पंचम भाग 31
पंचम भाग 31
एक अजीब प्रकार का जलचर प्राणी अवधूत की ओर बढ़ता है, अवधूत आगे बढ़ता हुआ चारों ओर देख रहे थे तभी उन्हे आभास होता है की उनके पीछे भी कोई है, वह पलट कर देखते हैं तब तक वह भयंकर जीव एकदम बड़ा से मुंह खोले उनके सर पर सवार उन्हे खाने ही जा रहा था तभी अचानक उस जीव को नीचे से उठाकर कारक ऊपर की ओर ले जाता है, जीव को भी यह समझने तक की उसके साथ क्या हो रहा है, कारक उसे नदी से दूर जमीन पर ले जाकर जोर से पटकता है, तो उस प्राणी के कई टुकड़े हो जाते हैं, और उसका दिल निकल कर एक ओर फड़फड़ाने लगा था, और अचानक वह एक आकार लेने लगता है, यह देख कारक उस दिल को अपने पैरों से रौंदने लगता है, उस जीव के दिल से चीखने कि आवाज आने लगती है, और अचानक से उसमे से दो हाथ बाहर निकल कर कारक के पैर को पकड़ कर जोर से फेंकता है तो वह दूर नदी में आकर गिरता है, !!
वह दिल फिर अपना शरीर बनाने लगता है, तभी अवधूत उसे अपने हाथो में लेकर मंत्र पढ़ना शुरू करते हैं,और उस पर फूंकते हैं तो उसका हाथ गायब हो जाता है और धड़कन कम हो जाती हैं, !!
दिल से आवाज आती है, "* कौन हो तुम लोग हमे क्यों परेशान कर रहे हो, तुम लोग साधारण मानव नही हो।
अवधूत फिर से उसपर फुकता हैं तो वह चीख पड़ता हैं,,!!
अवधूत उस से कहता है, *" तुम तो शैतान हो मुझे पता है, तुम लोग यहां किस इरादे से आए हो।
वह कहता है, ** आज पूर्णिमा के दिन स्नान करने वालो में सौ लोगो का मैं रक्त पान करूंगा तो मेरी शक्तियां बढ़ जाएगी और मैं बेताल हो जाऊंगा, और फिर मैं किसी एक कोने में अपना स्थान बना कर राक्षस बनाने के लिए साधना करूंगा, मुझे इस तरह दानव बनना है, पर मैं यह देख रहा हूं लोग हमसे बड़े दानव हैं।
अवधूत उस पर फिर से मंत्र पढ़कर फुकता है तो वह फिर चीख पड़ता है, और कहता है, *" तुम लोग कौन हो, और हमसे तुम्हारी क्या शत्रुता हैं,*"!!?
उसी समय उसी प्रकार के दो जलचर को लाकर चरक पटकता है, उनका भी वही हाल होता है, !!
अवधूत कहता है, *" उसके दिल को मौका दिए बिना वलय कवच में बंद कर दो, और भेज दी नर्क में।
चरक तुरंत ही मंत्र पढ़कर वलय कवच में दोनो दिलो को एक साथ बंद करता है।
और तुरंत उन्हे नर्क भेजता है।
अवधूत के हाथ वाला शैतान कहता है, *" अच्छा तो तुम लोग नर्क के सिपाही हो हमे पकड़ने आए हो।
अवधूत गुस्से में उस पर फिर से फुकते हैं तो वह चीख पड़ता है, और कहते है,*" तुम लोगो के कारण हम देवताओं को आना पड़ा तुम्हे ढूढने, अब तुम्हे ऐसा दंड मिलेगा की दुबारा भागने की सोचोगे भी नही।
वह कहता है *" तुम्हे जो करना है करो हम तो हर बार भागने का प्रयास करेंगे, नही तो कर दो हैं भस्म।
चरक आता हुआ कहता है, *" हमे आदेश पकड़ कर लाने का मिला है, अन्यथा तुम सभी को भस्म कर देते।
अवधूत कहते है *" इसे भी वलय कवच में बंद कर भेज दो।
चरक उसे लेकर वलय कवच में बंद कर नर्क भेज देता है, तभी श्रमिक एक मगरमच्छ को लाकर पटकता है, तो मगरमच्छ अपने विराट रूप में आता है वह इतना बड़ा बन गया था की तीनो देव उसके सामने बौने से नजर आते हैं वह तीनो को ही गटकने के लिए आगे बढ़ता है तो श्रमण जिसे पहले भी मगरमच्छ के शरीर में प्रवेश करने का अवसर मिला था और बहुत कुछ सीखने को भी मिला था उसमे उसकी जान भी जाते जाते बची थी, वह कूद कर उसके मुंह में प्रवेश कर जाता है, और उसके तालु में चिपक कर उसे काटने लगता है तो मगरमच्छ चीखने लगता है, और उसका आकार भी छोटा होने लगता है।
तभी मौका देख कर चरक उसके पूंछ को पकड़ कर उसे पटकने लगता है, तब तक श्रमिक उसके तालु को चीर कर बाहर आ जाता है, दो बार पटकते ही उसकी मुंह के चीथड़े चिथड़े हो जाता है, अवधूत ने पहले ही उसके शरीर को वलय में बंद कर दिया था तो शैतान को बाहर निकालने का मौका ही नही मिला उसे मगरमच्छ के शरीर के साथ ही नर्क में भेज दिया।
चरक कहता है, *" चार तो आसानी से मिल गए, अब बाकी भी भोर होने के पहले मिल जाए तो अच्छा हो जाए।
श्रमिक कहता है, *" ये बार बार रूप बदलते है इसी वजह से थोड़ी समस्या हो रही है, इसने ही मेरे देखते देखते तीन रूप बदले इसी लिए मैने इसे पहचाना भी, ये मेरे आगे था और मैं पीछे बात बन गई।
चरक कहता है *" नैवेद्य अभी तक दिखलाई नहीं पड़ा, चलो उसे भी देखते हैं और बाकी को भी ढूढते है,*"!!
कारक नदी में गिरते ही मूर्छित सा हो जाता था, उसी समय उस पर एक शैतान की नजर पड़ती है जो उसी प्रकार का अजीब जलचर बना हुआ था तो वह कारक को निगल लेता है।
दूसरी ओर नैवेद्य तीन तीन शैतानों के बीच फसा हुआ था, , तीनो बारी बारी से उस पर हमला कर रहे थे, और नैवेद्य उनसे बचता हुआ हमला भी कर रहा था पर पानी में उनकी शक्तियां अधिक थी इसलिए नैवेद्य कमज़ोर पड़ता जा रहा था, तीनो एक साथ उस पर हमला बोलते हैं तो नैवेद्य अचानक ऊपर उछलता है पर एक जलचर भी उछल कर उसे अपनी हवा से खींचता है, इधर तीनो को वह दिखाई दे जाता है, नैवेद्य उसकी हवा से खीच कर उसके मुंह में जाने ही वाला था, तभी चरक बीच में आकर उसे एक और को उछालता है और खुद इस जलचर के मुंह पर जोरदार घुसा मारता है, जिस से उसके आगे के दांत टूट जाते है, तभी नीचे से चरक उस जलचर को ले कर उड़ता है और जंगल में जाता है, उधर अवधूत मौका दिए बीना दोनो जलचरों को लेकर जंगल में जाता है, श्रमिक नैवेद्य को देखता है वह बुरी हालत में पानी में तैरने का प्रयास कर रहा था, श्रमिक उसे उठाकर जंगल कि ओर जाता है, वहां पर उन तीनों जलचरो की वही हालत होती है।
क्रमशः

