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Dinesh Dubey

Inspirational

4  

Dinesh Dubey

Inspirational

गरीब

गरीब

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रघुनाथ एक छोटे से कस्बे का रहने वाला गरीब इंसान था, ।

टेलरिंग का हुनर उसके खून में स्वयं ही आ गया था अपने पिता की वजह से ,पर विरासत में मिली ग़रीबी अब आगे झेली नहीं जा रही थी...

रघु के पिता ने कभी मुम्बई में किसी बड़ी दुकान पर काम किया था पर गांव के जमीनी झगड़े ने पलट कर उसे गांव से वापस जोड़ दिया ....और फिर वही थोड़ा है थोड़े की जरूरत है वाली कहानी.....

गांव छोटा सा है यहां हुनर की क्या कद्र होती.... और ऊपर से वही था परिवार में पिता के बाद घर का बड़ा ....

उसके परिवार में वृद्ध माता छोटी बहन सहित उसकी पत्नी और दो बच्चे....

आखिर रघु ने हिम्मत बटोरी...और सुबह की बस पकड़ वह दिल्ली आ पहुंचा.... जहां उसने एक गुरुद्वारे में शरण ली....वहां रहने और खाने के साथ प्यार तो मिला ही साथ में एक श्रद्धालु के जरिए एक रैडिमेड कपड़े बनाने वाली फैक्ट्री का पता भी मिल गया....

हिम्मत करके आखिर वहां तक पहुंच ही गया....

वह उस बड़ी फैक्ट्री बिल्डिंग को देख पहले तो हिचका फिर साहस बटोर वह मुख्य द्वार से भीतर चला गया....।

रघुनाथ ने कहा “ क्या मुझे यहां काम मिल सकता है सर जी...

उसने मैनेजर की कुर्सी पर बैठे उस कुछ भारी बदन वाले सज्जन से पूछा...

वह झुका हुआ किसी रजिस्टर पर कुछ दर्ज करने में व्यस्त था....

मैनेजर के पास कुर्सी पर बैठे सूट -बूट वाले आदमी ने उससे पहले ही उस पर सवाल दागा....क्या काम जानते हो?

उसने कहा "जी टेलरिंग....!

सूट -बूट वाला आदमी शायद मालिक था उसने सर से पांव तक उसे देखा और फिर पूछा "....तुम्हारा नाम ....?

वह कहता है " जी.... रघुनाथ ..... रघु कहते है घर परिवार में सभी प्यार से....।

सेठ जी कहते हैं, "

भाई....रघुनाथ... मतलब रघु भाई

पहले तुम्हारी टेंलरिंग का इम्तिहान होगा...फिर तुम्हें काम दे सकता हूं.....बोलो...दोगे..।.

रघुनाथ ने सूखी आँखों में भरे आत्मविश्वास से कहा " जी ज़रूर ....बस सिर्फ़ यही तो हुनर है अपने पास...।

सेठ ने नौकर से कह कर भीतर से एक लहंगा मंगवाया..।

सेठ लहंगा दिखाते हुए बोले, " देखो रघु भाई....यह लहंगा बेहद कीमती है हमारे एक्सपर्ट टेलर ने इसे सिलने में कुछ ऐसी गलती की है ...की इसे पहनते वक़्त... यह इसका ख़ास डिज़ाइन साइड की तरफ़ चला जाता है...क्या तुम इसे खोल कर सैट कर सकते हो...अगर हां तो तुम्हारी नौकरी पक्की...।

रघु कहता है " जी.... मुझे मौक़ा दे... मैं कोशिश कर देखता हूं...।

सेठ उसे देख कहते हैं ".....कर सकते हो तभी हाथ लगाना...

बहुत महंगा लहंगा है हमारे वाला लहंगा एक्सपर्ट तो अपने हाथ खड़े कर गया....वैसे कितना समय लोगे...।

रघु कहता है " जी....सिलाई खोलकर ....यही दो घंटे....

सेठ उसकी ओर देख कहते हैं, " ठीक है अंदर साथ वाले कमरे में मशीन पर बैठ जाओ... पूरे तीन घंटे देता हूँ तुम्हें... ठीक है....।

रघुनाथ ने अपने मुंह से कुछ नहीं कहा बस लहंगा उठाया और कमरे में मशीन पर जा बैठा...

अभी सिर्फ एक ही घंटा बीता था वह उस भारी लहंगे को उठाए बाहर निकल आया ....।

सेठ ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखते पूछा...ठीक हो गया ?

जवाब में उसने लहंगा सामने मेज पर ला कर रख दिया...।

सेठ ने उसे उलट - पलट देखा और फिर पैक करवाकर बाइक पर एक लड़के को उस लहंगे की मालकिन तक पहुंचाने का आदेश दिया....

और कुर्सी पर बैठ कर चाय पीने लगा अभी उसने चाय खत्म ही की थी की सेठ को फ़ोन आया कि लहंगे की फ़िटिंग बिलकुल सही थी ...

मोबाइल रखते ही सेठ की आँखों में उसके लिए इज़्ज़त और कद्र बढ़ गई थी...।

सेठ पूछते हैं " घर कहां है आपका रघु भाई....कहां रहते हैं?

रघु कहता है " जी.... मैं तो लुधियाना के साधारण गांव से हूं यहां गुरुद्वारे मे रह रहा हूं...।

सेठ ने कहा " रघु भाई....आप परसों से काम पर आ जाओ...

25 हज़ार महीना और रहने खाने का खर्च भी हमारा होगा ....कहो.... मंजूर है....।

उसने हैरानी से कहा "जी 25 हजार....इतने में तो अम्मा बाबूजी छुटकी की पढ़ाई ....घरवाली बच्चों सहित सबका भरणपोषण अच्छे से हो जाएगा .....शुक्र है प्रभु तुम्हारा ....।

उसकी आँखों में सुनहरी चमक थी ...।.

उसने हैरानी से पूछा "मगर सेठजी परसों क्यों....आज या कल से ही क्यों नहीं !

सेठ ने कहा "भाई राजकुमार जी.... ऐसा है कि कल हम अपने पुराने वाले टेलर को जवाब देकर उसका हिसाब कर देंगे..।

रघु ने पूछा " क्या.....आप दोनों को नहीं रख सकते ..?

सेठ ने कहा "नहीं रघु भाई हमारे पास एक टेलर की ही जगह है..!

फिर तो सेठ जी मुझे माफ करना में काम नहीं कर पाऊंगा .....कुर्सी से उठ खड़े हो गया।

सेट जी आश्चर्य से पूछे "क्यों...क्या हुआ रघु भाई....

उसने कहा " मैं रोज़गार लेने घर छोड़ कर निकला हूं.....

किसी गरीब का रोजगार छीन कर पाप कमाने नहीं...

सेठ जी ...आखिर घर में जैसे मेरे छोटे -छोटे बच्चे है तो उसके भी होगे.....अच्छा जी राम -राम...

इतना कह वह गेट खोल झटके से बाहर निकल आया...

सेठ और साथ खड़ा मैनेजर भी रघु भाई की बात पर नतमस्तक थे....!!

सेठ ने उसे वापस बुलाया और गले लगा लिया बोला " आप जैसे सच्चे और समझदार इंसान की हमें बहुत जरूरत है आप यही काम करेंगे आपकी हर शर्त हमें मंजूर है।

रघु भाई की आंखों से आंसू टपक पड़े ,उसने ऊपर देखकर हाथ जोड़कर अपने स्वर्गवासी पिता को नमन किया वे सदैव कहते थे कि अपने फायदे के लिए किसी के पेट पर लात मत मारना रघु बेटा ।।



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