Saroj Verma

Horror


4.5  

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मोतीमहल--भाग(४)

मोतीमहल--भाग(४)

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गजेन्द्र मना मनाकर हार गया लेकिन कमलनयनी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी, वो समाज मे माँगभर कर गजेन्द्र की दुल्हन का दर्जा पाना चाहती थी लेकिन इस बात के लिए, गजेन्द्र कतई राज़ी ना था, उसने कहा कि धर्मपत्नी सिर्फ़ एक होती है जो कि मेरे पास है, दोनों ही अपनी जिद पर अड़े थे।

उधर फाल्गुनी और रणजीत का प्यार बढ़ता ही जा रहा था और इस बात की खुशी फाल्गुनी के चेहरे पर साफ साफ दिखाई देती थी, फाल्गुनी के चेहरे का निखार देखकर एक दिन कमलनयनी ने पूछ ही लिया___

 क्या बात है फाल्गुनी? आजकल चेहरे का निखार दिनबदिन बढ़ता ही जा रहा है।

ऐसी कोई बात ना है , कमल जीजी! पता नहीं तुम्हें ऐसा काहें लग रहा है, फाल्गुनी बोली।

तू बताएं चाहे ना बताएं, कोई बात तो जरूर है, कमलनयनी बोली।

हाँ, कमल जीजी! समय आने पर सब बता दूँगी, बस, फाल्गुनी बोली।

अगर ये इश़क का मामला है तो तू तो बड़े नसीब वाली है, सच्चा प्यार करने वाला हर किसी को नस़ीब नहीं होता और अगर कभी नस़ीब हो तो उसे छोड़ना नहीं चाहिए, भगवान करें तुझे ऐसा ही प्यार करने वाला मिला हो और तू कभी भी उसका संग मत छोड़िओ, चाहें कैसी भी मुश्किल आ जाए, कमलनयनी बोली।

हाँ, कमल जीजी! मै उसका संग कभी ना छोड़ूगी, फाल्गुनी बोली।

दिन ऐसे ही बीत रहें थे......

  फाल्गुनी की तबियत खराब हो गई, वो काफ़ी कमजोर हो गई थी, इसलिए कमलनयनी का काम करने मोतीमहल ना जा सकीं, मजबूर होकर कमलनयनी को काम के लिए एक औरत रखनी पड़ी लेकिन वो सारे काम नहीं कर पाती थी, क्योंकि उसका बच्चा छोटा था, थोड़ा बहुत काम निपटा कर जल्दी घर चली जाती थी, कमलनयनी भी उसकी मजबूरी समझती थी इसलिए कुछ ना कहती थी और वो सोचती थी कि कुछ ही दिनों की ही तो बात है फाल्गुनी अच्छी हो जाएगी तो फिर से सारे काम सम्भाल लेगी।

एक दिन शाम के समय कमलनयनी का मन ऊब रहा था, उसे भीतर अच्छा नहीं लग रहा था, एक तो फाल्गुनी के ना आने पर अकेले उसे अच्छा नहीं लगता था , वहाँ फाल्गुनी और रामू के अलावा वो किसी और को जानती भी नहीं थी, फाल्गुनी नहीं आती थी तो रामू भी कम आता, उसे और किसी से ज्यादा मेल मिलाप भाता भी नहीं था क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि कोई भी उसके अतीत को कुरेदकर कुछ पूछे इसलिए वो और भी किसी से कोई मतलब नहीं रखना चाहती थी।

कमरे में पड़े पड़े जब उसका मन ज्यादा ऊबने लगा तो वो खुली हवा मे लेने के लिए छत पर चली आई, छत पर हवा जोरों से चल रही थी, उसके बालों की लटें हवा के जोर से यहाँ वहाँ बिखर रहीं थीं, अब उसके मन को तसल्ली हुई, छत पर सूखें कपड़े टंगे थें, उसने सोचा वो ही नीचे ले चलें, उसने जैसे ही रस्सी पर पड़े सूखे कपड़ो को समेटना शुरु किया ही था कि एक हल्की चुनरी उसने जैसे ही रस्सी से उतारी वो हवा के तेज झोंके से उड़कर छत के बाहर चली गई।

 चुनरी ने उड़ते उड़ते बगीचें के बाहर पड़ी चारपाई पर लेटे हुए, रणजीत के चेहरें को ढ़क लिया, ऊपर छत पे खड़ी होकर कमलनयनी देख रही थीं कि चुनरी उड़ते उड़ते आखिर कहाँ जा रही है और उधर चेहरे से चुनरी हटाते हुए रणजीत ने अपनी नजरें इधर उधर दौड़ाईं कि आखिर ये चुनरी यहाँ उड़कर कैसे आई, तभी उसकी नज़र छत पर खड़ी कमलनयनी पर गई।

छत पर खडी़ हुई कमलनयनी ने रणजीत को दूर से ही इशारें से समझाया कि ये चुनरी मेरी है, रणजीत ने भी इशारे से कहा कि तुम चिन्ता ना करों, मैं तुम्हें वहीं देने आता हूँ।

 थोड़ी ही देर में रणजीत चुनरी देने मोतीमहल आ पहुँचा, उसने दरवाज़ा खटखटाया, कमलनयनी ने दरवाजा खोला___

 ये लीजिए आपकी चुनरी, रणजीत बोला।

खामख्वाह आपको बेवजह इतनी तकलीफ़ हुई, कमलनयनी बोली।

तकलीफ़ किस बात की मोहतरमा! आपकी चीज़ थी तो आपको लौटाने चला आया, रणजीत सिंह बोला।

आइए....भीतर..आइए, कमलनयनी बोली।

और रणजीत भीतर चला आया, कमलनयनी ने उससे पलंग पर बैठने को कहा और वो बैठ गया।

मैं चाय बनाकर लाती हूँ, कमलनयनी बोली।

ना जी! इतनी तकलीफ ना उठाएं, रणजीत बोला।

अरे, तकलीफ़ किस बात की, आप मेरे यहाँ पहली बार आएं हैं, चाय तो पीनी पड़ेगी, कमलनयनी बोली।

जी , ठीक है तो पिला दीजिए चाय, जब से फाल्गुनी बीमार पड़ी है, तब से कुछ अच्छा खाने को ही नहीं मिलता, बस जो कच्चा पक्का बन जाता है खा लेता हूँ, रणजीत ने भोलेपन से कहा।

हाँ, फाल्गुनी मेरे यहाँ भी काम करती थी लेकिन जब से वो बीमार पड़ी है, ज्यादातर काम मुझे ही करने पड़ते हैं, कमलनयनी बोली।

मतलब़ फाल्गुनी के बीमार पड़ने से आपको भी नुकसान हुआ, ये भी खूब रही और इतना कहकर रणजीत हँसने लगा।

रणजीत को ऐसे हँसते हुए देखकर कमल को अच्छा लगा , रणजीत का हँसमुख स्वभाव कमल को भा गया।

तब तक कमल चाय भी बना लाई और रणजीत को पीने के लिए कहा___

अच्छा तो आप यहाँ क्या करते हैं? कमल ने रणजीत से पूछा।

जी , खेती बाड़ी करता हूँ, रणजीत बोला।

यहाँ अकेले रहते हैं क्या? कमल ने पूछा।

हाँ, यहाँ अकेले ही रहता हूँ, वो जो बगीचें के पास दूसरी झोपड़ी बनी है वो मेरी है, फूफा जी ने कहा तो था कि मोतीमहल मे रह लो लेकिन मुझे ना भाया, मैं जब खेंतों में काम कर सकता हूँ तो क्या झोपड़ी में नहीं रह सकता, रणजीत बोला।

मैं कुछ समझीं नहीं कि आपके फूफाजी कौन हैं? कमल ने कहा।

जी, गजेन्द्र प्रताप सिंह मेरे फूफाजी हैं, मैं अपने गाँवों में गरीबों की मदद करता था तो घरवालों ने इसे आवारागर्दी का नाम दे दिया, इसलिए बुआ ने अपने पास बुला लिया, काम के नाम पर ये खेतीबाड़ी देदी, बहुत ही बढ़िया काम है, दिनभर खेंतों मे पसीना बहाओ और जो भी रूखा सूखा मिले उसे खाकर सो जाओ, कभी कभी तरस खाकर माली काका और फाल्गुनी खाना दे देती थी तो कुछ अच्छा खा लेता था लेकिन फाल्गुनी के बीमार पड़ने पर वो आसरा भी गया, रणजीत सिंह बोला।

अच्छा तो ये कहानी है आपकी, कमल बोली।

आप..आप क्या लगा रखा है, तुम कहिए जी!मैं और आप हमउम्र ही होगें, रणजीत बोला।

तो फिर तुम भी मुझे तुम ही कहोगें, वैसे तुमको लोग किस नाम से पुकारते हैं, कमल ने पूछा।

जी इस नाचीज़ को रणजीत कहते हैं और तुम्हारा शुभ नाम क्या है? रणजीत ने पूछा।

मेरा नाम कमलनयनी है, कमल बोली।

वाह...जी नाम भी आँखों को देखकर रखा गया है, तुम्हारी आँखें एकदम कमल के समान है, इसलिए शायद तुम्हारा नाम कमलनयनी रखा गया है, रणजीत सिंह बोला।

जी शुक्रिया, कमल बोली।

चाय तो खत्म हो गई तो फिर मैं चलूँ, रणजीत बोला।

तो अब तो रात को तुम खेतीबाड़ी करोगें नहीं तो थोड़ी देर और रूको, अच्छा लग रहा तुमसे बात करके, फाल्गुनी आ जाती थी तो रामू आ जाता था लेकिन अब तो रामू भी नहीं आता, मन ऊब गया था, कमल बोली।

थोड़ी देर रूक तो जाता लेकिन जाकर चूल्हा सुलगाऊँगा , फिर कच्चा पक्का खाना पकाऊँगा, तभी कहीं जाकर रोटी नसीब होगी, रणजीत बोला।

तो ठीक है आज का खाना मेरे साथ खा लो, आज मैं खाना बनाती हूँ, कमल बोली।

नेकी और पूछ पूछ, ये हुई ना बात, चलो आज चूल्हा जलाने से छुट्टी मिली, रणजीत बोला।

ठीक है तो तुम भी वहीं चौके में चलकर बैठो, बातें करते करते खाना भी बन जाएगा, कमल बोली।

मुझे मंजूर है, अच्छा खाना खाने के लिए तो मैं रातभर बातें कर सकता हूँ, रणजीत बोला।

अच्छा, ठीक है , ये बताओं क्या खाओंगें? कमल ने पूछा।

सच कहूँ तो बहुत दिन हो गए, हलवा नहीं खाया, रणजीत सिंह बोला।

ठीक है तो आलू टमाटर की तरी वाली सब्जी बना लेती हूँ, ढे़र सारी हरी धनिया डालकर, गरमागरम पूरियाँ, आम का अचार और हलवा बना लेती हूँ फटाफट, कमल बोली।

मेरे मुँह में तो नाम सुनकर ही पानी आ रहा है, सच में ये सब खाएं तो बहुत दिन हो गए, रणजीत बोला।

और कमलनयनी खाना तैयार करने में लग गई।

क्रमशः___


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