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chandraprabha kumar

Inspirational

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chandraprabha kumar

Inspirational

क्षमा अब कैसे मिले

क्षमा अब कैसे मिले

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   जब हम छोटे होते हैं, हमें पता नहीं चलता कि हम कितनी गलतियॉं अनजाने में करते हैं और जब बड़े होते हैं, तो गलती का अहसास होता है, पर तब क्षमा मॉंगने का समय नहीं रहता, वह व्यक्ति जा चुका होता है कभी भी न लौटकर आने के लिये, और हमें क्षमा मॉंगने का फिर मौक़ा भी नहीं मिलता, रह जाता है एक घना अवसाद। 

  मेरी मॉं का सुबह का समय पूजा पाठ और गृह व्यवस्था में बीतता था। फिर बाद का समय दोपहर का भोजन बनाने और सबको खिलाने में। वह खाना स्वादिष्ट बनाती थीं, सबको प्रेम से खिलाती थी । सबको खिलाने के बाद उन्हें खाने में दोपहर के दो बज जाते थे। सुबह से निराहार रहने के बाद वही उनका पहला भोजन होता था। वह भी कभी कभी ही मौक़ा मिलता था। अधिकतर समय तो उनके उपवास ही चलते रहते थे और कार्तिक का पूरा महीना तो उपवास करते ही बीतता था।

  दोपहर जब उनका खाने का समय होता था, तभी बर्तन मॉंजने वाली महरी आ जाती थी। रसोई बड़ी थी। एक तरफ चौके में खाना बनता था, दूसरी तरफ़ बर्तन मले जाते थे। जब भी दो बजे दोपहर वह चौके में खाने बैठतीं उसी समय बर्तन मलने के लिए महरी आ जाती। वह कहतीं -"उन्हें शान्ति से भोजन भी नहीं मिलता, बर्तन की खटखट होती रहती है।" 

      दिन भर के काम से थकी होने के बावजूद वे शान्ति से खा भी नहीं पाती थीं। दोपहर को दो- तीन घंटा मिलता था और उसके बाद शाम का नाश्ता व चाय व फिर रात का खाना। फिर और बाक़ी के काम। सिलाई बुनाई भी वे घर पर ही करतीं थीं। उन्हें कभी आराम करते नहीं देखा। 

   दोपहर के दो- तीन घंटों में भी वे आराम नहीं करती थीं। न लेटती थीं, न सोती थीं। हमारे यहॉं बाज़ार से मिठाई या नमकीन बहुत कम आता था। घर पर ही मॉं सब चीज़ें बनाकर रखती थीं। पंजीरी, लड्डू ,मठरी ,शक्करपारे आदि घर पर ही बनाती थीं। घर पर ही पापड़ ,बड़ी ,चिप्स, अचार आदि बनते थे और ये सब काम वे स्वयं घर पर ही करती थीं। दोपहर में ही यह सब करने के लिए ख़ाली समय मिलता था। हम बहुत से भाई- बहिन थे। भाई जो बाहर पढ़ते थे या नौकरी करते थे,उनको भी अपने हाथ का बनाया नाश्ता भेजती थीं , और सबको खूब पसन्द भी आता था। हमारी मिठाई की आलमारी हमेशा भरी रहती थी। कभी पोस्त की पंजीरी से, कभी गोंद मेवे की पंजीरी से ,कभी बेसन के लड्डू से और मठरी से। 

   एक दिन दोपहर को उन्होंने बहुत सारा मठरी का आटा बड़ी मेहनत से गूँधा। उसकी बहुत सारी पेड़ी बनाई। रसोईघर की सफ़ाई के बाद सब सामान जोड़ा। तब तक गैस नहीं आयी थी। लकड़ी का चूल्हा जलता था उस पर मठरी तलने के लिए कड़ाही रखी। फिर यह सोचा कि काम जल्दी हो जायेगा, यह सोचकर मदद के लिए मेरी छोटी बहिन अर्थात् अपनी छोटी बेटी को आवाज़ लगाई, वही उस समय वहॉं पर थी। दो बड़ी बेटियों की शादी हो चुकी थी। उन्होंने छोटी बेटी को बुलाकर एक चकला बेलन दिया और कहा-" जरा साथ में मठरी बिलवा दो। जल्दी काम हो जायेगा। मैं भी अपने चकले बेलन पर मठरी बेलती रहूँगी और सेकती भी रहूँगी ।"

  छोटी बहिन को काम करने की आदत नहीं थी,वह चुलबुली तो थी ही, दोपहर में काम करना पसन्द नहीं करती थी। दोपहर में आराम करती थी या सोती थी। 

  उसने झल्लाकर कहा-" आप दोपहर में न ख़ुद आराम करती हैं ,और न औरों को आराम करने देती हैं ।यह कोई टाइम है काम करने का ? यह आराम करने का समय है और आपने इतना सारा आटा सान लिया। "

  मॉं यह सुनकर सकते में आ गईं। उन्होंने प्यार से उसे समझाना भी चाहा, पर बहिन समझने वाली कहॉं थी। उसमें बचपना और हाज़िरजवाबी बहुत थी और इसी से सब उसे 'पतंगा' कहते थे। 

    छोटी बहिन और भी बहुत कुछ बोलती रही । मॉं कब तक सुनती, उनका धैर्य चुक गया और उन्होंने ग़ुस्से में सारा आटा उठाकर बाहर फेंक दिया, सब मेहनत से गूँधा हुआ आटा रसोई से बाहर ऑंगन में जाकर गिरा। और मॉं कुछ कुछ बड़बड़ाती हुई रसोई से उठ गईं ।

  छोटी बहिन पर कुछ असर नहीं हुआ, वह खुश ही हुई कि-" चलो मठरी बेलने से छुटकारा मिला।" वह आटा बाहर से उठाकर भी नहीं लाई और चलती बनी। उसने सोचा- " छुट्टी मिली ,आराम का समय मिल गया।" उसने यह भी तब महसूस नहीं किया कि मॉं को कितनी पीड़ा हुई होगी। वे कबसे लगातार काम में लगी हुईं थीं और उन्हें जरा भी सहायता नहीं मिल सकी। 

   मॉं जब महीने भर का कार्तिक मास का उपवास रखती थीं ,तो एक समय ही फलाहार या हल्का कुछ लेती थीं। उनके इतवार के, बृहस्पतिवार के ,एकादशी के,पूर्णिमा के व्रत तो चलते ही रहते था। बहुत कम ऐसा होता था जब वे अपना बनाया खाना खा पाती हों। उनके खाने के समय कोई आस - पास होता था, तो वे एक आध चीज़ बुलाकर ले लेती थी, जो वे पहिले से रखना भूल जाती थीं। कोई ख़ास चीज़ नहीं, कभी अदरक, कभी नींबू या हरी मिर्च या थोड़ा सा नमक। 

    एक दिन छोटी बहिन से उन्होंने खाते समय कुछ मॉंग लिया। छोटी बहिन ने सामान दे तो दिया पर सुनाने से नहीं चूकी-" आप खाते समय भी चैन नहीं लेने देती हैं।" इस पर उन्होंने किसी को भी आवाज़ देना छोड़ दिया। खाते समय मौनव्रत धारण कर लिया। मौन होकर खाना खाती थीं। जो लेना भूल गईं, उसके लिए कुछ कहना छोड़ दिया। अपने पर उनका कठिन नियंत्रण एवं संयम था। 

       समय के साथ यह बात आई गई हो गई । कितना समय बीत गया। छोटी बहिन की भी शादी हो गई। गृहस्थी का भार पड़ा, तब उसे समझ में आया कि मॉं कितना काम करती थीं। सुबह चार बजे से उठकर लगातार रात ग्यारह बजे तक काम में लगी रहती थीं । कभी किसी से मदद नहीं मॉंगती थीं, चुपचाप काम में लगीं रहती थीं, न कुछ कहती थीं। तब समझ में नहीं आता था कि मॉं पर काम का कितना भार था। और उसे उन्होंने कितनी मेहनत से अच्छे से संभाला।

    उन दिनों के बजाय आज कल काम कितना हल्का है। अधिकतर चीजें बाज़ार से आ जाती हैं। नमकीन मिठाई सब बाज़ार से आ जाती हैं। कभी कभी बाहर जाकर भी खाना खा आते हैं जब घर पर बनाने का मन नहीं करता। घर में गैस आ गई है, फ़्रिज आ गया है। अब मिट्टी का चूल्हा गोबर से नहीं लीपना पड़ता। धुएँ में नहीं रहना पड़ता। 

    छोटी बहिन को अपने उस दिन के व्यवहार पर अब ऑंखों में ऑंसू भर आते हैं। वह कहती है- " उस दिन मुझे आटा फिकने पर कितनी ख़ुशी हुई थी ,पर अब समझ में आता है कि मॉं ने कितने दुःख से आटा फेंका होगा।"….."और मॉं ने खाने के समय मौन व्रत धारण कर लिया, क्योंकि उनके खाने के समय भी कोई नहीं रहता था, जोकि सबको खिलाकर अन्त में खाना खाती थीं ।"

       पर अब मॉं से क्षमा कैसे मॉंगे ? वह ममतामयी जननी तो स्वर्ग सिधार चुकी हैं। केवल अपना पश्चात्ताप ही शेष रह गया है। और बस उनकी ममता, संयम, कर्मठ ज़िन्दगी और सबके प्रति सेवाभाव याद रह गया है। 



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