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Prabhat Raghuvanshi

Abstract Tragedy Fantasy


4.9  

Prabhat Raghuvanshi

Abstract Tragedy Fantasy


खिजां का शजर

खिजां का शजर

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मुद्दतोंं बाद ढलते हुए आफताब के साथ

में आज फिर से आकर बैठ गया

मायूसियों के टीले पर तन्हा


बिलकुल ऐसे

जैसे सब्ज नज़रों के दरमिया खड़ा हो कोई

खिजां का शजर,


कि तभी अचानक से सामने आ खड़ी हुयीं 

दर-ब-दर भटकती हुयीं 

मेरी तमाम खुशिया 

और पूछने लगी मुझसे


कि आखिर क्या कमी है मुझमें

जो तुझे तेरी मोहब्बत नहीं मिली

और अब किस के इंतजार में बैठे रहते हो तुम 

यूं तन्हाई में इन मायूसियों के टीलों पर,


दरअसल मेरे पास कोई जवाब नहीं था

जवाब उन सवालों का जो दर-ब-दर भटकती हुयी

मेरी खुशियों ने मुझ से पूछा था


तो बस मैंने यूही मुस्कुराकर कह दिया 

सच कहूँ तो 

मैं आदमी बहुत अच्छा हूँ

और बहुत अच्छा होना ही मेरी खराबी है !


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