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Priyanka Kumari

Others


4.5  

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एकांत का चमत्कार

एकांत का चमत्कार

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अँधेरी रात थी, हवा बहुत तेज़ चल रही थी, बादलो के घुमड़ने की आवाज़ से मानो पूरा वातावरण एक नयी शुरुआत का आगाज़ कर रहा था। हर जगह सन्नाटा पसरा था। मैं अपने घर से निकल कर उस सन्नाटे को चीरते हुए पास के एक जंगल में एक पत्थर पे एकांत में जाकर बैठ गया। जंगल से थोड़ी दूर पे सड़क पर लगी स्ट्रीट लाइट और एक-दो बीच-बीच में जाती हुई गाड़ियां दूर से ही इतनी रौशनी मुझतक पंहुचा रहे थे कि मैं वहां के पेड़-पौधों को डोलते हुए देख तथा पत्तियों के परस्पर टकराने की मनोहर आवाज़ों से सुख का अद्भुत अनुभव कर रहा था। आज प्रकृति की गोद में मैं वो सारे सवालों के जवाब ढूंढ रहा था जो बरसो से मन में उमड़ते रहे हैं और उनका जवाब मिलना कठिन भी है। आज की रात जीवन की उन चुनिंदा रातो में से एक हैं जब मैं अपने भूतकाल में झांकने की कोशिश कर रहा था।


आज वो दिन याद आ रहे हैं जब हमारा परिवार बिखर गया था, पिताजी-माताजी एक दूसरे से अलग हो गए थे, पूरा जीवन जैसे बदल गया था और मन में बहुत से सवाल छोड़ गया था। मेरी सड़क दुर्घटना मेरे जीवन की सबसे बड़ी अनहोनी थी और इस दुर्घटना ने मुझमें कुछ ऐसे शारीरिक और मानसिक रूप से परिवर्तन कर दिए थे की एक तरफ जो मेरा एकमात्र सपना था 'सुरक्षा बल' में जाने का जैसे चन्द मिंटो में बिखर गया मानो जीवन का कोई मकसद ही न बचा हो। मानसिक तौर पे जहाँ इस घटना ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया वहीं दुनिया को देखने का मेरा नज़रिया भी बदलना शुरू हो गया था। इतना ही नहीं कुछ साल बाद मेरे कुछ परम मित्र मेरा साथ छोड़ इस दुनिया से चले गए जिनके साथ जीवन जीने का हौसला मिला था, भविष्य की तैयारियां की थी और फिर पिताजी की मृत्यु जो एक हल्का सा मनोबल था कि हाँ वो दूर भले ही हो पर हमारे ही हैं जो कभी सुखद अनुभव करा जाती थी, वो एक आस भी चली गयी। कहते हैं न की भगवान् जब भी देते हैं और जो भी देते हैं छप्पर फाड़ के, कुछ ऐसा ही मेरे जीवन में दुखो का अपार सागर बह रहा था।


इन सब परिस्थितियों ने मुझे ऐसा बना दिया था कि आज मैं उनसब घटनाओं का ऋणी भी हूँ। क्योंकि आज मैं जो हूँ वो पहले कभी नहीं था। आज मुझमें जो हिम्मत है, दुनिया को देखने का आशावादी तरीका है, हर छोटी चीज़ों में खुशियां ढूंढने की कोशिश, हर दिन अपना सर्वोत्तम जीना, खुश रहना न रहना हमारा विकल्प होता है , पहले से आज मैं बहुत परिपक्व हूँ। आज मेरे लिए जीवन अच्छे से जीना सर्वोपरि है। परंतु सवाल आज भी हैं मन में; सवाल ये हैं कि क्या जीवन में इनसब परिस्थितियों का आना आवश्यक था मुझमें बदलाव आने के लिए; अगर भूतकाल की परिस्थितियां नहीं होती तो क्या आज मेरा जीवन कुछ अलग होता, अच्छा होता या और बुरा होता, क्यों कुछ लोगो के जीवन में सब हितकर और कुछ लोगो के जीवन में इतने दुःख हैं? क्यों कुछ गरीब जीवन भर गरीब ही रह जाते हैं और क्यों कुछ गरीबी से आगे बढ़ अपना रास्ता निकाल लेते हैं और क्यों कुछ लोग अमीर ही होते हैं हमेशा। इस दुनिया में इतनी असमानताएं क्यों हैं ?


जब मैं खुद को देखता हूँ तो सोचता हूँ भगवान् की दुआ से मुझे कम से कम पैसों की कमी नहीं हुई। आर्थिक रूप से जो भी जरूरतें पूरी हो सकती थी, मुझे अपनी माताजी की दुआ से सब मिला है। मेरी माताजी आर्मी अफसर रही हैं, मेरा और मेरी बहन का लालन-पालन उन्होंने हमारी सारी जरूरतों को अच्छे से पूरा करते हुए किया है, कभी किसी भी चीज़ की आर्थिक रूप से दिक्कत होने नहीं दी। मैं और मेरी बहन चाह के भी कभी उनके इन एहसानों की पूर्ति नहीं कर पाएंगे शायद, हम दोनों माताजी के सदैव बहुत-बहुत आभारी हैं। परंतु मन में द्वन्द भी इसी चलते आता है, मैं ये सोचता हूँ की किस्मत हर किसी को समान सुख सुविधाएं क्यों नही देती, कुछ लोगो को दिन में एक-जून की रोटी भी नसीब नही होती और कुछ लोगो को भोजन व्यर्थ में फेंकना भी पड़ जाता है। मैं खुद को अपने करियर की तरफ देखता हूँ तब भी मन में सवाल उठते हैं कि कुछ लोग बचपन से ही बहुत मेहनत करते रहे हो तो भी उस मुकाम पर नही पहुच पाते जो कुछ लोग उनसे आधी मेहनत करके भी पहुच जाते हैं। जीवन के हर मोड़ पे इतनी असमानताएं क्यों हैं ?


आज मैं अपने जीवन के उन सभी सवालों के जवाब ढूंढ रहा हूँ जिन्होंने ऐसा अंतर्द्वंद पैदा कर दिया है मुझमें की समझ नहीं आता कौन सी राह पकड़ूँ मैं, जहाँ खुश भी रहूँ और मेरे जीवन का मकसद भी कुछ अच्छा हो। मैं जब-जब ये सोचता हूँ की 'सुरक्षा बल' में प्रवेश लेने का मेरा सपना मेरी सड़क दुर्घटना की वजह से पूरा नही हो सकता , तब मेरा दिल बार-बार विह्वल होता है। मुझे खुद को ये बात समझाने में तीन साल लग गए और मैंने सुरक्षा बल की परीक्षाओं को देना छोड़ दिया जहाँ मेरा दिल तो था परंतु चयन प्रक्रिया में आगे नही बढ़ सकता था। कहीं न कहीं मैं अपने सपने को जीने का कोई भी छोटा सा पल ढूंढता रहता था और समय ऐसे ही निकलता जा रहा था। परंतु आज मैंने सच्चाई को स्वीकार कर लिया है, जब तक हम अपनी सच्चाई स्वीकार नहीं करते हैं हमें और कोई राह भी नहीं मिलती है। आज मैं खुश हूँ की मैंने अपना भूतकाल और उससे हुई असुविधाओं के बारे में सोचना छोड़ दिया है। आज मैं अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हूँ और आगे बढ़ भी रहा हूँ। जीवन जब आपको ऐसे मोड़ पे लाकर रख देती है जहाँ आप अपनी इच्छा के अनुसार नहीं बढ़ सकते तब मानो आपमें ऐसा आक्रोश उत्पन्न होता है जो असहनीय होता है किंतु यही आक्रोश आपको सर्वोच्च मति भी प्रदान कर जाता है। आज मैं हर चीज़ में ही सुंदरता ढूंढ लेता हूँ, चाहे करियर से सम्बंधित हो या फिर जीवन का कोई भी पहलु। मैं अब बहुत खुश रहता हूँ। मैं आज अपने जीवन में आगे बढ़ता जाता हूँ। आज जीवन ने मुझे ऐसा बना दिया है कि मैं मुश्किल की घड़ियों में भी राह ढूंढ लेता हूँ और न खुद टूटता हूँ न अपने प्रियजनों को टूटने देता हूँ। आज मैं शांत चित्त के साथ आगे बढ़ रहा हूँ और बढ़ता ही जाऊँगा।


अचानक से कहीं दूर सड़क से किसी जाती हुई गाड़ी की तेज़ रौशनी मेरे चेहरे पर पड़ती है और मैं जैसे वापस अपने भूतकाल से वर्तमान में आ गया। और एक हल्की सी मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी। मैं उसी पत्थर पे बैठा ऊपर पेड़ो के बीच में चाँद को निहारने लगा। अब मौसम भी साफ़ हो गया है। आज की रात सुहानी है और मेरा मन आज बहुत खुश भी है क्योंकि मुझे ये पता चल गया कि जीवन में जो भी लम्हें हमें मिलते हैं उन्हें भरपूर जीना चाहिए, हमारे जीवन में जो भी कभी कुछ बुरा होता है उसके पीछे कोई न कोई महत्वपूर्ण कारण जरूर होता है और हमारे व्यक्तित्व को समय के साथ निखारता जाता है। और जो चीज़े हमारे वश में नहीं होती उसके बारे में व्यर्थ में ही सोच के हम स्वयं को परेशान ही करते हैं। जो भी चीज़े आज हमारे समक्ष हैं और अपने हाथ में हैं उस पर ही ध्यान देते हुए जीवन में आगे ख़ुशी-ख़ुशी बढ़ते जाना चाहिए। और मैं उसी मुस्कान के साथ इस जंगल से बाहर निकल रहा हूँ और अपने घर वापस पहले की अपेक्षा कहीं बेहतर एवं आशावादी नज़रिये के साथ जा रहा हूँ। 


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