मुहब्बत सिर्फ़ इक ख़्वाब
मुहब्बत सिर्फ़ इक ख़्वाब
समीर रोज़ की तरह सिमरन से बात करके सो जाता था,
ज़िन्दगी दोनों की बड़ी हसीन गुज़र रही थी।
वक़्त के साथ साथ वो बढे भी हो रहे थे, और उनके सपने भी बढे होते जा रहे थे।
सिमरन कहती मै आगे की पढ़ाई डॉक्टरी विदेश से करुँगी, इस पर समीर कहता क्या रखा है बाहर। क्यों ना हम दोनों पढ़ाई का सिलसिला अपने देश की मिट्टी और वतन मे ही जारी रखे।
इस पर सिमरन कहती मेरे माँ और बाबूजी का सपना है मै आगे की पढ़ाई और अपने सपने को साकार कर सकूँ,
दिन बीतते गए और वो वक़्त आ गया जब सिमरन को बाहर जाना था,
एक रोज़ सिमरन का कॉल आता है समीर मुझसे आज मिल लो, आज मेरा हिंदुस्तान मे आखिरी दिन है, इसके बाद शयद हम एक साल बाद ही मिले।
ये सुनते ही जैसे समीर के पांव से जैसे ज़मीन खिसक गई हो, हक्का बक्का रह गया, सिमरन बार बार कहती सुन रहे हो ना समीर।
अब दबी आवाज़ मे समीर कहता है हाँ मै सुन रहा हूँ सिमरन।
उसके बाद समीर जल्द तैयार भी नहीं होता और मिलने निकल जाता है,
कहता है सिमरन एक तुम हो जिसे ख़्वाबों की पड़ी है।
मेरा क्या होगा,
सिमरन कहती है अभी ये वक़्त हमारे कुछ करने और आगे बढ़ने का है, हम दोस्त हैं ना पागल।
समीर कहता हैं हाँ लेकिन मै ये दूरी बर्दाश्त नहीं कर सकता,
सिमरन कहती हैं अब मुझे जाना होगा,
समीर अब चाह कर भी सिमरन को रोक नहीं सकता था,
वो सिमरन को जाने देता हैं, और ख़ुद जैसे एक मुर्दे लाश की तरह घुटने के बल ज़मीं पर गिर जाता है।
उधर सिमरन डॉक्टरी की तैयारी करती हैं,
इधर समीर सब कुछ छोड़ उसे ही याद करता रहता हैं,
वो समीर जिसने न जाने कितने ख़्वाब देखे थे।
अपने दोस्तों माँ और बाबूजी के लिए आज वो ख़्वाब जैसे
इस मुहब्बत के तूफ़ान मे बिखर सा गया।
इसलिए जवानी की मुहब्बत पर काबू रखा जाए,
हमारे देश मे ना जाने कितनी सिमरन आगे बढ़ जाती हैं,
और मुहब्बत का ग़म लिए हमारे हिंदुस्तान मे कितने समीर अपनों और अपने ख़्वाबों को तबाह कर बैठते हैं।
इसलिए मुहब्बत को सिर्फ मुहब्बत ही समझा जाए, अपना ख़्वाब और मुस्तक़बिल नहीं,
लिखने का मक़सद ये है की समाज मे सिमरन की तरह, समीर भी मुहब्बत को तरजीह न देकर अपने ख़्वाबों को तरजीह दें।
तबरेज़ अहमद
