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AMIT SAGAR

Abstract

4.4  

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दर्दे बचपन

दर्दे बचपन

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बच्चे मन के सच्चे होते हैं बच्चे भगवान का रूप होते हैं ना जाने ऐसी कितनी ही कहावतें बच्चों के बारे में कही जाती हैं । पर क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा दर्द बच्चे ही सहते हैं वो और बात है कि सबसे ज्यादा प्यार भी उन्ही को मिलता है । पर सुख सहने की उनकी उम्र है दुख सहने की नहीं । बच्चों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि वो अपना दुख किसी को बता नहीं सकते । पर यह भी कहना सही नहीं होगा कि सभी बच्चो को यह दर्द सहना पड़ता है । बात लेते हैं एक गरीब या सामान्य परिवार के घर में जन्में बच्चे की पैदा होने से पहले ही नौ महीने उसे ऐसे काटने पड़ते हैं जैंसे किसी मुजरिम को सजा काटनी पड़ती है । नौ महीने गुप्त अंधेरे मे रहने के बाद वो बाहर की दुनिया देख पाता है जिस दिन बच्चे का जन्म होता है उसी दिन से दुनिया भर के धुऐं धफाड़े घर की चौखट पर कर दिये जाते हैं क्यों ,-क्योंकि बच्चे को गन्दी हवा ना लगे । अरे भाई ये कैसी रीत है बच्चे को हवा ना लगे धुंआ चाँहे कितना भी लगे । धुंऐ के कारण बच्चे की आँखे लाल हो जाती हैं औेर वो दहाड़े मार मारकर रोता है और परिवार वाले उसका रोना सुनकर खुश होतें है , कहते है बच्चा बोल सकता है अवाज है बच्चे में । अबे अक्ल के अन्धो उसके दर्द को समझो बेचारा बच्चा इस लियें रो रहा है क्योंकि उसकी आँखो में धुंआ लग रहा है तुम्हे गीत या ग़जल नहीं सुना रहा जो तुम इतने खुश हो रहे हो । खैर कोई बात नहीं बच्चा पैदा होने के बाद गीतों का रिवाज ढोल नगाड़े बजाने का रिवाज आठ दस दिन तक घर में डेग डफाड़े सभी अपने अपने रंग में मस्त हैं जौर जौर से गीत गव रगें हैं और बच्चा फिर जौर जौर से रो रहा है , इस पर परिवार वाले फिर से खुश होते हैं , कहते हैं बच्चा सुन भी सकता है कान भी सही सलामत हैं बच्चे के , भई हद हो गई अरे भाई जब आप नाजूक नाजूक कानो को इतना कष्ट दोगे तो बच्चा रोयेगा नही तो क्या तुम्हे अरिजीत की अवाज में गाने सुनायेगा ,और ये क्या चार पाँच दिन के बच्चे पर इतना जुल्म बच्चा बोल भी सकता है बच्चा सुन भी सकता है बच्चा देख भी सकता है अगर कुछ बाकी रह गया हो तो वो भी चैक करा लो शादी करा दो बच्चे की देख लो बच्चा बाप भी बन सकता है या नहीं । खैर यह बात खत्म होती है हफ्ता महिना चैन से कटता है पर बच्चे पर फिर मुसीबत का पहाड़ टूटता है आये दिन मेहमानो का लंगर जिसे देखो मुँह उठाकर चला आता है और आते ही बच्चे को उठाया और लगा चूमने अब चाँहे बच्चा सो रहा चाँहे कुछ सोच रहा हो या हो सकता है कोई हसीन ख्वाब देख रहा हो सायद अपनी होने वाली गर्लफ्रेन्ड के या फिर बच्चे को मेहमान की शक्ल ही पसन्द ना हो पर बच्चा बोल थोड़ी ही सकता है मेहमान से कि तु काला है तु मोटा है तु नाटा है तु चपटा है मुझे तेरी सूरत पसन्द नहीं । पर ये साले मेहमान उसे उठाकर उसके सारे सपने तोड़ देते है मुँह पर थूक लगाया सो अलग । बेचारे को गुस्सा तो बहुत आता है और मारने के लियें हाथ भी चलाता है पर उसके फूल जैंसे कोमल हाथ मेहमानो की मोटी सख्त चमड़ी पर क्या असर करेंगे फिर बेचारा सोचता है बड़ा होकर इन चपड़गन्जुओं से जरुर बदला लुंगा और अपने भोले से मन को तसल्ली दे देता है । दो तीन महिने ऐसे ही बीत जाते हैं बच्चे को होशियार होते देख माँ घर के काम पर ज्यादा ध्यान देती है और बच्चा घंटो घंटो गीले कपड़ो में दहाड़े मार मारकर रोता रहता है और माँ काम करते हुए कहती है यह तो इसका रोज का काम है बताईये दुनिया रोज ही यह काम करती है बच्चा क्या कुछ नया कर रहा है । बस उसकी यह गलती है कि चार महिने की उम्र में वो चल फिर नहीं सकता बोल नहीं सकता । थोडा़ ओर बडा़ होने पर कभी बच्चा मुँह में मिर्चे दे लेता है कभी गरम चीज चिमटा आदि को पकड़ लेता है ।

एक दिन वही बच्चा बडा़ होकर मेहमानो का समान छिपाकर या तोड़कर या फिर मेहमानो की खिल्ली उडा़कर बुआ को पुआ ताऊ को नाऊ कहकर अपने बचपन का बदला ले लेता . . . . . . . . . . . . . . . . 


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