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हरि शंकर गोयल

Others

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हरि शंकर गोयल

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मुझे छोड़कर मत जाओ मां

मुझे छोड़कर मत जाओ मां

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"मुझे छोड़कर मत जाओ , मां!"

सुधा घर की सफाई में व्यस्त थी । सतीश व्हाट्सएप पर ई समाचार पत्र पढ़ने में व्यस्त था । सुधा ने अनुनय के भाव से कहा 

"सुनो । कल शाम आंधी आई थी । पूरे घर में धूल ही धूल हो गई है। थोड़ी सहायता करो ना "। 

"हाय । इन अदाओं पे कौन ना मर जाये , सुधा रानी । जिस अंदाज में तुमने कहा है भला किसकी मजाल है जो इंकार कर दे"। 

"आपको तो हरदम मजाक ही सूझता है । ठीक है मैं तो खुद ही कर लूंगी" । 

"आप तो खामखां नाराज हो जाती हो , बेगम । आदेश करो । क्या करना है" ? 

"करना क्या है , कोई बेलदारी तो करनी नहीं है । वो पंखे थोड़े गंदे हो गए हैं, साफ कर दो और रैक पर रखी तस्वीरों को अच्छी तरह पोंछ कर साफ़ कर दो , बस"। 

"बस, इतना सा काम । जो आज्ञा , देवी । और कुछ भी हो तो वो भी बता देना"

"तुम फिर शुरू हो गये" । 

"क्या करुं देवी । आजकल रामायण और महाभारत सीरियल्स का असर है देवी । अभी तो कुछ दिन और रहेगा देवी "। 

"आपसे तो कुछ कहना ही बेकार है । तिल का ताड़ बना देते हो" । 

और वो अपने काम में फिर से व्यस्त हो गई और मैं भी अपनी ड्यूटी पर डट गया । आखिर अपनी भी कोई इज्जत है भई ।

पंखे साफ कर दिये । अब तस्वीरों की बारी थी। मेरी और सुधा की तस्वीर बहुत पुरानी थी लेकिन लग रहा था जैसे अभी की ही हो । अभी भी ताजगी झलक रही थी इसमें । अगली तस्वीर मां की थी । अपलक देखता रह गया । अभी भी ममत्व झलक रहा था तस्वीर से । तस्वीर मेरे हाथ में ही रह गई और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो मेरे सामने खड़ी है । नियति के क्रूर हाथों ने उसे मुझसे 23 वर्ष पहले ही छीन लिया था । ऐसा लगा कि मैं अनाथ हो गया था । सतीश ख्यालों में खोता चला गया । 

अचानक सुधा की आवाज ने सतीश की तंद्रा भंग की

"नीचे आ जाओ । आपसे नहीं होगा ये सब "। 

मैंने कातर नजरों से उसे देखा । 

वो बोली , " अरे , ये क्या ? आपकी तो आंखों में आंसू आ गए "? 

सतीश थोड़ा शर्मिंदा हुआ । आंखें पोंछता हुआ बोला

"नहीं । ठीक है । मैं कर लूंगा" । 

"अच्छा जी । अब चुपचाप नीचे आते हो या नहीं "? 

सतीश की इतनी औकात कहां जो वह सुधा के आदेश को टाल जाये । बेचारा चुपचाप नीचे आ गया 

सुधा उसे साथ लेकर सोफे पर आकर बैठ गई। अपनी गोदी में सतीश का सिर रखकर हौले हौले सहलाने लगी । 

" मां की याद आ गई " ? 

सतीश कुछ कह नहीं सका । बात होंठों में दबके ही रह गई । 

सुधा उसे अपलक देख रही थी । कितनी मासूमियत थी उसके चेहरे पर। किसी छोटे बच्चे जैसी । 

" आपको प्रशासनिक अधिकारी किसने बना दिया ? आपको तो कोई लेखक , साहित्यकार बनना चाहिए था। /"

अपने भावों पर नियंत्रण करते हुए सतीश बोला ," प्रशासनिक अधिकारी भी एक इंसान होता है सुधा । अगर उसमें संवेदना ही नहीं होगी तो वह कैसे जनता की तकलीफें दूर करेगा । 

ये बात तो सही है लेकिन उसे अपने भावों पर नियंत्रण करना आना चाहिए । अपनी तकलीफों का प्रर्दशन ना हो, इसका ध्यान रखना चाहिए। "

" भावों का क्या है सुधा , उस पर अपना वश थोड़े ही चलता है । जैसे बादल उमड़ आते हैं , वर्षा हो जाती है । उसी तरह भाव भी मौका देखकर दबे पांव आ ही जाते हैं । "

"ये तस्वीरें मैं साफ कर दूंगी । आप नहा धो लो । तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूं।" सुधा उठने को हुई। 

सतीश ने उसका हाथ पकड़ लिया "तुम मेरे पास बैठो सुधा । नाश्ता बाद में बना लेना । "

सुधा उसके सिरहाने बैठ गई । 

सतीश बोलने लगा " जानती हो सुधा , मां कितना प्यार करती थी मुझे ? एक पल को भी आंखों से ओझल नहीं होने देती थी । बचपन में हम लोग कोई साधन संपन्न तो थे नहीं । बस अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति होने लायक ही पारिवारिक आय होती थी। दुकान , खेत , घर का सारा काम पूरे परिवार को ही करना होता था। कोई नौकर चाकर तो था नहीं । हम सभी लोग मां, पिताजी, मेरी दो बहनें सरला और सरिता मिलजुलकर कर लेते थे । 

मां बहुत धार्मिक स्वभाव कीं थीं। बिल्कुल अनपढ़ थीं । उनको रामायण सुनने का बहुत शौक था । मुझसे कहकर उन्होंने एक रामायण मंगवाई जिसका पाठ रोज करवाती थी । रामायण सुनते सुनते उनको आधी से ज्यादा कंठस्थ हो गई थी। भगवान ने उनको गला बहुत मधुर दिया था। बहुत अच्छा गाती थीं। भजन, शादी विवाह के गीत , बन्ना- बन्नी , खयाल बधावा और न जाने कितनी तरह के गीत याद थे उनको । सुबह सुबह जब वो चक्की पींसती थी तब बहुत सुंदर भजन गाती थी । मैं बिस्तर में पड़ा पड़ा सुनता रहता था । एकदम कोयल जैसे गाती थी। 

जब भी गांव में श्रीमद्भागवत की कथा होती थी तो वो जरूर सुनने जाती थी । यदि मैं घर पर होता तो मुझको साथ लेकर जाती । मुझे भी बहुत अच्छा लगता। ये रामायण और श्रीमद्भागवत मुझे भी याद हो गई थी। "

सतीश कहता चला गया। मैं कक्षा 11 तक गांव के स्कूल में ही पढ़ा । बाद में शहर चला गया। वो इतनी बहादुर थी कि रात में भी अकेली खेत पर चली जाती थी । 1987 की बात है। उस साल बरसात नहीं हुई। अकाल पड़ा था बहुत तेज । घर में दो भैंस भी थी । उनके चारे का संकट हो गया था। मैं छुट्टियों में गांव आया हुआ था। खेत में ज्वार बोई हुई थी। आसपास के खेतों में कुछ नहीं था लेकिन हमारे खेतों में ज्वार खड़ी थी। लोग पशुओं के चारे के लिए उसे काट सकते थे। रात के 9 बजे गये थे। मैं खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहा था । दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी। पिताजी दुकान पर थे। 

मां कहने लगी "बेटा , अभी खेत पर चलना है ।" 

मैं चौंकते हुए बोला, "अब ! इस वक्त "! 

"हां, अभी ! इसी वक्त" । 

"लेकिन क्यों" ? 

"खेत में अपनी ज्वार खड़ी है । लोग रात को काटकर ले जा सकते हैं। अतः अभी चलकर रखवाली करनी होगी। वो गुलकंदी कह रही थी उसकी भी ज्वार काटकर कोई ले गया था" । 

एक बार तो मुझे डर लगा । इतनी रात में मैं कभी खेत पर गया नहीं था । लेकिन जब सोचा कि जब मां को डर नहीं लग रहा है तो मुझे किस बात का डर है । बल्कि मां को तो मेरा सहारा होना चाहिए ना कि मुझे मां का सहारा। 

और हम दोनों चल पड़े। रात के 12 बजे तक पहरा देते रहे । फिर घर आ गए। इसी तरह अब तो रोज का काम हो गया था। मां के साहस से मुझमें भी साहस आ गया । 

सतीश की आवाज लड़खड़ा गई थी। सांसों को संयत कर कहने लगा । मां के प्राण बसते थे मुझमें । जब भी मैं गांव जाता , उसमें जान सी आ जाती थी। रोज रोज कुछ न कुछ नया बनाकर खिलाती थी। जब भी मेरी छुट्टियां खत्म होती तो किसी न किसी बहाने एक एक दिन टालती रहती और जाने नहीं देती थी ।

एक बार ऐसा हुआ जब अपना शेखर 2 वर्ष का था । मैं शहर में प्रशिक्षण लेने गया हुआ था । उन दिनों ना तो मोबाइल ही थे और ना अपने घर कोई फोन था। केवल चिट्ठी पत्री से काम चलाया जाता था। अचानक रात्रि के 10 बजे गांव से एक सज्जन मुझे ढूंढते ढूंढते मेरे हाॅस्टल आ गये । कहने लगे, जल्दी चल । तेरी मां की तबीयत बहुत खराब है । 

मैंने चौंक कर पूछा , क्या हुआ ? 

"ये तो पता नहीं । पर हॉस्पिटल में भर्ती है। तुरंत चल" । 

"अब कैसी तबीयत है '? 

तबीयत तो ठीक नहीं है , इसलिए तो तेरे पिताजी ने "तुझे बुलवाया है । चल जल्दी चल" । 

मैंने अपने कपड़े पांच मिनट में पैक किये और आशंकाओं के झूले में झूलता हुआ उनके साथ हो लिया। 

वो कार लेकर आये थे। कहने लगे । अपने बच्चों को भी साथ ले ले । 

मुझे शक हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ है । अब तो मेरी रुलाई फूट पड़ी। मैंने कहा, "सच सच बताओ कि बात क्या है ? वो अब जिंदा है कि नहीं "? 

उन्होंने कहा, "मैं जब वहां से चला था, वो जिंदा थी । अब मैं कह नहीं सकता"। 

मेरी छाती फट पड़ी । मैं फूट फूट कर रोने लगा। उन्हें अपनी कसम दी कि सच बताएं कि मां जिंदा है या नहीं।" तब उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा कि तेरी कसम वो जिंदा हैं"। तो मैंने तुम्हें और शेखर को साथ लिया और गांव चल पड़े। 

सुधा भी अब कातर हो चली थी। 

" हां हां, मुझे भी याद है वो घटना । "

सतीश कहने लगा " सुबह के लगभग 4.30 बजे हम लोग सीधे हॉस्पिटल पहुंचे। देखा तो मां बैड पर चित्त लेटी है । हाथ पांव शिथिल पड़े हैं। मुंह खुला हुआ है । ऐसे लग रहा था कि मां इस दुनिया में अब नहीं है ।

उस स्थिति को देखकर मैं कांप उठा था। मुंह से जोर की चीख निकल गई । 

"मां ऽऽऽ । मुझे अकेले छोड़कर मत जाओ मां। मैं अकेला रह नहीं पाऊंगा मां "

और मैं मां से लिपट कर फूट फूट कर रोने लगा। 

मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि मां के शरीर में कंपन्न हो रहा है ।  मैंने मां को झिंझोड़ डाला । 

अचानक मां के मुंह से निकला 

" सतीश " 

"मां "

"बेटा "

और मैंने मां को बांहों में जकड़ लिया । 

पांच मिनट में मां की चेतना पूरी तरह लौट आई । इतने में डॉक्टर साहब भी आ गये । मां को इस स्थिति में देखकर चौंक पड़े । मुझसे कहने लगे। "बहुत भाग्यशाली हो तुम । हमने तो इनको मृत समझ लिया था । क्या किया था तुमने इनके साथ "? 

मैंने कहा, कुछ नहीं । बस मां को पुकारा । शायद मेरी आवाज़ सुनकर उनमें चेतना का संचार होने लगा । 

डॉक्टर बोले, अविश्वसनीय घटना घटित हुई है यह । मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा कभी नहीं देखा। मैंने थोड़ी देर पूर्व ही तुम्हारी मां को मृत घोषित कर दिया था। 

सतीश रोते रोते बोला , डाॅक्टर साहब । वो मरती कैसे ? उसके प्राण तो मुझमें बसे थे । मुझे देखे बगैर तो वो मर भी नहीं सकती थी । आज ये बात सच साबित हो गई । 

सुधा ने सतीश की आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा । "हां । हर मां के प्राण अपने बच्चों में बसे हुए होते हैं । आओ, हाथ मुंह धो लो और थोड़ा नाश्ता कर लो "

और यह कहकर वह नाश्ता लगाने चली गई ।



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