेस्ट मेरी ओर देख रहे थे

"पापा इस घर को मां चाहिए - - नेहा मां"

नेहा आंटी और पापा मुझे आश्चर्य से देख रहे थे कि पागल तो नहीं हो गया लेकिन नेहा आंटी के गाल गड्डों में एक अजीब सी लालिमा आ गयी थी, पापा तिरछी निगाह से उन्हें देख रहे थे।

"पापा और नेहां आंटी मैं अपनी नादानी में की गयी भूल को सुधारना चाहता हूं क्योंकि जिस एकाकी पन को मैने दो साल भोगा है, वह आप लोग सत्ताइस सालों से भोग रहे हैं। मैं अपना सच्चे दिल से प्राश्चित करना चाहता हूं। पापा आपके त्याग को कभी इन छोटी बातों से मांपा नहीं जा सकता।"

एक मिनट शांति के बाद सभी मेहमानों ने तालियां बजानी शुरू कर दी। शायद मेरा प्राश्चित उन्हें भी स्वीकार था।

                         


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