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Sarita Kumar

Fantasy


4  

Sarita Kumar

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जादुई दुनिया

जादुई दुनिया

5 mins 162 5 mins 162

कल रात बेहद तकलीफ़ , दर्द और चिंता में थी। डाइनिंग टेबल पर बेहद लज़ीज़ और स्वादिष्ट भोजन परोसा गया था। खुशबुदार और आकर्षक व्यंजन आमंत्रित कर रहा था चटोरी स्वभाव के वजह से चिंता फिक्र त्याग कर जा पहुंची। भोजन का आनंद लिया बच्चों को इनाम भी दिया। स्वादिष्ट भोजन पकाना ही काफी नहीं होता है उसे खुबसूरती से परोसना भी एक कला है और इस कला की कायल मैं बिना इनाम दिए कैसे सुकून पाती ? घर का गमगीन माहौल मेरी इस हरक़त से थोड़ा सा बदल गया और लगभग सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। लोगों को मुस्कुराते देखकर मेरा कलेजा भी जुड़ा गया। अपने पसंदीदा तकिया पर सर रखकर सोने की कोशिश में आंखें मूंद ली ....... न जाने कैसे मैं पहुंच गई एक जादुई दुनिया में और वहां पहुंच कर मैंने देखा कुमार कबड्डी खेल रहें हैं हालांकि उनका पसंदीदा खेल वॉलीबॉल और क्रिकेट रहा है। कबड्डी तो मेरा पसंदीदा खेल रहा है मगर पिछले सात आठ सालों से कबड्डी खेलना तो दूर सुबह-शाम का टहलना भी मोहाल हो गया है।

बढ़ती उम्र और क्षतिग्रस्त रीढ़ की हड्डी के साथ घंटे भर का पूजा-पाठ भी बंद हो गया है। ख़ैर मुझे अच्छा लग रहा था कुमार को दौड़ते-भागते देखकर क्योंकि दिन में जो इंजेक्शन लगा था उनके दोनों घुटने में वो मुझे दहला दिया था। न जाने क्यों मैं हताश हो गई उनके घुटने को देखकर काफी देर तक मौन रही निर्विकार निहारती रही। शायद मैं निराश होकर हारने लगी थी और गहरे अवसाद की ओर प्रस्थान कर रही थी। मेरे बच्चों को भनक लग गई इसीलिए उन्होंने बिना किसी विशेष वजह के ढेरों पकवान बनाए और कैंडल लाइट डिनर का इंतजाम किया। बेहद हसीन समां बंधा और शायद यही कारण था मेरे जादुई दुनिया में कदम पड़ने का। मैं अतिरेक आनंद से भाव विभोर हो गई। मैंने देखा अपनी मां को जो अंडे का हलवा बना रही थी और पापा आराम कुर्सी पर बैठे बैठे अपनी डायरी खोलकर कोई कविता सुना रहें थे मां को और मां उन कविताओं की पंक्तियां सुनकर सकुचाई शर्माई सी गर्दन झुकाए काम कर रही थी।

मुझे लगा बाहर गार्डन में चले जाना चाहिए और इसीलिए दरवाजे की तरफ चल पड़ी। बाहर का मौसम बेहद रोमांचक था ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही थी और बूंदा-बांदी शुरू हो गई मैंने आदतन हाथ फैला दिया और मेरी आंखें चौंधिया गईं मेरे हाथों में मोती थें मैंने दूसरा हाथ भी फैलाया दूसरा हाथ भी मोतीयों से भर गया मैंने अधिक मोतीयों को हासिल करने के लिए अपने दोनों हाथों को जोड़ा कुछ मोती छिटक कर नीचे गिर पड़ी और बड़ी मधुर सी आवाज़ सुनाई पड़ी। वास्तव में आसमान से मोतीयों की बरसात हो रही थी। कुछ ही देर में मेरा पूरा बागिचा मोतीयों से भर गया और ढ़ेर बनने लगा। यह कैसा चमत्कार है ..! तभी पापा की आवाज सुनाई पड़ी और मैंने सभी को आवाज़ देकर अंदर आने को कहा। अंदर पहुंच कर देखा वो सभी लोग मौजूद थे जिनमें से कुछ लोग तो धरती से विदा ले चुके थे।

ख़ैर उन सभी को देखकर बहुत खुशी हुई। हम सभी साथ में बैठकर खाना खाएं। सदियों बाद ऐसा अवसर आया जब हम पांच पुश्त एक साथ भोजन कर रहें थे और ताजुब तो इस बात की है सबके सब युवा लग रहें थे मेरी दादी मां , बुआ लोग , बड़ी मां , दीदी , भाभी और मैं भी यहां तक की 61 वर्ष के कुमार भी कबड्डी खेल रहे थे ...! आसमां से मोती बरस रहें थे और नल खोलते कॉफी , पेड़ों में फल के बजाए चाॅकलेट लटके हुए हैं। मैंने जो कहावत सुनी थी दूध की नदियां बहाना वो आंखों के सामने बहता हुआ देख रही थी .... बेहद हैरतअंगेज और रोमांचक लग रही थी यह दुनिया। मैं बहुत आनंदित थी अपने अपनों के साथ। बेहद उत्साहित और ऊर्जावान महसूस कर रही थी। मैंने बाहर देखा चिनार का पेड़ बहुत ऊंचा था उस पर कोई चिड़िया बैठी थी जिसकी कूक बेहद मधुर थी मगर वो स्पष्ट दिखाई नहीं दे रही थी मन में ख्याल आया की वो पेड़ थोड़ा छोटा होता तो देख पाती बस झट से वो पेड़ छोटा हो गया और मैंने देखा सतरंगी गौरैया बेहद प्यारी , चुलबुली और सबसे खास बात उसका मधुर स्वर कोयल जैसी।

मैंने दो चार तस्वीरें भी ली। कॉल-बेल की आवाज सुनाई दी "देखो तो कौन आया है ? पहचानो तो मैं कौन हूं "? ये कैसा कॉल-बेल है यहां ? भुनभुनाने हुए आगे दरवाजे की तरफ गई देखा कोई अजनबी था वास्तव में कौन है ? मैंने तो सचमुच नहीं पहचाना ? अंदर आने दिया और अपने कमरे में चली गई तिज़ोरी खोलकर एक तस्वीर निकाला और शक्ल मिलाने की कोशिश की .... शायद शायद यह अजनबी वही हैं .... यह ख्याल आते ही जल्दी से ड्राइंग रूम में पहुंचने की लिए बढ़ी और दरवाज़े से टकरा कर गिर पड़ी एक चीख सी निकली मेरे मुंह से और बेहोश हो गई। अब जब होश आया तो अनुभव हुआ वो सपना था। एक जादुई दुनिया का सफ़र महज एक सपना था।

जगने के बाद देखा मैं दूसरे घर में हूं और कुमार मस्त खर्राटे लेकर सो रहें हैं। हाथ से छूकर देखा घुटनों पर बैंडेड चिपका हुआ है। जादुई दुनिया को मैंने सपने में देखा था। हकीकत उससे बहुत अलग सा है। मगर फिर भी वो सब सोचकर मन पुलकित हो गया। काश ऐसा सचमुच हो जाता मैं अपने माता-पिता और उन रिश्तेदारों को फिर से देख पाती और वैसे ही एक साथ बैठकर बातें कर पाती ! अभी पितृपक्ष का समय चल रहा है बुजुर्गो से सुना था कि इन‌ पंद्रह दिनों में हमारे पुर्वज और मृत रिश्तेदार धरती पर उतरते हैं हमें देखते हैं और अपना आशीर्वाद देकर वापस चलें जाते हैं। शायद इसी पूर्व धारना की वजह से मेरे अचेतन मन में इच्छा उत्पन्न हुई होगी और इसीलिए मैंने देखा एक जादुई दुनिया का सपना जो हकीकत लगने लगा था।


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