पलाश के फूल भाग 7
पलाश के फूल भाग 7
सास की बात सुनते रुचि और प्रीत के साथ साथ अजय और अमन के होश उड़ गए।
तब अजय ने कहा,"मां सारा बिजनेस दोनो दामादों के नाम कर दिया से क्या मतलब? आपने हमारे बारे में नही सोचा"
अब तक नजरें झुकायें खड़ी सुमन जी ने गरजते स्वर में कहा,"तो क्या तुम दोनों शराबियों के नाम करती की कभी भी पूरे बिजनेस को बेचकर शराब पी जाओ, तुम्हारे बाप का तो वैसे ही दिमाग काम नहीं करता, वो किसी काम लायक नही। तो क्या तुम लोगो के भरोसे रहकर मैं अपना बुढापा खराब करती। अरे तुम लोगो को तो शुक्र गुजार होना चाहिए मेरे दामाद का जिसने तुम लोगो की शादी करा दी। वरना तो तुम लोगो से कोई रिश्ता करने के लिए तैयार नही था और ये कल की आयी प्रीत मेरे दामाद का अपमान करेगी। अब तुम लोग देखो मैं क्या कर सकती हूं। या तो प्रीत अभी मेरे दामाद के पैरों पर गिर कर माफी मांगे या आज से और अभी से तुम लोगो का इस घर और पैसों पर कोई हक नहीं समझे।
और प्रीत गहने चोरी नही हुए थे बल्कि मैंने ही उन्हें दिए थे। सोचा था इस बहाने ये रुचि इस घर को छोड़कर चली जायेगी। लेकिन ये तो कुंडली मार कर इसी घर मे अब तक है। सब कुछ इस चालाक और तेज तर्रार रुचि का ही काम है।
चुपचाप सबकुछ देखते सुनते प्रीत के ससुर सूर्यकांत जी ने बोला,"वाह सुमन क्या बात हैं? तुम मेरी मेरे घर वालों की सगी तो ना हो सकी लेकिन तुमने तो अपने बेटों के साथ भी वहीं व्यवहार किया जो तुमने आज से पहले मेरे घर वालो के साथ किया था। पहले उन्हें झूठे दहेज के केस में फसाने की धमकियां दी मुझसे दूर किया। और अब बेटों के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार भला कौन यकीन करेगा कि कोई सगी मां भी अपने बेटों के साथ ऐसा कर सकती है। पहले मेरे बच्चो की नजर में मुझे गलत साबित किया उन्हें मुझसे दूर किया और अब उन्हें इस घर से निकाल रही हो। ये मेरे जीते जीते तो सम्भव नही होगा। मेरे बेटे बहू इस घर से कही नही जाएंगे। और ना ही मेरी बहू किसी से माफी मांगेगी।"
सूर्यकांत जी को बोलता देख सब उनकी तरफ एक टक देखने लगे।
"बाबुजी लगता है आपकी तबियत ठीक नहीं चलिए आपको दवा दे कर सुला देता हूँ आप आइए मेरे साथ कमरे में"अखिल ने सूर्यकांत जी का हाथ पकड़ते हुए कहा
अपना हाथ अखिल के हाथ से छुड़ा कर सूर्यकांत जी ने कहा," मैं बिल्कुल ठीक हूं मुझे कुछ नहीं हुआ। लेकिन काश इतनी चिंता तुम अपने माँ बाप की भी करते और अपनी खराब नियत मेरे घर से दूर रखते तो बहुत अच्छा होता। लेकिन तुम तो पैसों के लालच में इतने अंधे हो गए कि तुमने अपने माँ बाप भाई के साथ साथ मेरे घर को भी अपने धोखे का शिकार बना लिया। अब यहाँ से चुपचाप चले जाओ इससे पहले की हमें तुम्हारा हाथ पकड़कर इस घर से निकालना पड़े क्योंकि ये घर आज भी मेरे नाम है। सुमन तुम भी चाहे तो चली जाओ इस घर से।"
"मैं क्यों जाऊँ इस घर से मैं तो यही रहूंगी और जो मेरी मर्जी होगी जैसा मेरा मन होगा मैं वही करूँगी।"
अखिल निशा के साथ घर से जाने लगे तो रुचि ने उनको रोककर कहा," आपको आज शायद एहसास नही अपनी गलतियों का लेकिन जिन दो बेटों के घमण्ड में अंधे होकर आप लड़कियों और औरतो का अपमान करते है। कल को आपके उन्हीं बेटो ने आपको सड़क पर लाकर ना खड़ा किया तो रुचि मेरा नाम नहीं। क्योंकि हमारे कर्म आज नही तो कल हमारे सामने आते ही आते है।"
अखिल ने व्यंग्य में हँसते हुए कहा,"मेरे भविष्य की चिंता छोड़कर तुम अपना पहले आज देखो। सोचो कि अब क्या करोगी? और कैसे इस घर को फर्श से अर्श पर लाओगी?" कहकर अखिल निशा वहाँ से चले गए।
इधर सब सोफे पर बैठकर सोचने लगे कि अब आगे क्या और कैसे होगा। कैसे घर और घर के खर्चे चलेंगे।
क्रमशः
