चाची जी की छत भाग दो
चाची जी की छत भाग दो
तीसरे दिन शाम को
उलूक महाशय ने जब बताया कि जल्दबाजी में काक महाशय औरों के कंधे पर चढ़ कर आगे पहुँचने की कोशिश में खूब धुने गये हैं। यानि इज्जत अफजाई हुई है। तो अन्य साथियों ने उनका बचाव करते हुए तर्क दिया...
"निपुण से निपुण व्यक्ति भी अपने कंधे पर तो नहीं चढ़ सकता रे! " " क्या करें वह भी ? हम यहाँ साफ सुधरे ,टी टोटलर बने बैठे हैं और काका वहाँ सबके समक्ष पियक्कड़ की छबि में जग जाहिर हुए जा रहे हैं। तब यह युक्ति सबसे बढ़िया है कि अन्य के कंधे पर चढ़ कर अपना काम कर लिया जाए । इससे देखने वाले को लगता है कि बंदा तो दूध का धुला है पर क्या करे जब असंस्कारी लोगों के बीच फंसा हुआ है तो रास्ते नहीं निकाले क्या वह ?" अन्य उपस्थित पक्षियों ने कहा।
....' देखो जी मुझे तो न आपसे कुछ लेना है और न ही आपके काका जी से। खबर देना मेरा काम था वह आपको दे दी अब मैं चलता हूं नई खबर की तलाश में।"
....." क्या हमें काका साहब की खबर नहीं लेनी चाहिए।" पड़कुलिया ने कहा।
....." कैसी बातें करती हो अगर हम वहाँ जाएंगे तो सबको यही लगेगा कि हमने पीना शुरू कर दिया है"। तोते टिटियाने लगे।
....." पड़कुलिया ने कहा, कोई चोरी कर रहे हैं ? लोग कहते हैं यह अच्छी दवा है तो ट्राई करने में हर्ज ही क्या है ? बड़े से बड़े लोग आजकल इस सोमरस का पान बड़े गौरव के साथ करते हैं क्या हम पक्षियों को यह अधिकार नहीं है ?"
यूँ तो सूरज हर रोज ही अस्त होता था, पर आज के अस्ताचलगामी आदित्य की लालिमा वातावरण में उदासी और ठहराव की दस्तक दे रही थी। वातावरण शांत था, पक्षी कतारबद्ध होकर अपने घरौदों के लिए उड़ान भर रहे थे। यद्यपि उगता सूर्य भी लालिमा लिए हुए ही आकाश में प्रकट होता है। पर.. सुबह की रवि रश्मियां सरिता, सरोवरों और सिंधु में जलक्रीड़ा करती हुई परिलक्षित होती हैं। भोर के उजास की जल में हिलती ,डुलती किरणों की परछाई जनजीवन में आनंद का संचरण करती हैं। दर, दीवार, आंगन, मुंडेरों पर किसी अल्हड़ षोड़शी सी अपनी धवल चुनर फैलाती उषा सुंदरी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों के शिखरों पर हीरा मणि सी दमकने लगती है। आहिस्ता -आहिस्ता तब समस्त सृष्टि को अपनी सुनहरी आभा में लपेट देती है । वहीं अस्ताचलगामी वैवस्वत मानो इतनी जल्दी में होता है कि पलक झपकते ही सांझ की सांवली ओढ़नी ओढ़े दुबक जाता है पृथ्वी के विशाल आंचल तले। ठीक वैसे ही काका यानि कौवे का अस्तित्व भी सिमट सा गया था । चंद घंटों, मिनट और सेकेंड्स में परम तत्व में विलीन होने के लिए। आज वे सबके बीच अपने शौक के चलते अकेले जो पड़ गये थे। जिस कंधे पर चढ़ते वहीं से भगा दिए जाते और अंततः उनकी जीवन लीला भी समाप्त हो गयी । उनके संगी साथी किसी तरह से उन्हें अपने कंधे पर लेकर आए और छत पर रख दिया जहाँ आज पार्टी के लिए सभी एकत्रित हुए थे। उलूक पत्रकार महोदय को एक न्यूज मिल गयी। पक्षी मित्र मंडली में सन्नाटा पसर गया । उधर काक-काकी सा धरने पर बैठ गयीं। जब तक मुआवजा नहीं मिलता हम यहीं अपनी जान दे देंगे। मित्र मंडली ने बहुत समझाया, " काकी सा ! हम सभी फंसा दिए जाएंगे ड्रग लेने के इल्ज़ाम में।"
...." अरे नास पीटो ! मेरे वह तो हाथ भी न लगाते थे। तुम्हारी संगत में , तुम्हारे शौक पूरे करने के चक्कर में उनकी जान चली गई। अब मैं चुप न रहने वाली।" हंगामा देख सजातीय बंधु,, बांधवों ने घेराबंदी कर दी और गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले खुलने वाले ठेकों के खिलाफ नारेबाजी की।
शासन-प्रशासन सचेत हो गया । जो पियक्कड़ों को पकड़ कर हवालात में बंद करते थे। उनमें से कुछ तो स्वयं ही पैग लगाकर सुपारी - पान का मुलम्मा चढ़ा कर आये थे। " " बंधुओं ! कककया हो रिया है ? हमारी नीनीतियों की खिलाफत ! लालाहौलबिलाकूबत ! " रो रो रोटियाँ लगी हैं.." टलो इहां से ......"
... पास बैठे सब विजातीय भाई,बंधु समझ गये काकी सा तो आज फंसा कर ही रहेंगी, सो खिसक लिए सब एक- एक करके। मामला ऊपर तक जा पहुँचा। जाँच बिठाई गयी और मुआवजे का एलान करके काकी सा को समझा बुझाकर उनके घर भेजा गया। पीने से पहले ही छींका फूट गया तो अब सिवाय अफसोस करने के कोई चारा ही नहीं बचा। सभी अपना अपना माथा पकड़ अपने अपने घोंसले में जा बैठे।
*************
....." छत पर कौवों की कांव-कांव सुन कर चाची कहने लगीं," अजी सुनते हो! जरा ऊपर जाकर देखिए, यह कैसा शोर मचा हुआ है। "
...." धर्म पत्नी जी की मनुहार की अवज्ञा करने का साहस पतिदेव में होता तो वे टाल भी सकते थे। मगर हाथ में सोंटा लिए वह जा पहुँचे छत पर तो देखा एक कौवा मरा हुआ पड़ा है और उसी के शोक में अन्य सजातीय बंधु भी वहाँ उपस्थित थे। ठाकुर साहब ने अपने हाथ के सोंटे से कि कि कि करते हुए सभी को रफा दफा किया और ठकुराइन चाची से ऊँचे स्वर में कहने लगे...अजी सुनती हो ! " कौवा स्वर्ग सिधार गया। "
....." क्या ? अभी तो कनागत लगने वाले हैं और कौवा संसार छोड़ गया ? हे भगवान! इन दिनों तो पुरखे इनके रूप में धरती पर उतरते हैं और हमारे यहाँ यह घोर अपशकुन ! अब ऐसा कीजिए वहाँ बोरे में रेत रखी है,उसके ऊपर डाल कर आ जाइए नीचे। सुबह मज्जो से उठवा देंगे। अरे मैं भी आ रही हूँ रुक जाइए। एक सैल्फी ले लूँ उसके साथ और एक अकेले उसकी भी। "
....तब तक कौवे पर रेत डाली चुकी थी । चाची जी वहाँ पहुँची और कौवे पर रेत पड़ी देख कहने लगीं। अरे ! आपने तो इसकी रेत समाधि बना दी है। फिर भी कोई बात नहीं, हम इसे साफ किए देते हैं। हम जो ठान लेते हैं। वह कर के ही रहते हैं। कुछ देर मृत कौवे के साथ सेल्फी हुई फिर ढलते सूर्य को कैमरे में कैद किया और दोनों नीचे आ गये ।
स्नान आदि कार्य किया और कौवे के नाम पर एक दिया जला कर अपने द्वार पर रख दिया..।
**********************
.... शाम का वक्त तो था ही पड़ोसी उपाध्याय जी उसी समय घूमने के लिए विवेकानंद पार्क अवश्य जाते हैं। उन्हें अपने देश, अपनी संस्कृति से बेहद लगाव है। जब से पार्क का नाम बदला गया है ,वे वहाँ हाजिरी लगाना अपना कर्तव्य समझने लगे हैं। रास्ता ठाकुर साहब के घर के सामने से ही होकर जाता है। ठकुराइन चाची जी को द्वार पर दीप रखते देखकर दुआ सलाम करते हुए पूछा ही लिया, " आज कोई खास दिवस है क्या ,ठकुराइन साहिबा ..!?"
...." कुछ न पूछिए भाई साहब! आज एक काग हमारी छत पर मृत पाया गया है तो उसी के सम्मान में एक दीप जला दिए हैं।"
....." भाग्यशाली है काक भुसुंडी जो आपके यहाँ प्राण त्याग किए उन्होंने। द्वार पर एक आला उसी के नाम का बनवा दीजिए, पुरखों का ही रूप होते हैं ये। खीर पूड़ी का प्रसाद भी पत्तल में निकाल कर कहीं पीपल के पेड़ के नीचे रखवा दीजियेगा। पुण्य मिलेगा... पुरखे भी खुश होंगे। "
...." जैसा आप कहें भाईसाहब.! आजकल वैसे भी कौवे कम हो रहे हैं। इसी बहाने इनकी प्रजाति को बचाने का संकल्प हो जाएगा। ठकुराइन चाची जी भोलेपन से बोलीं।"
...." एक आइडिया है मेरे पास, आजकल सभी कुत्ते, बिल्लियों, गाय के नाम पर एनजीओ बना कर इनके अस्तित्व को बचाने का काम कर रहे हैं। क्यों न आप कौवों को बचाने की मुहिम चला कर एक सकारात्मक प्रयास करें। मेरा जानने वाला एक पत्रकार भी है। कल आपका एक वक्तव्य रिकार्ड करवा लेते हैं जो अखबार में छपेगा तो बहुत से लोग आपके इस नेक काम में हाथ बंटाने के लिए उपलब्ध होंगे। अगर आप सहमत हों तो सूचित कीजिएगा।"
..... उपाध्याय जी समाज सेवा की चिंगारी चाचीजी के मस्तिष्क में डाल कर आगे बढ़ गये। चाची जी का मन मुद्दत से समाज सेवा हेतु आकुल था। आज जब उपाध्याय जी के सहयोग का आश्वासन जब उन्हें मिला तो छमक-छमक उनके पैर जमीं पर नर्तन करने लगे। अनंत विचारों ने उनके सिर पर डेरा डाल दिया। खुशी में आज डिनर में उन्होंने अरबी ,पूड़ी और बूँदी का रायता बनाया। देशी घी का दीपक भगवान के आले में रख भोग की थाली उनके समक्ष रखकर आनंद मग्न हो कीर्तन करने लगीं।
..... ठाकुर साहब जब अपने टीवी रूम से मंदिर की ओर आए तो चाचीजान को आनंदविभोर देखकर अचम्भित हुए।
क्या ये गमजदा हैं ? या इनके मन पर आघात होने से यह इतनी खुश नजर आ रही हैं। वे चुपके से उनके पीछे जा खड़े हुए। चाचीजी कहने लगीं," हे ईश्वर मेरे संकल्प पूरे करिए, मेरी राह प्रशस्त कीजिए, लम्बे इंतजार के बाद मुझे मकसद मिला है। कामयाबी दिलाने का काम आपका है परमेश्वर। मस्तक नवाकर जैसे ही वे पीछे मुड़ीं, पतिदेव की खुली बाहों में स्वयं को पाया।
" हे भगवान! आपने मेरी विनती सुनली क्या?"
....." पति भी भगवान के दूत होते हैं अपनी पत्नियों की मनोकामना पूर्ण करने हेतु। वह उन्हीं के लिए कमाते हैं, उन्हीं के नाम पर खाते हैं और उनकी खुशी के लिए ही पीते हैं। डियर! पीने का मतलब वह नहीं जो प्रचलित है...हमारा तात्पर्य चाय से है। कहिए हमें क्या करना है ? "
....." जी हाँ हम सब जानते हैं...आप चाय हमारे लिए पीते हैं, खाना हमारे लिए खाते हैं वरना आपको न तो भूख लगती है और न ही प्यास। पहले डायनिंग टेबल पर बैठिए तब चर्चा करेंगे। " आज थाली में अपनी मनपसंद अरबी की सब्जी और पूड़ी देखकर विस्मित होकर ठाकुर भूप सिंह जी अपनी मैडम की आँखें पढ़ने लगे।
पुदीने की चटनी उन्हें पकवान के साथ फ्री उपहार जैसी प्रतीत हुई। सड़क पर गणपति विसर्जन के ढोल बजते सुन ठकुराइन चाची जी टेबल छोड़ बाहर की ओर चली गयीं। ठाकुर साहब जानते थे कि वे अपना छूटा हुआ शौक ढोल की तर्ज पर अपने हाथ ऊपर उठाकर पूरा कर रही होंगीं, कमर और घुटनों ने तो बगावत ही कर दी है। थोड़ी ही देर में मधुर मुस्कान मुखड़े पर लिए वह अपने पति परमेश्वर से मुखातिब हुईं," देखिए जी ये विसर्जन मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है। मैं तो अपने गणपति को बच्चों की तरह ही घर में रखे रहती हूँ। क्या करूँ ? मोह हो जाता है उनसे।
... ठाकुर साहब हूँ करके बैठे रहे और भोजन के लिए आग्रह किया। वह तारीफ करते जा रहे थे और धर्म पत्नी जी गर्म पूड़ियाँ परोसती जा रहीं थीं। उन्होंने मैडम कहते हुए उनका पकड़ कर कहा, बस अब आप भी बैठ जाइए, बहुत सेंक लीं हैं। आप तो जानती ही हैं कि ये पूड़िया मैं किसके लिए खा रहा हूँ। "
.... " मेरे लिए ही और किसके लिए खाएंगे भला। " हँसते हुए वे किचिन में जाकर गैस बंद करके डायनिंग टेबल के नजदीक रखी कुर्सी पर इत्मीनान से आकर बैठ गईं।
....." मुझे लग रहा था कि आप कुछ कहना चाहती थीं। बताइए तो कुछ समाधान हो। इतना शानदार डिनर कराने के लिए आपके हाथों को शुक्रिया देना चाहते हैं। लाइए थोड़ी मसाज कर देते हैं।"
...." मस्का लगाने की जरूरत नहीं है ! पर हम जो कहना चाहते थे, वह अब नहीं कहना चाहते। कारण आपको भी पता है और मुझे भी। मेरे हर प्रस्ताव पर आपकी 'नो' ही सुनने को मिलनी है। इसलिए अपना प्रोजेक्ट मैं अब अपने अनुसार ही तय करूँगी। बच्चे बड़े कर दिए, अपने तीस साल आपकी गृहस्थी को दे दिए। अब शेष जीवन अपने लिए जीना है मुझे। कल सुबह से इस पर काम शुरू कर रही हूँ। साथ देना चाहें तो दीजियेगा न देना चाहें तो कह सकते हैं कि यह मेरा घर है। यहाँ मेरी अनुमति के बगैर पत्ता भी नहीं हिल सकता।" चाचीजी अपने असंतोष को जाहिर करते हुए कहने लगीं।
....." यही कारण है कि महिलाओं की योजनाएं बनने से पहले ही फ्लाप हो जाती हैं। उनके डर ,उनकी अविश्वास की भावनाएं उनके बोलने का अंदाज ही बदल देती हैं। उनको लगता है जैसे समस्त ब्रह्माण्ड उनके विरोध में उतर आया है। सभी उनके रास्ते रोक कर खड़े हैं । उन्होंने अपना जीवन अपने हिसाब से नहीं जिया है। किसने रोका है, आखिर पता भी तो चले।" ठाकुर साहब ऊंचे स्वर में बोलने लगे।
...." कल देखते हैं क्या रिएक्शन होगा। तभी हम कुछ स्पष्ट करेंगे। अब सो जाते हैं। गुड नाइट.
**********"""
.... कौआ बचाओ , एनजीओ की भूमिका बनाने की प्रेरणा देने वाले उपाध्याय जी का ठकुराइन चाची जी बेसब्री से इंतजार कर रही थीं। लेकिन जब वह नहीं आये तो वे झाड़ू लेकर अपने दरवाजे से बाहर रैम्प की सफाई के लिए खुद को तैयार कर ही रही थीं कि ठाकुर साहब की नजर जब अपनी मिसेज पर पड़ी तो उन्होंने आवाज दी.." बबलुआ की मम्मी! क्या करने जा रही हैं झाड़ू से..? "
.....ठकुराइन साहिबा जानती थीं के उनके पति यह बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं कि घर की महिलाएं झाड़ू लेकर बाहर सफाई करें। उन्होंने कहा, " रामबोली ठीक से सफाई नहीं करती है इसलिए मैंने सोचा कि आज मैं ही झाड़ू लगा दूँ। जब तीन मंजिला मकान वालीं मालकिन ऐसा कर सकती हैं तो अपनी तो एक ही धरती पकड़ है। कोई हर्ज थोड़े ही है अपना काम करने में।"
....." हम आपसे विनती करते हैं कि बाहर झाड़ू नहीं लगाएंगी । समझ लेना मैं आज खाना भी नहीं खाऊँगा।" ठाकुर साहब ने अजीब सा मुंह बनाया।
... ठकुराइन चाची जी क्या करतीं..मन मसोस कर अंदर आ गयीं । सोचा शाम को उपाध्याय जी टहलने निकलेंगे तभी बात हो जाएगी। एक विचार यह भी आया कि क्यों न किसी बहाने से उनके घर ही चली जाएं। पर.. सभी विचारों को तिलांजलि देकर वे अपने मन से अपनी योजना पर काम करने लगीं। उन्होंने कौवे के साथ वाली और सभी तस्वीरें दिखाते हुए अपने पतिदेव से मनुहार की... " सुनिए ! थोड़ी देर के लिए बाहर चलते हैं और कल शाम को जो तस्वीरें मैंने ली थीं उनको बड़ी करवाने का मन है। अगर आप न भी जाना चाहें तो अकेले चली चली जाती हूँ। आप आराम कीजिएगा।"
...." ठाकुर साहब स्वयं एकांत चाहते थे क्योंकि चाचीजान की अजीब हरकतों से उनका बीपी बढ़ने लगा था। उन्होंने कहा, आप हो आइए हम घर पर बने रहेंगे। घर को ताला लगा कर जाने में उचक्के सिर उठाने लगते हैं। वकील साहब की स्कूटी घर के सामने खड़ी थी। उठा कर ले गया कोई,आज सुबह ही पार्क में चर्चा हो रही थी।"
..." अरे ! आप अब बता रहे हैं। पहले बताते तो मिल आती। वैसे एक खबर मेरे पास भी है पर आपके पेट में बात हजम नहीं होगी। "
.. " क्यों नहीं होगी ? हाजमोला की गोलियां हर वक्त रखता हूँ अपने पास। बताना चाहें तो बता भी सकती हैं। "
....." हरनारायण भाईसाहब का नाती लूट में पकड़ा गया है आज। सुन रहे हैं जम कर पिटाई हुई है उसकी। मुहल्ले के और लड़के भी साथ में थे। किसी छुटभैय्ए नेता की गाड़ी बीच सड़क पर रोक कर , उसमें बैठे सभी लोगों पर लाल मिर्च का पावडर उनके मुंह पर फेंक कर गाड़ी में रखा कैश का बैग उठाकर भाग आये सभी। सीसीटीवी कैमरे में सभी के चेहरे कैद हो गये थे। पुलिस वालों ने घर से उठाया है उन सभी को।"
....." चिंता की बात तो है, इसमें कोई दो राय नहीं। आजकल के लड़के मेहनत से जी चुराने लगे हैं और लूट खसौट को ही अपना प्रोफेशन बना लेते हैं। लेकिन बुरे काम का बुरा नतीजा ही मिलता है। अपने बाप , दादाओं की साख को धोकर रख देते हैं। अब आप हो आइए बाजार पर याद रखियेगा ,चोर- उचक्के बहुत सक्रिय हैं।"
...." वैसे ही कौन से आप हीरे जवाहरात खरीद कर दिलवाए हैं। ये पीतल - शीतल ही तो पहनती हूँ। अब नासपीटे ये भी नहीं पहनने देते। पता है झम्म़न की दादी की चूड़ियां उतरवा लीं दो लड़कों ने। जब मालूम हुआ कि पीतल की हैं तो स्कूटी लौटा कर लाए और चूड़ियां मुंह पर मार कर दो थप्पड़ लगा गये। अब तो पीतल भी नहीं पहनती।"
....." ठीक है परमेश्वरी आपकी शिकायतें हमसे कभी समाप्त नहीं होंगी । अपना काम कर आइए।"
..." क्या कर आएं हमेशा भय का माहौल तैयार कर देते हैं आप । कोई कैसे जा सकता है बाहर? बताइए!"
...." उफ़! संवाद के नाम पर विवाद होने लगता है। मेरे इंटेंशन पर ही उंगली उठाई जाती है। "
***********
....." शनि महाराज! माता जी ! शनि का तेल ! "
..." आते हैं, जरा ठहरिए... ठकुराइन चाची कहने लगीं। आज शनिवार है, इसीलिए विवाद हो गया। झट से एक कटोरी में तेल निकाल कर लायीं और ठाकुर साहब से कहा, जल्दी से इस तेल में अपनी परछाई देख लीजिए। जब पतिदेव ने कोई दिलचस्पी नहीं ली तो स्वयं ही उनकी गर्दन झुका कर तेल के ऊपर कर दी और झट से शनिदेव वाले लड़के के डिब्बे में उड़ेल आयीं। दस रुपए का नोट भी हाथ में दबा लायी थीं। बोलीं ये ले पैसे और नींबू मिर्ची द्वार पर बांध दे। "
....." माता जी ! शनि महाराज के पैसे भी...."
....." हो गया न इसी में " ।
..." माँ जी घाटा हो जाएगा "
...." लाला कुछ कमा कर भी खा लिया कर। कितने दिन शनि महाराज के नाम पर तेल बेचेगा ? बता तो सही ! अभी तेरी उम्र ही क्या है ? सोच जरा ?"
...कमा कर खाने के नाम से शनि महाराज तिड़ी हो गये। लड़के को पता था ,अगर ज्यादा देर रुका तो माताजी पैसे तो दूर पानी भी नहीं देने वालीं।
...." अजी सुनती हो ! बाजार हो आइए। हम थोड़ा आराम करना चाहते हैं। "
.....ठीक है मैं चलती हूँ, दरवाजा ठीक से बंद कर लीजिएगा।
क्रमश:
