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Sarita Kumar

Classics


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Sarita Kumar

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मेरी बहूरानी

मेरी बहूरानी

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25 अक्टूबर 2020 विजय दशमी 

पंडित जी ने यही तारिख चुना है ललित और प्रीति के रिश्ते के लिए। सरला जी सुबह से ही तैयारी में व्यस्त हैं। आज उनके बेटे की सगाई होने वाली है। उन्हें उनकी बहुरानी मिलने वाली है जिसे घर की चाबी सौंपने के लिए बरसों से बेसब्री से इंतजार कर रही हैं। शायद हर मां की यही ख्वाहिश होती है कि जीते जी अपने घर की चाबी एक सही हाथों में सौंप दें और अपने आंखों के सामने अपने बच्चें की गृहस्थी बसते हुए देख लें। फिर से अपने बच्चें के बचपना को देखें पोता पोती के रूप में। जब ललित सिर्फ पांच साल का हुआ था तभी से बहुरानी के सपने देखने लगी थी। हर धनतेरस के दिन अपनी बहुरानी के लिए एक चांदी का सिक्का खरीदती थी और तीज़ में पांव का बिछिया। अक्षत तृतीय पर नाक के लौंग इस तरह इतने सारे जेवर इकट्ठे कर लिए थें इन छब्बीस सालों में। 

"प्रस्थान करने का वक्त हो गया है अब देर मत कीजिए सासू मां ..!" यह टिप्पणी थी सरला जी के पति परमेश्वर आदरणीय अभय जी का। "हां हां बिल्कुल तैयार हूं बस दही चीनी खिला दूं।" बारी बारी से सभी ने दही चीनी खाई और जय गणेश बोल कर चल पड़े एक सुहाने सफ़र पर जहां सरला जी की बहुरानी मिलने वाली थी। उनके सपनों की शहजादी , जान सी दुलारी , उसके परिवार को आगे बढ़ाने वाली। सहाय परिवार को वारिस देने वाली। उसके राजा बेटा का ख्याल रखने वाली उसके खुशियों की चाबी। एक भोली भाली मासूम सी लड़की जिस पर न सिर्फ अपने बेटे की जिम्मेदारी बल्कि पूरे परिवार का भार और खानदान की मर्यादा और आबरू सौंपना चाहती थी।

इन्हीं ख्यालों में मीलों का सफर पल भर में गुजर गया और पहुंच गए। राज साहब के घर , उन्हें ज्यादा कुछ मालूम नहीं था बस इतना ही बताया गया था कि हम कॉफी पीने के लिए आ रहें हैं। 

बाहर लॉन में ही युगल दम्पत्ति बैठे हुए मिलें। शाम का वक्त , सुहाना मौसम हल्की हल्की बयार सिहरन सी पैदा करने लगी थी। दशहरा में गुलाबी सर्दी पड़ने ही लगती है और इस बार दो मास लगने से थोड़ी और देर हो गई थी। पिछले साल तो दिवाली भी निकल गई थी अभी तक।

खैर ..... सामान्य सी औपचारिकता के बाद दोनों परिवार साथ साथ बैठकर कॉफी का आंनद उठाएं। अभय साहब बहुत सीधे-सादे इंसान हैं बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट शब्दों में प्रीति का हाथ ललित के लिए मांग लिया ...। राज साहब शायद इस बात के लिए तैयार नहीं थें तो कुछ हैरान और परेशान हुए और अपनी पत्नी के तरफ देखने लगें।उनकी पत्नी बेहद समझदार और व्यवहार कुशल गृहिणी हैं उन्होंने आंखों से इशारा किया। कुछ देर बाद बच्चें आपस में मेल जोल बढ़ाने लगें। यूं तो पहचान बरसों पुरानी थी लेकिन दोनों परिवार आमने-सामने पहली बार हुएं थें। लेकिन बड़ी जल्दी ही बच्चें आपस में घुल मिल गए। राज साहब इतनी सहजता से इस संबंध को नहीं स्वीकार पा रहें थें लेकिन उनकी विदूषी पत्नी ने अपना मन बना लिया और दो चार रिश्तेदारों को फोन पर बताया। धीरे धीरे सभी की सहमति हो गई और मुंह मीठा कराने के लिए सरला जी शुगर-फ्री कलाकंद लेकर आई थी जिसे छुपा कर गाड़ी में ही रखा था। उन्हें शंका थी कि कहीं 1% राज साहब ने मना कर दिया तब क्या होगा ? आखिर उनकी बेटी के जीवन का फैसला था जो जल्दीबाजी में किया जाना उचित नहीं था। 

खैर जब सभी की सहमति मिल गई तब सभी ने एक दूसरे को बधाइयां दी और ललित एवं प्रीति के सुखमय जीवन के लिए ढेरों शुभकामनाएं। 

पंडित जी भी साथ में आएं थें। शादी के लिए शुभ मुहूर्त 27 नवंबर का मिला। सचमुच यह तो बहुत ही शुभ दिन है। ललित की छोटी बहन नेहा ने तुरंत ही सारी व्यवस्थाएं दिखाने लगी अपने लैपटॉप पर। इंगेजमेंट से लेकर शादी तक का सब कुछ उसने वेंडिंग प्लानर से मिलकर सब कुछ तय कर लिया था। बिना प्रीति और उसके माता-पिता की राय जाने हुए। आज इतनी जल्दीबाजी में फैसला हुआ कि कुछ नया नहीं ले सकी जो पहले से ले रखा था वही हीरे वाली अंगुठी और कंगन लेकर चल पड़ी थी। अभय साहब ने गिन्नी दिया और खुशी-खुशी यह सगाई की रस्म अदा कर दी गई। राज साहब भी प्रसन्नचित लग रहें थें। प्रसन्नता की बात तो है कि ललित देखने में खुबसूरत नौजवान और देश के नंबर वन कंपनी में मैनेजर के पद पर आसीन है। अभय साहब का पद , प्रतिष्ठा , घर , बार , परिवार और खानदान सब कुछ तो पहले से ही जाना समझा हुआ था ही। इसलिए दोनों परिवार अब बहुत खुश नजर आ रहें थें।

अंधेरा होने लगा था थोड़ी थोड़ी फुहार भी पड़ने लगी थी। सब लोग अंदर आएं। साथ में कुछ तस्वीरें ली गई और आगे की सारी योजनाएं राज साहब और उनकी पत्नी को समझाया गया। सरला जी बिल्कुल गुमसुम सी खिड़की के बाहर देख रही थीं। अपने बेटे की शादी और प्रिती को अपने परिवार में शामिल करने की इच्छा , चाहत , अरमान और ज़िद जो भी कहें यह सरला जी को ही था लेकिन आज वो इस कदर तट अस्त होकर अपने ख्यालों में गुम हैं जैसे ...... नेहा ने देखा अपनी मां को तो पास आकर जानना चाही की आखिर ऐसा क्या हुआ जो मां चुप हो गई ? मां की ही ज़िद के कारण तो पूरा परिवार राजी हुआ यह जानते हुए भी कि प्रीति ललित से उम्र में बड़ी है। शुक्र है कि देखने में बड़ी नहीं लगती है। बहुत प्यारी सी चुलबुली सी बिल्कुल नेहा जैसी। दोनों ननद भाभी में खूब जमेगी। नेहा ने नोटिस किया मां को पता नहीं चला कि वो उसके पास खड़ी है दो मिनट से तो उसने देखा उनकी नज़र किधर है और वो बेसाख्ता हंस पड़ी ..... अंगूर का बेल था थोड़ी दूरी पर। नेहा को शरारत सूझी उसने सभी को बाहर बुलाया शोर मचाकर और अंगूर के बेल के साथ दोनों परिवारों की तस्वीर ली। यह अंगूर का बेल वो नहीं था जहां से सरला जी की जिंदगी प्रेम का कोंपल जन्मा था । उनके आंखों में एक सपना सजने लगा था , दिल में अरमान जागें थें , मन मस्तिष्क में एक विचार कौंधा था ...... उस वक्त महज बारह साल की उम्र थी और आज उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं। कितना लम्बा वक्त गुजर चुका है। जीवन में कितने मोड़ आएं और कितना लम्बा सफर तय किया हम लोगों ने और आज फिर वहीं पहुंच गये हैं। सचमुच दुनिया गोल है। 

राज साहब की पत्नी एक और काॅफी पीना चाहती थी। हम सभी ने पिया कुछ घंटे पहले पी गई काॅफी और इस कॉफी के स्वाद में थोड़ा सा फर्क महसूस किया सरला जी ने। क्योंकि यह कॉफी राज साहब की बेटी प्रीति ने नहीं उनकी "बहुरानी प्रीति" ने बनाया था। अगली मुलाकात की तारीख पक्की हो गई थी अब सरला जी को अपने घर लौट कर अपने कान्हा जी को यह शुभ समाचार सुनाना था। उनकी बहुरानी मिल गई। इस घर की लक्ष्मी को उन्होंने देख लिया उसके आंखों में वही गहराई .... पानीदार चमकती आंखें जिसमें डूब जाने की चाहत तो थी मगर कभी हिम्मत नहीं हुई ‌। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की। आज बेटे के माध्यम से उन्हें उनकी खुशियां मिली है। अब वो अपने पोते का सपना देखने लगी .....।


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