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Shelley Khatri

Drama Tragedy

4  

Shelley Khatri

Drama Tragedy

बेबी

बेबी

18 mins
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आप कैसा भी ऐशो आराम की जिन्दगी बसर कर रहे हों, सुन्दर वर्तमान में रहते हुए भविष्य के सलोने सपने बुनते जा रहे हों। लेकिन अतीत विक्रम के बेताल की तरह जब-तब कन्धे पर सवार हो ही जाता है। शांत निश्छल जीवन को हिचकोलों से बचाने के लिए मैं भूत की तरफ देखने से बचना चाहती हूँ। पर स्मृतियाँ कभी मिटती तो हैं नहीं बस धुँधली होती हैं। समंदर की लहरां की तरह हवा के थपेड़ों पर सवार हो बार-बार लौटती हैं। आज मेरी धुँधली स्मृति में बिजली-सी कौंध रही है और उस पल भर की चमक में एक गोरा चौकोर, मुस्कुराता चेहरा दिख रहा है। मैंने चेहरे पर अंगुली रख दी- बेबी। हाँ! हाँ! बेबी ही तो है। क्या मैं भूल सकती हूँ उसे? अब स्मृति जैसे सजीव हो उठी है। बेबी और मैं एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चक्कर काट रही हां। बेबी अकेली नहीं आयी है, साथ में है मेरा बचपन।

शाम को छत पर टहलते समय अक्सर ही बगल के निचले खपरैल मकान की ओर दृष्टि जाती थी। हमारा और उनका केवल घर ही अलग प्रकार का नहीं था वरन् रहन-सहन से लेकर खान-पान सब कुछ अलग था। हम दोनों बहनें ऊपर से ऐसे देखतीं मानों स्वर्ग के देवता पृथ्वी के तुच्छ जीवों के क्रिया कलापों का निरीक्षण कर रहे हों। खपरैल मकान के बीच में एक कुआं था, पक्की और जमीन से डेढ़-दो फुट उंची जगत। उस घर के आठ दस प्राणी उस जगत के इर्द-गिर्द कौतुक विनोद करते रहते (करते तो वे अपना दैनिक क्रिया-कलाप ही थे, पर हमारे लिए किसी कौतुक से कम नहीं था।) उनका खाना-पीना यहां तक की औरतों का नहाना भी हम जन्मसिद्ध अधिकार की तरह उ्पर से देखते और तौर तरीकों पर आपस में टिप्पणी करते हुए हंसते। इन सबके बीच अंधकार में जुगनू सी एक बालिका जबतब दिखाई देती। वह मुझसे दो-ढ़ाई साल बड़ी ही होगी। टखने तक लंबी फ्रांक पहने वह आंगन में ठुमक ठुमक कर चलती थी। एक तो अपेक्षाकृत सांवले लोगों के बीच तपे सोने सा गौर पीला रंग, दूजे हमारी हमउम्र होने के कारण वह हमार आकर्षण का केंद्र बनी। कभी- कभी वह भी हसरत भरी निगाहों से उपर देखती। तब उसका गोरा रंग और भी खिला होता। भूरी आंखों में चमक होती साथ ही सफेद चौड़ी और थोड़ी अलग अलग फैली दंत पंक्तियां इस तरह होठों से झांक रही होतीं मानो, उनसे हमारा गहरा नाता हो। उसकी यह निर्निमेष दृष्टि हमारी हंसी गायब कर देती। मन जाने कैसा कैसा तो हो जाता। एक तरह का अपराधबोध हमें घेरता।

एक दिन क्षितिज की कल्पना साकार हुई। अर्थात धरती और आकाश के वाशिंदे का मिलन हो गया। मैं और मेरी छोटी बहन सरू, दादी की उंगली पकड़ घर से बाहर निकल रही थीं; बगल के घर की बच्ची को बाहर देख, सरू ने दोस्ती करने में देर नहीं की। नाम पूछने पर जवाब मिला-बेबी। सरू ने भी परिचय दिया, मै सरू और ये दीदी श्रेया। उस दिन बात तो इतनी ही हुई पर हम दोस्त बन गए। फिर तो छत से बातें करते। स्वर्ग के वाशिंदों ने धरती वालों से संपर्क सूत्र स्थापित कर लिया था। रविवार की एक दोपहर को मैं बादलों वाले आकाश को निहार रही थी। तभी सरू छत पर आयी। उसकी अंगूली थामे बेबी भी थी। आज हमने उसे ठीक से देखा। जांचा और परखा भी। बातें भी खूब हुई। वह स्कूल नहीं जाती थी। उसे कुछ पढ़ना या लिखना नहीं आता था, पर उसे न जाने कितनी बातें पता थीं- पेड़ पौधां की,खेतां की, बड़ों की। गांव का चप्पा- चप्पा उसका देखा जाना है कहकर उसने हमें चकित कर दिया। दिन ढलने पर वह अपने घर लौट गयी। उसके जाने के बाद हम दोनों के चेहरे पर अवसाद था। हमारे मम्मी- पापा, दादी, टीचर्स सभी इतने अच्छे हैं, पर हमें बेबी जैसी बातें किसी ने नहीं बतायी ।हम चिंतित हुईं। उसके बालों से तो हमें ईष्या ही हुई। उसके बाल कंधे से नीचे तक लंबे थे। घने और भूरे, लेकिन अजीब से चिकट और कड़े। हमारे बाल छोटे- छोटे थे, ब्वाय कट स्टाइल में कटे, अपेक्षाकृत काले और सिल्की, पर हमें उसी के बाल अच्छे लगे। यह जानकर तो और भी आश्चर्य हुआ कि उसने अपनी पोनी खुद ही बनायी है। अब बेबी हर शाम हमारे साथ छत पर होती। घर के झगड़ों, खेत की फसलों, मुहल्ले की लड़ाईयों और न जाने कितनी अंजान लड़कियों की बातें बताती। धीरे धीरे हम बेबी के श्रोता और फिर भक्त बन गए।

 स्थिति यहां तक आ गयी कि हमें घुटनों के उपर की फ्रॉक, शर्ट-पैंट या अन्य मॉडर्न ड्रेस की जगह बेबी के टखनां तक लंबी फ्रॉक ज्यादा अच्छी लगती। हम सोचतीं काश! हमारे पास भी ऐसी ड्रेस होती। बेबी के पास मात्र तीन फ्रॉक थीं। सब लंबी और कहीं ना कहीं उनकी सिलाई जरूर खुली थी या फटी थी। उन्हीं को देखकर कभी कभी लगता मम्मी हमें अच्छे कपड़े नहीं देती। इस प्रकार जाने कब बालपन का अबोध मन बेबी का अंध भक्त हो गया। जीवन के कई पहलु जानने और समझने को मिले। छत पर खड़े होकर पीछे की ओर दूर तक फैले खेत को आसानी से देखा जा सकता था। खेत की आभा हमेशा बदलती रहती। कभी पीली चादर बिछी रहती तो कभी हरी, और फसल पकने पर सुनहला रंग बिखरा होता, जिस पर ढलते और उगते सूरज की नर्म नर्म किरणें आकर गजब ढांती। कभी कभी जब यह चाद उठा ली जाती तब बंजर श्रीहीन सी होकर धरती कराह उठती। बेबी हमेशा खेतों में जाती थी। कभी साग तो कभी सरसो या मटर व चना आदि से उसकी पोटली भरी होती। उसके मुख से वीरता के किस्से सुन और सुदूर फैले खेतों को देखकर हमारा मन भी मचलता, पर मम्मी की सख्त मनाही थी। हम मन मसोस कर रह जाते। गांव के बहुत से भूमिहीन किसान और मजदूरों का जीवन जाड़े के समय खेत में उपजने वाले खेसारी के साग पर निर्भर था। बेबी के मुंह से ही सुना था, तमाम लोग खेत से साग खोट कर ;तोड़ करद्ध लाते और भात के साथ मजे से खाते। बहुत से लोग ;बेबी भीद्ध हरे साग को कच्चा ही नमक के साथ खाते थे। उस जीवनदायिनी अमृत तुल्य साग का ऐसा वर्णन सुन और बेबी के फ्रॉक में साग की पोटल देखकर हम भी खाने और खेत से साग चुनने को मचलतीं, पर चूंकि सरकार ने खेसारी पर यह संदेह करते हुए प्रतिबंध लगाया था कि इससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं अतः उसका हमारे घर मं आने का प्रश्न ही नहीं था, और हम दोनों बहनें पापा की इस दलील से कैसे सहमत होतीं जबकि हमारी बेबी ने हमें सूचना दी थी कि महीने दो महीने तक पूरे चंद्रवंशी नगर ;बेबी के घर से शुरू हुई कहारों की बस्तीद्ध तथा अन्य मुहल्ले में खेसारी का साग और भात ही खाना बनता था। इसी से जब तब हम मम्मी के आंचल का छोर पकड़ कर जिद कर बैठतीं, हम भी साग खाएंगी और खेत में जाकर उसका पेड़ देखेंगी। हमारी रोज रोज की प्रार्थना से देवी का हृदय एक दिन द्रवित हो गया और बेबी के साथ एक घंटे के लिए खेत में जाने की इजाजत मिल गई। जाने से पहले मम्मी ने बेबी को सैकड़ो हिदायतें दी- एक घंटे में ही लौट आना, ज्याद दूर मत जाना, हाथ पकडे़ रखना, पतली आरी ;खेत का मेड द्ध से मत ले जाना, थोड़ा ही साग तोड़ना, अपने घर के लिए बाद में तोड़ लेना, इन्हें एक भी पत्ता खाने मत देना, घर आकर धोकर थोड़ा ही खाना है, आदि न जाने क्या क्या। घर से निकलते ही मैं और सरू तो मम्मी की हिदायतें भूल गई पर बेबी ने उन्हें याद रखा। हम तीनों उछलती- कूदती खेतों में थोड़ा ही आगे गई। साग के पौधे घास जितने ही बड़े थे, पर हमारी कल्पना से सर्वदा भिन्न। पौधे के बीच में कलीनुमा आकृति थी। बेबी ने हमसे वही फुनगी तोड़ने को कहा। दस पंद्रह मिनट में हम दस बारह फुनगी तोड़ सकीं थीं और बेबी का पूरा फ्रॉक भर चुका था। बेबी ने हमें वो बिल भी दिखाया जिसमें चूहे छुपे रहते थे और धान और गेहूं चोरी करके जमा कर लेते थे। फिर कभी इन खेतों में आने का मौका मिले या ना मिले, इसलिए मैं जी भर सब कुछ देखना और निगाहों में समेटना चाहती थी। बेबी अंदाजा लगाते हुए बोली- एक घंटे हो गये होंगे, पर मेरा मन तो वहीं ठहर जाने का हो रहा था। अब बेबी जैसे निष्ठुर हो गयी, बोली- आज चलो, चाची से पूछ कर फिर आ जाना। हम लौट चले। शाम के करीब चार बज रहे होंगे। सूरज की किरणों में लालिमा समेत सुनहलापन आने लगा था, तीन मुर्तियां लंबी परछाईयां बनाती, कुछ गुनगुनाती घर पहुंची। अच्छी तरह धोकर हमने साग रूपी अमृत का स्वाद चखा। जिसकी इतनी प्रशंसा सुनी हो और जो हमारी बेबी का प्रिय हो, उसका स्वाद तो मीठा लगना ही था। इस प्रकार कई नायाब अनुभव हमें बेबी से मिले। यूं कहूं तो बचपन का लुत्फ हमने उसी के सानिध्य में उठाया। हमारी दिनचर्या नियमित थी। सुबह उठकर हाथ-पांव व चेहरा धोकर पढ़ने बैठना हमारी मजबूरी थीं। साढ़े आठ बजे ट्यूटर के आने पर ट्यूशन पढ़ना होता था। साढ़े नौ से दस बजे का समय तो खासा भाग- दौड़ वाला होता था इतनी ही देर में हम दोनों को नहा-धोकर स्कूल के लिए निकलना होता था। शाम चार बजे थके मांदे पीठ पर बस्ते का बोझ डाले हम फिर थोड़ा दूध और बिस्किट खाकर हम छत पर दौड़ भाग करतीं। बेबी आ जाती तो बातें करती या फिर टेबल टेनिस खेलतीं। पतंग उड़ाने का शौक बेबी या सरू को नहीं पर मुझे था। लेकिन ना तो मुझे उड़ाना आता था और कोई सिखाने वाला था। जाड़ों में सवा छह और गर्मी में सात बजे तक हम पढ़ने बैठ जातीं थी। रात नौ बजे हमारी छुट्टी होती और भोजन मिलता। सोने से पहले हम दादी से कहानियां सुनतीं। इस रूटीन की वजह से बेबी के हिस्से शाम का समय ही आ पाता था। इधर सरू थी कि एक पल को भी बेबी से अलग नहीं होना चाहती थी। शाम को पढ़ाई के समय भी वह बेबी को रोके रहती। अचानक दादी का अभिजात्य प्रेम जागृत हुआ। दादी और सरू में वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया। दादी अपना पक्ष रखते हुए बोली, बेबी स्कूल नहीं जाती, घर में भी नहीं पढ़ती यहां तक कि उसके घर में कोई पढ़ाई- लिखाई नहीं करता है। वह गली की आवारा और गंदे बच्चों के साथ खेलती है, इसलिए सरू और श्रेया को बेबी से दूर रहना चाहिए। साथ ही दोस्ती को सिमटा कर पहचान में बदल लेनी चाहिए। बोलने में तो यूं भी सरू को कोई हरा नहीं सकता था और जब बात उसकी खास दोस्त बेबी की हो रही थी तो वो चुप कैसे रहती। वह तेज स्वर में बोली, बेबी मेरी जान है और वह इसी घर में रहेगी, यहीं पढ़ेगी। वह हमारे घर में नहीं रहेगी तो मैं भी उसी के साथ चली जाउंगी। उसकी इस नटखट जिद पर सब हंस पड़े और बात वहीं खत्म हो गई। अगली सुबह सरू ने अपनी पुरानी स्लेट निकाली। झाड़ा पोछा और तब बेबी को बुलाकर बोली- अब रोज मेरे साथ बैठकर पढ़ा करो। फिर बेबी की पढ़ाई शुरू हुई। उसने कभी स्कूल का रूख नहीं किया था। पढ़ने के प्रति कोई ललक उसके मन में नहीं थी इसलिए उसे कुछ भी सिखाना एक दुष्कर कार्य था। तीन दिन की कठिन परिश्रम के बाद सरू से क और ख सिखाने में कामयाब हुई। इधर बेबी इतने में ही उब गई। वह सिखने को तैयार तो हो गई थी पर मेहनता नहीं करना चाह रही थी। और सारी चीजें एक बार में ही जान लेना चाह रही थी। उसने हमदोनों को सरपट पेंसिल चलाते ही देखा था। कभी यही मेहनत हमने भी की होगी, यह बात उसकी समझ में नहीं आयी। हमदोनां उसे समझाने में ही लगी ही थीं कि एक मुसीबत खड़ी हो गई। दादी सरू को डांटने लगी की कि बेबी को पढ़ाने से समय की बर्बादी होती है और पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। नतीजा यह हुआ कि बेबी की पढ़ाई रोक देनी पड़ी। करीब सप्ताह के बाद बेबी ने खुद से पढ़ने की इच्छा व्यक्त की हमें आश्यर्च मिश्रित खुशी हुई। बेबी ने अपनी शर्त भी रखी कि वह लिखना नहीं सिखेगी। सिर्फ बोल बोल कर ही एबीसीडी और क ख या कविताएं सिखेगी। कहीं भी पहली जरूरत शरूआत की ही होती है, काम तो उसके बाद खुद ब खुद ही लय पकड़ लेता है। लगा धीरे धीरे बेबी और उत्सुक होगी। अब रोज शाम को बातों के दौरान गिनती के स्वर हमारी छत पर गूंजा करते। बेबी काफी प्रगति कर रही थी।यही सब देख सुनकर मैनें उसे स्कूल में एडमिशन कराने की सलाह दी। वह साफ मुकर गई। उसका कहना था स्कूल में नर्सरी में काफी छोटे बच्चे होते हैं और वह उनसब से बड़ी दिखेगी। उसे शर्म आएगी और बच्चे भी तो चिढ़ाऐंगे। तर्क में दम था पर और कोई रास्ता भी तो नहीं था। हमने उसके मन से डर निकालने की कोशिश की। पर नाकाम रही। हां! शाम के वक्त पढ़ाई का सिलसिला जारी रहा। इसमें नयी बात भी जुड़ गई। हमलोग बेबी को बारी बारी से बाल पत्रिकाओं की कहानियां पढ़-पढ़ क सुनातीं। वक्त अपनी रफ्तार से गुजर रहा था। हमारा रूटीन तो पूर्ववत था पर बेबी के सिर पर घरेलू कार्यों का बोझ आ गया। प्रतिदिन सुबह शाम बेबी को अपने घर में झाडू लगानी पड़ती और बर्तन धोना पड़ता था। धीरे धीरे उसके कामों की संख्या बढ़ती गयी और हमारे पास उसका कम समय गुजरता। इस प्रकार दो वर्ष निकल गये। मैंने बेबी के स्वभाव में परिवर्तन लक्ष्य किया। अब वह पहले जैसी चुलबुली नहीं रही बल्कि थोड़ी- थोड़ी गम्भीर दिखने लगी थी। पहले वह घर और अपनी भाभियों के किस्से बताया करती थी। इधर काफी दिनों से ऐसी कई बातें वह बताना तो शुरू करती पर जाने क्यों बीच में ही बातों का रुख दूसरी तरफ मोड़ देती। उम्र में दो-ढ़ाई वर्ष का ही फासला होने के बावजूद वह बड़ी हो गयी और हम पहले की तरह ही छोटे थे। रोज गुड़िया गुड़िया खेलते। कभी-कभी बेबी का सिखाया छू कित्-कित् का खेल भी लेकिन उसकी रुचि इन चीजों से बिल्कुल खत्म हो गयी लगती थी। उस बार की गर्मियों में मेरा नानी के घर जाना हुआ। बेबी, सरू, मम्मी-पापा और गाँव-टोले की यादों को लेकर मैं चली गयी। मुझे लौटने में तीन महीने लग गये। आते ही मैं सबसे पहले छत पर गयी। आस-पास का अवलोकन किया, क्या- क्या बदला है? पीछे खेतों में कौन-सी फसल लगी है। आगे सड़कों की तरफ कितनी नयी दुकानें खुली हैं, सब देख कर मैंने बेबी के आँगन में नजर डाली। आँगन में उस समय कोई नहीं था। एक ओर श्रीहीन मण्डप खड़ा था, जो इस बात का प्रतीक था कि हाल- फिलहाल यहाँ किसी की शादी हुई है, मगर किसकी? मैं तय नहीं कर पा रही थी। अतः जल्दी-जल्दी, कूद-कूद कर नीचे पहुँची। सामने सबसे पहले मम्मी दिखी। मैंने हाँफते हुए पूछा, मम्मी बेबी के घर में किसकी शादी हुई है। मम्मी शांत भाव से मुस्कुरा कर बोली, बेबी की। फिर मेरे स्तब्ध चेहरे को देखकर हँसते हुए वर्णन किया, छोटी बेटी होने के कारण इन लोगों ने अच्छे से शादी की है। बाकी सब की शादी तो मंदिर में जैसे- तैसे हुई है लेकिन बेबी के लिये घर में बारात आयी थी। उसके पापा ने दस हजार रुपये दहेज के साथ काफी सामान भी दिया है। मैं अभी तक अचम्भित थी। दिल ने चुपके से कहा, बेबी तो बच्ची है मेरी तरह। मम्मी मेरे मनोभावों को परख रही थी, बोली, इन लोगों के यहाँ सबकी शादी ऐसे ही हो जाती है। सामान्य घटनाओं से तो कभी प्रकृति के नियमों में परिवर्तन हुआ नहीं है। उन दिनों भी वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा। हम भी खाते- सोते, खेलते और अपने सभी काम करते ही थे पर उसे हम भुलाए नहीं भूलते। अनजाने ही रोज उसका इन्तजार करती। सरू उसकी शादी में यहीं थी लेकिन उसके घर जाने की इजाजत न मिलने के कारण वह जा नहीं सकी, जिससे कुछ जान भी नहीं पायी। एक सुबह बगल के घर में सामूहिक रूदन का स्वर सुनकर मैं दौड़ी-दौड़ी छत पर गयी। यहाँ यह बता रखूँ कि गाँवों में कई जातियों में बेटियों के ससुराल जाने या उनके वापस आने के बाद सामूहिक रूदन जिसे भेंट करना कहते हैं, का रिवाज होता है। सभी औरतें आने या जाने वाली के गले लग कर तेज स्वर में रोती हैं। ऊपर आकर मैंने बेबी के घर में सबको रोते देखा। साड़ी में लिपटी बेबी काफी बाद में पहचान में आयी। मैं खड़ी देखती रही, लगभग आधे घंटे के रूदन के बाद बेबी के पाँव धोये गये। फिर वह बिना ऊपर देखे अंदर चली गयी। मेरा मन बहुत छोटा हो गया। एक-एक कर तीन दिन निकल गये। चौथे दिन नीली कोर की स्लेटी साड़ी पहन और बायें हाथ में खाली बाल्टी लिये बेबी आयी। उसके बाल तरीके से सँवरे थे। करीने से सिन्दूर की पतली लकीर खींची थी। उसने नाक में बड़ी सी लौंग पहन रखी थी, जो उसके चौकोर चेहरे से मैच कर रही थी। गले में चाँदी का एक मंगलसूत्र झूल रहा था। दोनों हाथों में ढ़ेर सारी चूड़ियाँ थीं। चाँदी की दो या तीन अंगूठी उसकी अंगुलियों में डली थीं। पाँव में पतली पायल और नग वाले बिछुए थे। उसका यह श्रृँगार उसकी दीदीयों और भाभियों से काफी अलग था। मुझे लगा उसका हमारे घर आना-जाना सार्थक हो गया। इतने साज- श्रृँगार के साथ आते हुए वह शरमा रही थी। मैं उस समय झूले पर बैठी पेंगें बढ़ा रही थी। बेबी को देखकर मैं झट से कूद पड़ी। मेरी उम्मीद के विपरीत वह पास आयी और औपचारिक मुस्कुराहट के साथ पूछा, एक बाल्टी पानी लेना है, ले लूँ। मेरे मुँह से हाँ निकला। फिर दूर से आती-सी उसकी आवाज सुनी, वह मुझसे पूछ रही थी, नानी के घर से कब आयी? उसकी ऐसी निर्लिप्त आवाज और बातें मेरे मन को दुखा रहीं थी। अनमनी-सी कहा, काफी पहले ही। अपनी तरफ से मैंने उसकी निर्लिप्तता की मूक शिकायत की, पर वह समझे तब..न! पानी भरकर वह चुपचाप चली गयी उसके जाने के बाद मैंने गालों तक बह आये आँसुओं को पोछा। बेबी ऐसे कैसे हो गई- यह सवाल बार-बार मेरे अन्दर गूँज रहा था। दो दिन के बाद वह फिर आयी। मैं झट उसके पास बैठ गयी। वह बिल्कुल शांत बैठी रही, उसने कुछ भी नहीं कहा। हमदोनों को गुमसुम देखकर मम्मी आ गयी। और बेबी से उसके ससुराल के बारे में पूछने लगी। आश्चर्य की बेबी कभी हँसकर तो कभी शर्मा कर बताने लगी। मैं भक् बैठी सुन रही थी और बातें समझने की कोशिश कर रही थी। आधे घंटे बाद दोनों की बातें खत्म हुईं, तो मेरी समझ में आया कि बेबी की ससुराल में थोड़ा खेत और जमीन तो है पर लोग जरा कड़क हैं। सास थोड़ी और ननद काफी कड़क, गुस्सैल और एक तरह की बदमाश ही है। पति ठीक-ठाक हैं, बेबी ठीक से नहीं समझ सकी है उसे। बस आगे तो बेबी ने खाना बनाने और झाडू लगाने की कथा ही बतायी थी। बताते समय मैंने बेबी के चेहरे पर खुशी नहीं देखी। मैं इन्हीं खयालों में खोयी थी कि बेबी एकदम से उठी और मम्मी को प्रणाम करके चली गयी।

एक दिन जब मैं स्कूल से लौटी तो देखा बेबी बैठी मम्मी से बातें कर रही है। मैं एक पल को ठिठकी क्योंकि मेरी दोस्त अब मेरी नहीं रह गयी थी। मन में कैसा तो अवसाद रहा करता था, उन दिनों। इसी से मैं उसकी चर्चा से बचती थी। सम्भवतः यही स्थिति सरू की भी थी, वह तो और भी गुमसुम-सी रहने लगी थी। मैंने बेबी की ओर देखा, लगा उसने अभी-अभी आँखें पोंछी हों। मुझे देख वह मुस्कुराई और स्कूल तथा सहेलियों की बातें करने लगी। आज उसके जाने के बाद मेरे मन में संतोष था। रात को उसके बारे में सोचते समय मुझे याद आया उसने मम्मी के सामने आँखें पोंछी थीं जानें क्यों मुझे कुछ गड़बड़ लगा। मैंने जाकर मम्मी के गले में बाहें डालीं और पूछा- बेबी क्यों रो रही थी माँ? मम्मी ने बात टालने के अन्दाज में बताया- बेबी की बड़ी भाभी उसे परेशान करती है। मैं कहाँ मानने वाली थी, बोली ठीक से बताओ न कैसे? मेरा लाड़ देखकर मम्मी बताने लगी कि उसकी भाभी कंघी, साबुन आदि छोटी-छोटी चीजें छिपा देती है। उसके खाना को लेकर कटाक्ष करती है। दो महीने से मायके में रहने का ताना देती है। इतना बता कर मम्मी तो अपने काम में लग गयी पर मेरी चिन्ताओं का अन्त नहीं था। कहीं सुनी एक पंक्ति बार- बार मस्तिष्क में गूँजने लगी- ननद तो जैसे बैरी जनम-जनम की। क्या भाभियों के लिए ननद दुश्मन ही होती है। शादी होते ही ऐसा क्या हो गया कि वह अपने घर में दो महीने भी नहीं रह सकती। खाना भी नहीं खा सकती। मुझे एक हल सूझ गया। मैं जाकर मम्मी से बोली, आप बेबी को साबुन तेल आदि जरूरत की चीजें दे दीजिये। मम्मी बताने लगी कि पास में पड़े रुपयों से बेबी ने आज अपने जरूरत की चीजें खरीद ली हैं। मुझे बड़ा राहत हुआ। अगले दिन जब मैं स्कूल से लौटी तो देखा, बेबी बैठी खाना खा रही थी। मुझे देख वह थोड़ी संकुचित हुई। तब मम्मी कहने लगी श्रेया देखो न! बेबी की भाभी ने कल से इसे कुछ खाने को नहीं दिया है। यह यहाँ आकर चुपचाप रो रही थी। एक बार बेबी की तरफ देखकर बोली, यह हम लोगों को इतना पराया समझती है कि आकर बताया भी नहीं और यह भी नहीं हुआ इससे की आकर खाना यहीं खा ले। मम्मी ने मानों उलाहना दिया। बेबी चुप रही निरत्तर। मैं भी बोली, हम लोगों को पराया समझती हो बेबी, इसलिए रात से अब तक भूखी थी। रात को घर आने पर पापा को इस बात का पता चला। उन्होंने भी यही कहा कि जब तक बेबी मायके में है तब तक वह खाना यहीं खा लेगी। आखिर वो इस घर में बच्चों के साथ खेलती- घूमती रही है। लेकिन अगले ही दिन बेबी को अपने घर में ही खाना मिलने लगा। दरअसल उन्हें ज्ञात हो गया कि सारी बातों की जानकारी हमें हो गयी है। हम लोगों का शर्म लिहाज करने के कारण तथा बेबी के पापा द्वारा फटकार लगाये जाने के कारण उन लोगों ने अपना फैसला बदला। आठ-दस दिन के बाद घर वालों को खुशी और हमें आश्चर्य देकर बेबी ससुराल चली गयी। समय पंख लगाकर उड़ता गया। बीच में जब कभी मम्मी आदि के बीच बेबी की चर्चा होती तो उसका सार होता कि पति भी उस पर ध्यान नहीं देता है, सास- ननद तो बैरी थे ही। साथ ही यह भी कि जाते समय बेबी ने अपनी भाभी से कह दिया था। मुसीबत आने पर भी वह कभी लौटकर इस घर में नहीं आयेगी। सात- आठ महीने बाद, एक दिन पुनः बगल के घर में रूदन का स्वर सुनकर मैं दौड़ी-दौड़ी छत पर आयी। उम्मीद थी, शायद बेबी आयी हो। नजारा कुछ भिन्न् दिखा। बेबी की माँ आँगन की जमीन पर लोट-लोट कर रो रही थी। बीच-बीच में अपनी छाती पीटती जाती, और बार-बार बेबी के नाम का उच्चारण करती, क्यों छोड़ गयी बेबी! हाय! मेरी बेटी आदि। मैं सन्न् रह गयी सहारे के लिए मैंने दीवार पकड़ी। आँखों से धारा बहने लगी। दिल यह मानने को तैयार नहीं था। अन्दर से बार-बार यही आवाज आ रही थी- इन्हें किसी ने झूठी खबर दी होगी। हमारी बेबी नहीं मर सकती। इच्छा हुई कि किसी को बुलाऊँ, पर मुँह से आवाज ही नहीं निकली। थोड़ी देर बाद मैं नीचे आ सकी। सबको यह खबर गलत लगी। दूसरे दिन सुना- यही होनी थी। बेबी तो एक महीने पहले संसार के सारे कष्टों से मुक्ति पा चुकी थी। सम्भवतः ससुराल वालों ने जहर खिला दिया। उन लोगों ने अपनी तरफ से किसी को खबर नहीं दी, जिसने जाना-पूछा उसे यही कहकर टाल दिया कि उसने स्वयं जहर खाया है । इन दिनों बेबी मुझसे दूर हो गयी थी। शादी करके काफी बदल गयी थी। फिर भी मैं जानती हूँ यह सच नहीं है। वह खुद विषपान नहीं कर सकती कभी नहीं.......!



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