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Nirbhay Pratap CE 30

Tragedy


4.5  

Nirbhay Pratap CE 30

Tragedy


देवता

देवता

10 mins 470 10 mins 470

"बाबा! आप रो क्यों रहे हैं?"

अनिष्टाशंक मोहन ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भरे सन्यासी कि ओर देखते हुए आखिरकार पूछ ही लिया। 

प्रत्युत्तर में उस जोगी ने बस प्रेम से उसके सर पर हाथ फेर दिया। जिज्ञासा की भरपुरता होने के बावजूद न जाने किसी कारणवश उसने कोई भी प्रश्न पूछने का इरादा छोड़ दिया। वो दोनो खेतों के बीच बनी पगडंडियों से गुजर रहे थे। मोहन के मन में कई सवाल थे , आखिर ऐसा क्या मेरे आकस्मिक आगमन से हो गया ?हालांकि मुझे पता है की ये साधु सन्यासी रहस्यवादी हुआ करते हैं किन्तु मेरे मंतव्य का , उद्देश्य का पाला तो इन लोगों से रोज पड़ा करता है। कहीं इनके आसुओ की वजह मैं तो नहीं ? 

पुण्यभूमि भारत में ना जाने कब से कितनी सभ्यताएं आईं और गईं कितने ज्ञान के कोष भरे और उजड़े और ना जाने कितने ही विज्ञानों को इस देश ने अलग अलग वर्गों में व्याप्त कर दिया। कालांतर में पेशे के रूप में तब्दीलियां हुईं, बिरादरियां बनी और उजड़ी ।इस देश की यही खूबी है यहां आज भी ढेरों समाज हैं जो अपनी परंपरा को जीवित किए हुए हैं । ऐसा ही एक समाज का वर्ग है जिन्हे सपेरा कहा जाता है। सपेरों की अपनी एक परंपरा रही है, सांपो को पहचानने की , उनके द्वारा संभावित खतरों की ,दुनिया की हर सरीसृप की विशेषता से यह जात परिचित हुआ करती है।

 मोहन के साथ चल रहे सन्यासी इसी बिरादरी का हिस्सा थे, वे बहुत कम बोला करते थे , ऐसा नहीं की वह स्वार्थी थे , वे अपनी पूरी जान की बाजी भी अपने मरीज को बचाने में लगा दिया करते , किन्तु मेहनताना नहीं लेते, अधिक प्रार्थना आने पर कुनबे में भिजवाने को कह दिया करते ।

 एक रहस्य कि भांति उनकी जीवनशैली थी, जिसे कोई तोड़ना नहीं चाहता था। कुनबे में उनको बहुत सम्मान प्राप्त था , सभी उनको बाबा कह कर पुकारते । वो कहीं से आए थे और इस कुनबे के होकर रह गए थे। 

"घर पर तुम्हारे कौन कौन है?" छाए सन्नाटे को तोड़ते हुए और मोहन को अपनी आवाज से विस्मित करते हुए सन्यासी ने कहा। 

"हम्म! घर पर मां , दादाजी और साथ में बिट्टू तो होगा ही , उसे ही न सांप ने काट लिया है । 

"तुम तो उसके बड़े भाई हो , तुम्हे ख्याल रखना चाहिए , अकेले वो बगीचे में क्या कर रहा था? 

पता नहीं बाबा , बगीचे में वो पेड़ के नीचे खेल रहा था शायद, मैं तो अन्दर अपने परीक्षा की तैयारी कर रहा था। 

"तुम्हे पता होना चाहिए , चंदन के पेड़ के पास वो भी भरी दुपहरी में किसी को जाना नहीं चाहिए।

"पर आपको कैसे पता चला , की मेरे बगीचे में चंदन का पेड़ है? हैरत भरे स्वर में मोहन ने पूछा। 

सन्यासी ने कुछ जवाब न दिया । उसका रुख अब कठोर हो चुका था। कुछ बची थी तो वह थी उसकी आंखो में गहरी स्याह अतीत की परछाई जिसमें वो हर रोज़ हर पल जिया करता था। 

सन्यासी अब अपने अतीत की याद में पूरी तरह आ गया था। उसे याद वो समूचा घटनाक्रम आ रहा था, जिसने उसके समूचे जीवन में उथल पुथल मचा कर रख दिया था। 

उसका मूल नाम आलोकनाथ था। वो अपने गांव के सबसे होनहार छात्रों में से था। आलोकनाथ अपनी स्नातक का रिजल्ट लेकर अपने पिताजी , जिनका नाम महेंद्र बाबू था, के पास आ पहुंचा था, उन्होंने रिजल्ट और प्रशस्ति पत्र देख आलोक को अपने गले से लगा लिया था। घर पर खूब धूम हुई , उसकी माता और भाई विजय फुले न समा रहीं थीं। रिश्तेदार आए , और ढेरों बधाईयां दी गईं। जल्दी ही आलोक को फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में साक्षात्कार हेतु जाना था। रात यूं बीती मानो उत्सव खुद उनके साथ धरती पर समय काटने आया था।

कुछ दिन बीते, आलोक को अब साक्षात्कार हेतु बस पकड़कर नैनीताल जाना था सो वह सुबह की बस में जाकर बैठ गया। कुछ समय बाद बस यात्रियों से भर गई। बस के चलने पर आलोक को ध्यान आया कि उसके बगल में उसकी ही हमउम्र एक हमसफ़र बैठी हुई थी। बाहर के नजारों में व्यस्त वो उसे देख ही न सका जो उसके जीवन का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रही थी। 

"आपको कहां जाना है? 

"नैनीताल" सकुचाए हुए शब्द उस कामिनी के स्वर बनकर फूटे। आलोक को समझ ना आया की वो और क्या पूछे , एक व्याप्त मौन की अरदास जो वो चाहते थे , जिसे बाहरी कोलाहल भंग किए दे रहा था ने उन्हें विशेष बातचीत करने नहीं दिया।

अचानक आलोक ने देखा उस तरूणा के बाएं हथेली में से रक्त रिस रहा था। जिसे वह बाकी जनों से छिपा कर बैठे हुए थी। आलोक ने झट से अपना रुमाल निकाला और उसे दिया ,किन्तु इस आकस्मिक आमंत्रण को युवती ने विशेष महत्व न दिया तो आलोक ने बिना कुछ पूछे अपने हाथों से उसके घाव पर रुमाल को बांध दिया और अपनी सीट भी बदल ली।

सीट बदलना आलोक के क्रोध का द्योतक था , वह क्रोध जिसमें उस युवती के प्रति उसकी अनासक्ति की अभिव्यक्ति थी और स्वाभाविक मानवता के हुए तिरस्कार का प्रतिरोष छिपा हुआ था।

बस से उतर गए आलोक को पता था कि पूरे सफर के दरम्यान उस युवती ने उसे घूरा है किन्तु इन बातों का उसके व्यक्तित्व से कोई वास्ता न था। आलोक ने साक्षात्कार दिया और वापस अपने घर आ पहुंचा। जल्द ही आलोक को विवाह का प्रस्ताव आया और आलोक ने मना कर दिया। कारण ? ये वही बस वाली देवी थीं। नाम भी ज्ञात हुआ- अनामिका। परिवार के लाख मनाने पर भी आलोक ने विवाह को हामी नहीं भरी। फिर भी उसके परिवार ने उसकी अनिच्छा को उसकी चंचलता मानते हुए दोनों परिवारों की बैठक रख ही दी। 

किसी शुभ दिवस पर एक मंदिर में "मिलनी" की रस्म हुई। यह वर और कन्या पक्ष की एकसाथ विवाह को एक बैठक हुआ करती है । इसमें वर और कन्या को एकसाथ मिलने का मौका भी दिया जाता है। 

आलोकनाथ अपने अड़ियल रवैए को लेकर तैयार थे , और पूरी तैयारी कर के आए थे । पर जब कन्या के सामने आए तब उसके लावण्य ने उन्हें सम्मोहित कर दिया। हालांकि फिर भी उन्होंने तन कर पूछा जरूर, " उस दिन जब मैंने रुमाल दिया तब आपको क्या शिकायत हो गई थी हमसे? " ये सुन वो खिल खिलाकर हंस दी। और उसकी प्यारी हंसी के साथ आलोक का गुस्सा भी रफ्फूचक्कर हो गया।

अब प्रेम ने एक विशेष स्थान दोनों ही हृदयों में बना लिया था। विवाह हुआ , और यूं धूमधाम हुई की पूछो नहीं। 

कुछ दिन बीते। जल्द ही आलोक को ज्वाइनिंग करने सिक्किम जाना था। अब वक़्त को दोनों परिंदों के वियोग से पूर्व के संवाद का गवाह बनना था।

"क्या जाना जरूरी है, कुछ दिन और नहीं रुक सकते ?"

"ओह, बाबा ये ज्वाइनिंग है , वो तो करनी ही होगी न , वर्ना नौकरी भी छूट जाएगी।"

"लेकिन अभी अभी तो कुछ हफ्ते बीतें हैं हमारे मिले!!"

"हां ! किन्तु जाना तो होगा न, मैंने तुमसे वादा किया ही है जल्द ही छुट्टी लेकर आ जाऊंगा।" 

उसके बाद एक सन्नाटा सा छा गया , दुख , संताप , और वियोग से भरा सन्नाटा जो आलोक के जाने तक नहीं टूटा , और टूटा तो क्रंदन के साथ कुछ शब्द वातावरण में फैले।

                

"इस वक़्त की ताजा खबर है , सिक्किम को रवाना यात्रियों से भरी बस एक तेज़ पुल पर अनियंत्रित हो नदी में गिर गई है। बस में सवार यात्रियों की खोजबीन की जा रही है और राहत कार्य जारी हैं। हमारे संवाददाता को मिली जानकारी के अनुसार गोताखोरों की सहायता भी ली जा रही है और घायलों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। "

बस का नंबर टीवी पर देखते ही महेंद्र बाबू दहाड़े मार कर रोने लगे। वो वही बस थी जिसमें आलोकनाथ बैठा था। अब परिवार को काटो तो खून नहीं। आनन फानन में महेंद्र बाबू और विजय ने जीप बुक की और घटनास्थल की ओर रवाना हो गए। वहां उसे बहुत खोजा , स्थल पर पूरी जांच की , लोगों ने उसे देखे जाने की बात बताई , लेकिन वर्तमान स्थिति से हर कोई अनजान था। तनाव पूर्ण स्तिथि में विजय ने अस्पताल में पहुंचने की सलाह दी , और वे दोनों वहां पहुंच गए। वहां जहां तहां खोजने पर एक बिस्तर पर उनकी नजर टिकी , जहां नीचे आलोक के जूते रखे हुवे थे। टेबल पर एक चित परिचित माला थी और चादर और तकिए का हिस्सा लाल लहू से भीगा हुआ था।

वहां पहुंच महेंद्र बाबू फुट फुट कर रोए, वो यकीन करने को तो तैयार नहीं थे पर अब यही एक निशानी उनके पास थी ।उसे लेकर वे अन्य जगहों पर भी गए जैसे मोर्चरी, पोस्टमार्टम हाउस लेकिन आलोक के चिह्न और कहीं भी न मिले। 

भारी मन से महेंद्र बाबू और विजय अपने घर लौट आए। अनामिका को जब पता चला तो वह फुट फुट कर हफ्तों रोती चली गई, दिन हफ्ते, हफ्ते महीने और महीने साल बन गए और वह कृशकाय हो चली। दुख पीड़ा और तनाव ने उसपर इतना आश्रय ले लिया था जिसका कोई अंत नहीं था। इसी अवसाद में उसका गर्भपात भी हो गया। 

अनामिका के पिता से उसकी हालत देखी नहीं जाती थी। वे बार बार महेंद्र बाबू को फोन करते और उसकी तबीयत का जायजा लेते । लेकिन दुख ने अनामिका के में एक स्थाई निवास बना रखता था जिसका प्रभाव समय के प्रवाह से नहीं मिटता था।

आखिरकार उसके पिता ने एक आग्रह महेंद्र बाबू से किया। अनामिका और विजय की शादी का प्रस्ताव। दोनों परिवारों में से किसी को कोई विशेष आपत्ति भी न हुई। हालांकि विजय और आलोक की मां रह रह कर इसका विरोध करती थी। कहती थी ,"आलोक आएगा, वो मेरा बेटा है। मैं उसे जानती हूं , वो मुझसे ज्यादा दूर नहीं रह सकता। किन्तु उनकी इन तमाम बातों के निष्कर्ष में उनके पागल कह दिया जाता। 

अनामिका को उसके परिजनों की गुहार को स्वीकारना पड़ा। बिना किसी गाजे बाजे के घर में ही शांतिपूर्ण विजय और अनामिका की शादी हो गई। विजय को दो संताने हो चुकीं थीं , मोहन और बिट्टू ,आज इसी बिट्टू के शरीर में फैला जहर जहां शायद उसकी मौत को बुला रहा था । वहीं एक मसीहा सा बन कर एक सन्यासी उसे जीवन दान देने जा रहा था। 

घर सकुचाते हुए आना हुआ , वो गलियां जिनमें वो बड़ा हुआ था मानों उसको गले लगा रहीं थीं । बाहर लगा बरगद मानों झूम झूम कर अभिवादन कर रहा था। एक अनोखी भीड़ जमा तब हो गई , जब महेंद्र बाबू ने आलोक को पहचान लिया और चिपट कर रोने लगे। पिता से गले लग , आलोक भी फूट फूट कर रोए। वहां मौजूद सभी वरिष्ठ जनों ने आलोक को पहचान लिया लेकिन एक विचित्र सा सन्नाटा छाया रहा जिसमें कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। 

"चलो , एक गेहुवन ने भेंट आखिरकार कराई , वर्ना मैं तो आने वाला था नहीं।" आलोक ने बिट्टू की पट्टी करते हुवे महेंद्र बाबू से कहा। "तुम सबकी बहुत याद आती है ,बाबा! "

"तू कहां था , आया क्यूं नहीं ,हम सभी तेरे बिना पागल हो गए यहां।"

"दुर्घटना के बाद मैं चार किलोमीटर दूर सपेरों के हाथ उनके घाट पर जाकर लगा। मेरे सर पर चोट लगी थी , जब होश आता था , भयंकर पीड़ा होती थी और मैं फिर अचेत हो जाता था। बाद में ठीक तो हो गया , पर यादाश्त नहीं रही। सब कुछ भूल जाने के कारण सपेरों ने ही खिलाया पिलाया , साथ रखा और शामिल कर लिया अपने ही कुनबे में। कुछ समय पहले होश आया , तुम सब याद आए तो यहां आकर देखा , आलोक ने अनामिका के तरफ मुड़ते हुए कहा, " मेरा अस्तित्व अब विलीन हो चुका है"। 

अनामिका ने कुछ न कहा, बस उसके लाल आंखो से आंसू गोद में लेटे बिट्टू के सर के पास गिरते रहे। विधाता ने ये कैसा अनर्थ किया था, जो हुआ ही नहीं था, तब उसका आभास कर दिया , और जब कुछ भी नहीं बचा , तब यथार्थ को लाकर प्रकट कर दिया। 

वहां मौजूद क्रंदन से सबके हृदय पसीज उठे। पूरे गांव ने ये हृदय विदारक दृश्य देखा। मोहन को ये तो पता चल गया था कि ये सन्यासी कोई अपने हैं , किन्तु कौन हैं , ये पूछ नहीं पा रहा था। 

"विजय कितने बजे आता है?" आलोक ने पूछा ।

"साढ़े छः" किसी ने जवाब दिया।

आलोक ने घड़ी की तरफ देखा , और अपना चोला उठाया और द्वार की तरफ बढ़ चला। मां की तस्वीर पर चढ़ी माला और फफक के रोते पिता भी उसे रोक ना सके। दूर निकलता हुआ वह क्षितिज में जाकर ओझल हो गया । तब तक पूरे परिवार और गांव ने एकटक उसे देखा । 

घर लौट कर जब विजय ने पूछा ," पर बिट्टू को ठीक किसने किया ? 

"जो मरे हुए के प्राण लौटा दे , दुनिया उसे देवता ही कहती है।" अश्रुपूर्ण अनामिका ने जवाब दिया।



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