महेनत की कमाई
महेनत की कमाई
सुखीराम एक किसान का बेटा था। उनके पिता भोलाराम बड़ी महेनती थे। ठीक उस से उल्टा सुखीराम बड़ा आलसी था। वह पूरा दिन सोने और धूमने में बीताता। लेकिन एक काम नही करता। उसकी शादी हो चुकी थी, उसका एक लड़का था। लेकिन उन सबको संभालने का काम उसके पिताजी करते थे।
एक दिन सुखीराम के पिताजी का देहांत हो गया। अब घर संभालने की जवाबदारी सुखीराम को निभानी थी। लेकिन वह कुछ नही करता था, पहले की तरह जैसे जीता था वैसे जीता रहा। नौबत यह आ गई की खाने के लाले पडने लगे। उसकी पत्नी ने लाख बार कहा खेत में जाकर कुछ काम कर लो। लेकिन सुनता नही था।
जब कोई रास्ता न ही बचा तब उसने खेत में चोरी करना शुरू कर दिया। वह टोकरी भर के जो मिलता चुराता और बेच कर खाता। इस तरह उसका गुजर बसर होने लगा।
घर पे कई बार सबने उसको पूछा, उसने कुछ नही बताया।
अब उसे उसमें भी आलस आने लगी। तो उसने सोचा की, "कोई मेरे लिए यह काम कर दे तो। लेकिन करेगा कौन?" तभी उसे ख्याल आया, 'उसका बेटा' ।
उसने उसी रात उसके बेटे को अपने साथ लिया। जाकर एक खेत के पास खड़ा हो गया और अपने बेटे से कहा, "जाओ, उसमें जो भी पक्का और ताजा हो उसे तोड़ ले आओ।" लड़का समझ गया की मुझे चोरी करने को कह रहे हैं। तो उसने समझदारी दिखाते हुए कहा कि, " इतने बड़े खेत में बस एक टोकरी भर के ही फसल मिलेगी। उसमें क्या होगा।"
" नही नही बेटा इतने बड़े खेत में तो एक टैक्टर भर जाये इतनी फसल होगी। लेकिन हम पकड़े न जाये इसलिए एक टोकरी जितना ही चुराते है। "
" मैं नहीं मानता आप झूठ बोल रहे हैं। मैं मान ही नही सकता "
" ठीक है, मैं तुम्हें दिखाता हूँ। "
उसने जाकर उस खेत में रखी एक बीज और खाद की बोरी उठाई घर चले आये।
फिर दूसरे दिन अपने खेत में वो बीज बोये और खाद डालकर फसल आने की राह तकने लगे। और बहुत अच्छी फसल आई। अब उसने अपने पिता से कहा," अगर इतने में इतना हो सकता है तो अपने सारे खेतों में कितना होगा। "
सुखीराम को भी यह बात पसंद आई। क्योंकि चोरी करके पकड़े जाने के डर से छुटकारा जो मिल गया था।
सुखीराम ने अपने पिताजी के खेत में खेती करना शुरू किया। महेनत रंग लाई और अच्छी फसल भी आई। यह देखकर दोनों बहुत खुश भी हुए। इतने में उसका बेटा खेती करना सिख गया।
दोनों ने बड़े लगन से खेती की। जो फसल आई उसको बेचकर जो उसने बोरी चुराई थी उसका पूरा मूल्य भी उस जगह चूपके से रख दिया।
