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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy

4.2  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy

मेरी भूल

मेरी भूल

10 mins
658



पापा ने बताया था - "तुम्हें इससे अधिक योग्य लड़के मिलेंगे। अभी तुमने इस बड़ी दुनिया के एक शहर के लड़के बस देखे-जाने हैं।"

मैंने होशियार बनते हुए कहा था - "अगर शॉप पर पहला जोड़ा ही पसंद आ जाए तब अनेक वस्त्र देखकर कंफ्यूज होने से समय व्यर्थ ही होता है।" 

तब मम्मी ने पापा का समर्थन करते हुए कहा था - "एक क्लास में साथ के 25-30 लड़कों में ही तुम्हारे लिए कोई योग्य वर होता है, ऐसा तुम्हें प्रतीत हुआ है मगर यह सही नहीं होता है। शॉपिंग करने और अपने लिए जीवन भर का साथ चुनने में अंतर होता है।" 

मैं आज उस दिन की बात स्मरण कर रही थी। अपनी डिग्री पूरी करने के तुरंत बाद ही मैंने कुणाल से विवाह करने का अपना निर्णय पापा, मम्मी से बताया था। दोनों इसे मेरे विवाह का समय एवं कुणाल को मेरे लिए योग्य मानने को तैयार नहीं थे। मैंने जिद की थी और फिर सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में कुणाल जो मुझसे 1 वर्ष बड़ा था, के साथ मेरा विवाह कर दिया गया था। 

विवाह के तुरंत बाद हम यूरोप गए थे 15 दिन हमने इंग्लैंड एवं स्विट्जरलैंड घूमा था। आरंभ के दो माह हम मन का खाते-पीते, प्रणय-प्रेमालाप करते और खूब सोते रहे थे। यहाँ तक मुझे अपना निर्णय सही लगता रहा था। 

मैंने जॉब के लिए लिखित परीक्षाएं एवं इंटरव्यू देने आरंभ किए थे। चार माह के प्रयासों के बाद भी मैं कहीं जॉब पाने में सफल नहीं हो पाई थी। फिर मुझे पता चला था कि मैं गर्भवती हो गई थी। मैं इस समय माँ नहीं बनना चाहती थी मगर अब कोई उपाय नहीं रहा था। कुणाल भी यह नहीं चाहता था। 

मैंने उससे कहा था - "हमारे बच्चा होने का यह समय ठीक नहीं है। आप प्लानिंग करते तो हम ऐसी स्थिति में नहीं फँसते। "

कुणाल ने चिढ़ते हुए कहा था - "अब इसके लिए मुझे ही दोषी बताना ठीक नहीं है।"

कुणाल के मुख पर जो भाव थे, वह मुझे पसंद नहीं आए थे। यह पहला अवसर था जब मैंने प्रेम में पड़कर देखने से अलग, कुणाल को उसके गुणों के आधार पर परखना शुरू किया था। 

कुणाल में इतनी योग्यता नहीं थी कि वह अपने लिए कोई अच्छा जॉब प्राप्त कर सकता। उसके पास अपने पैसे वाले पिता के बिज़नेस में ही लगना एक विकल्प था। उसमें भी वह पूरे मन से काम नहीं कर रहा था। कुणाल के पापा जब तब उसे बिज़नेस में अधिक समय देने के लिए कहते सुनाई पड़ते थे। मुझे कुछ परेशानियाँ अनुभव हुईं थीं। मैं कुणाल के साथ डॉक्टर के पास गई थी। लक्षण, गर्भ में पल रहे शिशु के लिए ठीक नहीं थे। उन्होंने मुझे सावधानी और एक तरह से बेड रेस्ट के लिए कहा था। 

तभी मुझे, मेरे प्रेम में आसक्त रहे कुणाल से भिन्न कुणाल देखने मिला था। हम संबंध नहीं कर सकते थे इसलिए अब कुणाल मेरे साथ बेड पर सोने के स्थान पर टीवी देखते हुए पसर कर सोफे पर ही सो जाया करता था। 

मैंने कहा था -" जिस तरह की सामग्री तुम टीवी पर देख रहे हो उसका प्रभाव हमारे बच्चे के लिए ठीक नहीं है।"

कुणाल ने इसका अप्रत्याशित उत्तर दिया था - "तुम्हें उसकी चिंता है जो अभी पैदा ही नहीं हुआ है। तुम्हें मेरी ख़ुशी की कोई चिंता नहीं है। तुम भूल रही हो कि अब मैं तुम्हारे प्रेम में आसक्त तुम्हारे आगे पीछे घूमने वाला बॉयफ्रेंड नहीं बल्कि अब तुम्हारा पति हूँ। जो पति हो जाता है, वह प्रेमी जैसा पिछलग्गू नहीं बल्कि पत्नी से बड़ा हो जाता है। तुम अपने दायरे में रहो यह हमारे रिश्ते के लिए ठीक है। मुझे वह करने दो जो करना मुझे प्रिय लगता है।"

मैं कुणाल की रुखाई एवं बोलने के इस ढंग से क्षुब्ध रह गई थी। मुझे मम्मी-पापा याद आ गए थे। विवाह के पूर्व का उनका समझाना मुझे स्मरण आया था, जिसमें वे कुणाल को मेरे लिए योग्य वर नहीं बता रहे थे। कुणाल टीवी देखने लगा था। मैं बिस्तर पर अकेले सिसकते हुए लेटी रही थी। 

फिर यह सामान्य दिनचर्या हो गई थी। कुणाल मुझसे ही नहीं अपने पापा से भी बिज़नेस में ध्यान नहीं देने की बात पर उलझ जाया करता था। कुल मिलाकर मेरे आसपास जो वातावरण था वह मुझे मेरे गर्भस्थ शिशु के लिए ठीक नहीं लगता था। 

कॉम्प्लीकेशन होने के कारण डॉक्टर की दी गई डेट से 25 दिन पूर्व ही सी-सेक्शन के बाद हमारी बेटी जन्मी थी। समय से पूर्व होने के कारण उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता थी मगर बेटा नहीं बेटी होने के कारण, कुणाल ही नहीं मेरी सासु माँ एवं श्वसुर जी की ओर से भी नवजात शिशु के साथ ही मेरी भी उपेक्षा की जाने लगी थी। 

अब मुझे लगने लगा था कुणाल ही नहीं उसके मम्मी-पापा भी मुझसे एवं मेरी बेटी से छुटकारा चाहते थे। कुणाल की मुझसे उदासीनता को समझ कर अब वे भी मुझसे तिरस्कृत व्यवहार करने लगे थे। बेटी को देखना सिर्फ मेरा ही काम हुआ था, साथ ही बहुत से अन्य काम की अपेक्षा भी मुझसे की जाती थी। 

तब थकहार के मैंने कहा था - "इतना सब करने की मुझमें क्षमता नहीं है। बेटी के लिए एक आया रख दीजिए।"

सासु माँ ने कहा - "तुम्हारे व्यर्थ बहाने यहाँ नहीं चलने वाले, हमारे यहाँ आया के द्वारा नहीं, बच्चे माँ के द्वारा ही पाले जाते हैं।"

मेरी बेटी के जन्म पर मम्मी-पापा ने घर में अनुष्ठान रखा था। मैं घर (मायके) आई थी। उसमें सगे संबंधियों, मित्र एवं परिचितों सभी को आमंत्रित किया गया था। हमारे सब रिश्तेदार आए थे। कुणाल सहित ससुराल से कोई नहीं आया था। लोगों ने तरह तरह की कानाफूसी की थी। कुछ लोगों ने सीधे पूछा था - समधी, दामाद खुश नहीं हैं, क्या?

झूठे बहाने करना भी सरल नहीं था। हम क्या कह रहे हैं, लोगों ने इसे सुनने से अधिक हमारे उतरे मुख से मनोभाव पढ़ लिए थे। पापा-मम्मी सहित मुझ को अपमानित होना पड़ा था। 

सब चले गए तो पापा ने कहा था - बात लोग क्या सोचते हैं उसकी नहीं, बात यह है कि कुणाल विवाह करने के लिए जितना लालायित था इसे निभाने को उतना ही उदासीन दिख रहा है। ऐसे में कैसे इनका लंबा वैवाहिक जीवन चल पाएगा?

पापा ने कुणाल के पापा को फोन लगा कर कहा था - "आप सभी नहीं आए तो लोगों ने तरह तरह की बात की हैं।" 

उन्होंने कहा था - "आप कारण मुझसे नहीं कुणाल से पूछिए।" 

पापा ने कुणाल को कॉल कर यही बताया था। उसने अटपटा सा उत्तर दिया था - हमारा मन नहीं हुआ इसलिए हम नहीं आए थे। 

पापा ने पूछा - "क्या आपको अपनी बेटी की याद नहीं आई?"

उसने रुखाई से कह दिया था - "हाँ, नहीं आती। मैं इतनी जल्दी पापा बनना नहीं चाहता था।" 

बाद में मम्मी ने मुझसे पूछा था - "क्या बच्चे की जल्दी तुम्हें थी? "

मैं उत्तर देने के स्थान पर रो पड़ी थी। मम्मी ने मुझे गले लगाकर सांत्वना देते हुए कहा था - तुम चिंता नहीं करो सब ठीक हो जाएगा। 

कुणाल से विवाह मेरी जिद के कारण किया गया था। मैंने कुणाल से बात करने की कोशिश की थी। यह मेरा बड़ा अपमान था, कुणाल मेरे कॉल इग्नोर कर दिया करता था। मुझे समझ आया था, मुझे जीवन का अनुभव नहीं था। जीवन से सिर्फ आशा करना जानती थी। निराशा भी हाथ लग सकती है, मुझे पता नहीं था। जीवन भर के साथ का निर्णय करते हुए मुझे मम्मी-पापा की इच्छा एवं सलाह पर भी ध्यान देना चाहिए था। 

मेरा स्वाभिमान मुझे खुद से ससुराल जाने को रोक रहा था। फिर भी 15 दिन बाद मैं बेटी को लेकर वहाँ पहुंची थी। मेरे एवं बेटी से किसी ने कोई लगाव या प्रेम प्रकट नहीं किया था। मुझे अहसास हुआ था जैसे हमारा आना उनके लिए अवांछित था। 

मेरे प्रति उन सभी का प्रेम जल्दी ही मर गया था जबकि नन्हीं बेटी से किसी को प्रेम कभी हुआ ही नहीं था। दो महीने में मुझे इस बात की पुष्टि हो गई थी कि हम उन पर भार हो गए थे। कोई बेटी से प्रेम के दो बोल भी नहीं कहता था। जबकि मेरी उपयोगिता घर गृहस्थी के कामों की रह गई थी। अब कुणाल भी अधिकतर सोफे पर सोया करता था। कभी कभी मेरी देह का उपभोग करने के लिए कुछ समय के लिए शयनकक्ष में आता था। 

तब मेरे पापा को हृदयाघात का समाचार आया था। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मैंने कुणाल से कहा था -" पापा से मिलने चलिए। हमें साथ आया देखकर उनको जल्दी स्वास्थ्य लाभ हो सकेगा।" 

कुणाल ने कहा था - "अभी तुम जाओ, मैं कुछ अत्यावश्यक काम करने के बाद आऊँगा।" 

बेटी को लेकर मैं मायके आ गई थी। सात दिनों में पापा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। उनके घर आने के 15 दिन बाद भी कुणाल या ससुराल से कोई नहीं आया था। इस बार मैं बिना बुलाए ससुराल नहीं जाना चाहती थी। अब मुझे कॉल करके बात करने में संकोच होने लगा था। मुझे लग रहा था, मेरे प्रति अपनापन का भाव, मेरी किसी जबरदस्ती से उत्पन्न नहीं किया जा सकता था। 

यूँ तिरस्कृत रहते दो माह निकले तो मैंने पापा-मम्मी से कुणाल से डिवोर्स लेने की बात कही थी। पापा कमजोर अनुभव कर रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा था। मम्मी ने सहमति दी थी। 

मैं वकील से मिलने अकेली ही गई थी। वकील ने बताया था, आपसी सहमति के बाद भी डिवोर्स को स्वीकृत करने में समय लगता है। कुणाल को नोटिस भिजवाया गया था। कुणाल भी सहमत हुआ था। आठ माह बीतने पर कोर्ट ने हमारे डिवोर्स को स्वीकृत करने का निर्णय पारित किया था। कुणाल ने बेटी को लेकर कोई दावा नहीं किया था अतः बेटी मेरे पास ही रहनी थी। 

उस दिन कोर्ट से लौटते हुए एक पान की दुकान पर मैंने एक गीत बजता सुना था -

“किसी राह में, किसी मोड़ पर कहीं चल ना देना तू छोड़कर, मेरे हमसफर, मेरे हमसफर”

मेरी आँखें भीग गईं थीं। मैं सोच रही थी, कुणाल मेरा हमसफर था ही नहीं, होता तो यूँ छोड़ नहीं देता। 

पापा के हार्ट अटैक के बाद के इन 10 माह में अब तक मुझे समझ आ गया था, डिवोर्स मेरी समस्या का अपूर्ण समाधान था। पापा को आए अटैक से वे कमजोर हो गए थे। ससुराल से तिरस्कृत हुई (मैं) बेटी को संबल प्रदान करने में असमर्थ हो गए थे। 

इन दिनों में मैं सोचती थी अगर मैं कुणाल से विवाह नहीं करती तो अभी की 24 वर्ष की उम्र में मेरा अविवाहित रहना कोई असामान्य बात नहीं होती और ऐसे में पापा मुझे अभी जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं मानते। निश्चित ही यह पासपड़ोस एवं रिश्तेदारों की मुझे लेकर बातें थीं, जिससे मैं पापा को भार जैसी लगने लगी थी। 

मैं जॉब की कोशिश करती थी। पढ़ाई के बाद 2 वर्ष बीत जाने पर भी जॉब का कोई अनुभव नहीं होने से मुझे कहीं जॉब नहीं मिल पा रहा था। टीचर की नौकरी में स्कूल इतना कम वेतन दे रहे थे कि स्कूल जाने आने, तथा जॉब के लिए आवश्यक वस्त्रादि के बाद अधिक कुछ मेरे हाथ रहते नहीं दिखाई पड़ता था। तिस पर मेरे स्कूल में रहने के समय में मेरी 1 वर्ष की भी नहीं हुई बेटी को कौन देखेगा, यह भी यक्ष प्रश्न हो गया था। 

तब हमारे रिश्तेदारों में से एक निसंतान दंपति ने मेरी बेटी को गोद लेने का प्रस्ताव किया था। मेरे पापा-मम्मी यह चाहने लगे थे कि मैं इसके लिए सहमति दे दूँ। उनका तर्क यह था कि बेटी सहित मुझे कोई स्वीकार नहीं करेगा अर्थात मेरे पुनर्विवाह की संभावना क्षीण हो जाएगी। 

कुछ दिन मैंने इस पर विचार किया था। मैं अपनी बेटी का नन्हा प्यारा मुँह देखती और रोती थी। यह एक ऐसी बेटी थी जिसके पापा एवं माँ के होते हुए भी उसे किसी अनाथ जैसे, किसी अन्य के घर उनके लालन पालन में बड़ा होना था। परिस्थितियाँ ऐसी हुईं थीं, मैं पापा के पुनः हार्ट अटैक का कारण नहीं बनना चाहती थी। मैंने हृदय पर पत्थर रख कर स्वीकार किया था। 

बेटी विधिवत गोद ले ली गई थी। नन्हीं बच्ची को कुछ समझ नहीं आया था, यह सब क्या हो रहा था। उसके पिता ने उसे निष्ठुरता से एवं माँ (मैंने) ने लाचारी में उसका परित्याग कर दिया था। रोते हुए वह रिश्तेदार की दंपत्ति के साथ गई थी। उनकी कार में बैठकर उसका रोना बंद हुआ था, वह खुश हो गई थी। बड़ी होकर अगर कभी उसे यह पता चलेगा तो वह हमें और स्वयं को इस बात के लिए कितना धिक्कारेगी, इसका उत्तर भविष्य के गर्त में छुपा था। 

जहाँ तक मेरी बात थी मुझमें कोई उमंग नहीं बची थी। जिसे हमसफर समझ कर मैंने यह देहरी (पिता घर की) छोड़ी थी वह हमसफर था नहीं, वापस मैं उसी देहरी पर आई थी। अब मुझ परित्यक्ता को कोई ऐसा हमसफर मिलना था, जिसने अपनी पत्नी को कुणाल जैसा त्याग दिया था या जिसकी पत्नी असमय संसार से विदा हो गई थी। 

मैं हमसफर के तरह जीवन यापन करने की सामजिक रीति को भी दोष नहीं दे सकती थी क्योंकि अधिकाँश इसी तरह साथ जीते-मरते थे। दोष मुझे स्वयं का लगता था मैंने भ्रमवश अयोग्य व्यक्ति कुणाल को अपना हमसफर मानने की भूल की थी। 


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