minni mishra

Abstract Others


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बाल सखा

बाल सखा

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“फिर तुम, इतनी रात को यहाँ ? देखो, शोर मत मचाओ, सभी सोये हैं..जग जायेंगे। तुम्हें पता है न, समय के साथ सब को नाचना पड़ता है ? बच्चे स्कूल जाते हैं, पति काम पर और मैं...मूरख, दिन भर अकेली इस कोठी का धान उस कोठी करते रहती हूँ। 

सच कहती हूँ, बचपन की यादें, तुम्हारे साथ बिताये पल, मुझे हमेशा सताती है। पर, तुम्हारी तरह अब मैं स्वच्छंद नहीं रही, जहाँ चाहूँ, वहाँ उड़ान भर सकूँ। समय के साथ रिश्तों की अहमियत बदल जाती है। मैं बाल-बच्चेदार वाली हो गयी और तुम, वही कुंवारे के कुंवारे ! तुम क्या जानो, शादी के बाद औरत के दिलो- दिमाग में अचानक क्या सब परिवर्तन हो जाता है ! 

ओह ! फिर से शोर..! बस भी करो या..र ! पर, देखे बिना तुम जाओगे नहीं ! ठीक है, खिड़की के पास आती हूँ। मुझे देखकर, वापस तुरंत लौट जाना। " मैं बड़बड़ाते हुए जैसे ही खिड़की के पास पहुँची, एकाएक बिजली की कौंध से उसका वही मासूम, नटखट चेहरा, अधखुली खिड़की से साफ़-साफ़ दिखा। देखते ही दिल में प्यार का सैलाब फिर से उमड़ पड़ा। अपने को मैं रोक न सकी। झट दरवाजा खोल बाहर निकल आई। 

दरवाजे की चरमराहट से पति की नींद टूट गई, वो चिल्लाये, “मीरा... क्या हुआ? सर्द रात में बाहर कहाँ जा रही हो... ?” हड़बड़ा कर वो मेरे पीछे, दरवाज़े के निकट आ पहुँचे।

 सामने टकटकी लगाये उताहुल खड़ा, मेरा बाल सखा ‘तूफान' और अंदर सुरक्षा का ढाल लिए खड़े पति को देख, दहलीज से निकले मेरे पैर .... हठात् कमरे में वापस फिर से क़ैद हो गए। 

आस लगाए, बाहर खड़ा तूफान अब एकदम शांत हो चुका था। शायद, वो समझ गया कि औरत खोखले ख्वाबों में उड़ान भरने से ज्यादा, खुद को महफ़ूज रखना अधिक पसंद करती है।



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