बैरिक नं १३
बैरिक नं १३
लैंसडाऊन छावनी है, ये उत्तराखंड में छोटा सा हिमालय से लगा पर्वतीय क्षेत्र है। यहाँ गब्बर सिंह द्वार भी है। जिन्होंने अपनी शौर्य से चीनी फौजियों को नाको चने चबवाए थे।
कहते हैं ...
250 साल पहले अंग्रेजों ने बसाया था !
अंग्रेज चले गए पर अपनी लकड़ी से बने बंगले और बैरेक छोड़ गए।
लैंसडाऊन जो छोटा पहाड़ी स्थान है।
बहुत ठंडा जून के महीने भी रजाईयां ओढ़ी जाती थी। हम बैरेक 13 न. में रहते थे।
अंग्रेजों के बैरिकनुमा बिल्डिंग थी।कहते हैं पहले यहाँ अंग्रेजी फौज की ट्रेनिंग हुआ करती थी।
यही टीचर हॉस्टल था। वहाँ हम रहते थे। मां केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका थीं..!
रात को मैं देर तक पढ़ रही थी। बारिश हो रही थी रिमझिम..। मैं कौफी बनाने उठी,हमारे हॉस्टल की छत धातु की बनी थी, बारिश की आहट छत पर आवाजें करती थी..हवा सांय .सायं करती कभी दरवाजों को जोर से हिला जाती..। कुछ अनजाने साए की कल्पना कर मैं सिहर जाती। बोर्ड परीक्षा की तैयारी करनी थी,रात देर तक कैमिस्ट्री पढ़नी थी। तन तप रहा था और ज्वर का आभास हो रहा था।
घर पर कोने पर एक लैंप जल रहा था। मैं मुश्किल से कॉफी बनाने उठी,कुछ देर पढ़कर, फिर निढाल हो बिस्तर में जा गिरी..।
कभी सुना था बस बुजुर्गों से,वो महीना भादो यानि,अगस्त का था,कहते हैं भादो प्रेत योनि का महीना होता है,तब तक मैं आंखें उनिनंद सी हो रही थीं । रात के बारह बजे सन्नाटा भयावाह...
तभी:
बैरेक की सीढ़ियों में टक ..टक..टक ..टक आवाजें आ रही थी...।
लगा कोई ऊंची ऐड़ी की सैंडल से सीढ़ियों के ऊपर चढ़ रहा है...। धीरे -धीरे आवाजें कानों के नजदीक आने लगी। मैं बुरी तरह भयभीत हो गई।
उसी शाम जब "धोबी "हमें अग्रेंजों की कहानी सुना रहा था। वह बता रहा था,"अंग्रेजों के समय से उनके दादा परदादा से वे प्रेस का कर रहें हैं। "
वो आगे बता रहा था..
"एक अंग्रेज घोड़े की रास पकड़ता हुआ उतरता है,पास कंधे में धीरे से थपथपाता है और माचिस मांगता है, सिगरेट सुलगाते हुये घोड़े के ऊपर बैठकर वापस चला जाता है। "
उस भयावह रात वह सब याद आ रहा
मुझे आवाज़ो का बहुत नजदीक से अहसास हुआ, भय के कारण मेरी आवाज बंद थी..। मैं पसीने से लथपथ हो गई। बुखार बढ़कर और तेज हो गया । मैंने अफने कान ढक लिए ताकि, आवाज ना आए,मेरा शरीर कांप रहा था।
बड़ी मुश्किल से मां को उठा पाई और मां मुझे देख बहुत परेशान हो गई, उनको पता चला उन्होंने मुझे पूजा के सामने धूप जलाने को कहा। ऊं नमः शिवायः और रूद्राष्टक बुलवाया मुझसे।
मैं सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी। मैं शांत होने की कोशिश कर रही थी,उस घड़ी मैं बिल्कुल शून्य हो चुकी थी ..। मां ने किसी तरह मुझे सुला दिया।
अगली सुबह मैं उठी और मैं उस भयानक स्वप्न को भूलना चाहती थी, मैंने अपने मन को काबू किया और अपने उस डर से बाहर आई।
अब सोचती हूं जो भी था मुझे एक सीख दे गया,
इस भौतिक दुनियां से परे भी दूसरी दुनियां भी हो सकती है जिसे हम अलौकिक, अविनाशी या अकल्पनीय समझ सकते हैं ..जो हमारे काबू में नहीं है ..।
शायद हम उसे बहम समझे। ये भी हो सकता है।

