Nisha Singh

Horror


4.3  

Nisha Singh

Horror


पंछी

पंछी

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 चेप्टर -5 भाग-1


"कितना बोर करते हैं भार्गव सर…" अंशिका ने फुसफुसाते हुए कहा।

"तेरा जब मन नहीं लगता फिजिक्स पढ़ने में तो फिजिक्स ऑनर्स करने की जरुरत क्या थी?"मैंने कहा तो अंशिका के जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

"तू भी तो कर रही है, मन तो तेरा भी नहीं लगता, मैंने कुछ कहा?"

सही जवाब दिया उसने मुझे। सच ही तो था कि 12थ तक मेरी फिजिक्स बहुत अच्छी थी इसलिए पापा ने मेरा यहाँ एडमिशन करा दिया। पर क्या कहूँ… जो चाहा वो मिला नहीं और जो मिला उसकी कोई दरकार नहीं थी। अंशिका नहीं समझ पायेगी मेरी बातों को, थोड़ी सी झल्ली है ना इसलिए। पिछले साल क्लासेज के दौरान हमारी मुलाकात हुई थी। अंशिका बंसल, एक अमीर परिवार की बेटी है। काम करने, पढ़ने लिखने या कुछ कर गुजरने की दरकार नहीं है। घर में पैसा है सारी ख्वाहिशें चुटकी बजाते ही पूरी हो जाती है फिर क्या ज़रूरत है बेकार में कुछ सोचने की। दो भाई है, दोनों पापा के साथ कपड़ों के कारोबार में मशरूफ रहते हैं। घर काफी अच्छा और बड़ा बना हुआ है, ज़ाहिर है होगा ही, देखा नहीं है क्योंकि आजतक एक भी बार उसके घर नहीं गयी मैं। वही आ जाती है मेरे घर। मैं, पिया और अंशिका हम तीनों ही साथ बैठकर गप्पे लगाते रहते है। अच्छा समय गुज़र जाता है साथ में, वरना ज़िन्दगी तो पिछले एक साल से बोझ सी लगने लगी है मुझे।

"चल… बेल हो गयी, मुक्ति मिली पकाऊ प्रसाद से।" अंशिका की बात से मेरा ध्यान टूटा। मैं विचारों में ही खो गयी और वक़्त गुज़र गया। हम क्लास से बाहर निकले ही थे कि मेरे फ़ोन की बेल बजी।

"अवनी"

"हाँ.. समीर बोल…"

"जल्दी से कैंटीन में आजा।"

"क्यों…"

"क्यों क्या… आजा तो बस आजा और उस मोटी को भी साथ लेते आ…"

अंशिका दरअसल थोड़ी सी हेल्दी है, बस थोड़ी सी ही है। समीर इसीलिए उसे मोटी कहता है। वैसे देखने में तो अच्छी है। सबसे सुन्दर है उसकी गहरी काली आँखें पर क्या करे… झल्ली है। कब, कहाँ, कैसे, कौन सा का कर दे कुछ नहीं पता। चलता फिरता एटम बम है।

"ठीक है आ रहे है हम लोग…" कहते हुए मैंने फ़ोन काट दिया।


"चल, समीर ने बुलाया है…" मेरे साथ अंशिका ने भी कैंटीन का रुख कर लिया ।

"ओये तूने, वहाँ भूत देखा क्या?" मनीष ने इतनी ज़ोर से समीर से पूछा कि मैं और अंशिका कैंटीन में अंदर आते ही जा रहे थे तो हमे भी सुनाई दे गया।

"अबे भूत नहीं देखा वहां…" समीर ने मनीष की पीठ पर थपकी देते हुए कहा। 

"आइये… आइये… रत्नावती जी आइये…" समीर ने मुझे और अंशिका को देख कर कहा। 

"रत्नावती… ये कौन है?" मैंने पूछा तो जवाब समीर की बजाय तरुण की तरफ से आया। 

"चुड़ैल है तेरी जैसी…" 

 

"अरे… कुछ खाने को नहीं मंगाया।" 

"ओये यार अंशिका तू कितनी भुक्कड़ है…" 

"समीर… नाटक मत कर चुपचाप कुछ मंगवा…" 

"हां… हां… ठीक है, उत्तम अंकल, 5 कोल्ड ड्रिंक और 5 सैंडविच भेज दो ज़रा…"

उत्तम अंकल… कैंटीन यही चलाते है।

"तेरा हो गया हो तो अब बता कि मुझे फ़ोन कर के यहाँ क्यों बुलाया?"

" तेरी आरती उतारने के लिए मेरी माँ…"

इस बार फिर जवाब तरुण की तरफ से था।

"तूने जवाब देने के लिए इसे किराए पर रखा है क्या?"

"अरे तुम दोनों झगड़ो मत…" समीर ने मेरी और तरुण की तरफ देखते हुए कहा ।

"वो छोड़, मुझे क्यों बुलाया ये बता।"

"मैं ट्रिप से आया हूँ यार… और ऐसी जगह घूम के आया हूँ कि क्या बताऊं…"

"तो अपने फालतू के किस्से सुनाने के लिए हमें बुलाया है" 


"अच्छा… पहले ही डिसाइड कर लिया कि फालतू है,सुन तो ले…"

"हाँ… ठीक है बोल…"

उसे तो बस मेरी हामी का इंतज़ार भर था। आँखों में वो चमक दिखाई दे रही थी कि शायद इस दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ देख कर आया है।

"मेरे दोस्तों… मैं गया था भानगढ़…"

"भानगढ़… ये कहाँ है?"

मैंने कभी नहीं सुना था इस जगह का नाम, मेरी बात सुनते ही समीर ने मेरी तरफ ऐसे घूर के देखा मानो मैंने भानगढ़ के बारे में नहीं,उसकी 12th की परसेंटेज के बारे में पूछ लिया हो। वो एक बार 12th में फ़ैल हो गया था और दूसरी बार भी कोई खास झंडे नहीं गाड़ पाया। उसकी परसेंटेज उसके घरवालों के लिए टेंशन का एक बड़ा इशू है।

"भानगढ़ नहीं पता… न्यूज़ चैनल देखा कर…" तरुण ने बीच में टांग अड़ाई।

इस बार मैंने जवाब अपनी आंखों से दिया इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती समीर की बात ने हम सब को हंसा दिया।

"यही बात… मैंने तुझे थोड़ी देर पहले कही थी, पता तुझे भी नहीं था क्या है "भानगढ़" खैर… आगे सुनो…"

"कोई पैलेस है क्या?" अंशिका ने पूछा।

"हां… है तो पैलेस ही पर भूत रहते हैं उसमें।" भूत का नाम सुनके हम सभी हंस पड़े।

"अबे आज के जमाने में भूत की बात करता है।" मनीष ने हंसते हुए कहा।

"क्यों, आज के जमाने में भूत नहीं होते क्या?"

तरुण ने मनीष की बात काट दी "मेरे गांव में एक चुड़ैल रहती है, आधी रात को आने जाने वाले लोगों के सामने सज संवर के खड़ी हो जाती है और लिफ्ट मांगती है…"

"प्लीज यार, अगर, यही फिल्मी बातें करनी है तो मैं जा रही हं।" मुझे सच में इन सब बातों मैं कोई खास इंटरेस्ट नहीं है। इत्तेफाक नहीं रखती हं ऐसी बातों से। हम सब एक साथ उठ कर जाने लगे तो समीर ने सबको जैसे तैसे रोका और अपनी बातें सुनाना शुरू कर दिया।

"देखो सबसे पहले हम पहुंचे, जयपुर शेखर के घर पर"

"कौन-कौन गया था?" मनीष ने पूछा। 


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