चूड़ियाँ
चूड़ियाँ
सहयात्री के हाथ में काँच की चूड़ियाँ देखकर रहीम से रहा नहीं गया ,पूछ ही लिया " भाई साहब आप ! ये चूड़ियाँ ?"
वो मुस्कुराया "हाँ उसे हरी चूड़ियाँ बहुत पसंद थी।"
तो आप क्यूँ पहनते हो।"
"हम दोनों एक ही तो हैं अलग अलग तो नहीं, अब पहनने के लिए वो नहीं है तो मैं पहन लेता हूँ।"
रहीम ने राहदरी के दूसरी तरफ सिंगल सीट पर बैठी सलमा की तरफ देखा अचानक से उसे प्यारी लगने लगी। खिड़की से आती हवा उसके लटों से खेल रही थी, उसने संवारनें के लिए हाथ उठाया तो रहीम की नजर उसकी कलाई पर चली गई, निठाह प्रेम के बदले उसने क्या दिया उसे 'एक कट का निशान और दो टिन की चूड़ियाँ।
रोज के झगड़े में काँच की चूड़ियाँ टूटती और नया जख्म दे जाती। निकाह के छह महीने बाद ही उसने काँच की चूड़ियाँ पहननी बंद कर दी थी।
अब तो अकरम भी चार साल का हो गया ।
उसने वहीं से कहा "अकरम तैयार होजा हम लोग फिरोजाबाद उतरेंगे।"
सलमा ने हैरत से देखा "ये ट्रेन कानपुर नहीं जाएगी क्या ?"
रहीम सहयात्री की चूड़ियों पर नजर जमाए हुए बोला " कानपुर शाम को जाएंगे, फिरोजाबाद चूड़ियों का बहुत बड़ा थोक बाजार है घूमेंगे सब।"
सलमा उलझन में पड़ गई " टेलर मास्टरी छोड़ मनिहारिन की दुकान करोगे क्या।"
रहीम मुस्कुराया " नहीं रे, दोनों पहनेंगे थोड़ा थोडा़ तो थोक में खरीदना ठीक रहेगा।" फिर उसने सहयात्री की तरफ नजरें घुमाई "क्यों भाई साहब सही सोचा न।"
उसने कोई जवाब न दिया, बस हाथ की चूड़ियाँ सहलाता रहा, यूँ जैसे कोई महबूब की जुल्फों में ऊँगलियाँ फिरा रहा हो।

