अनजान राह की रोशनी
अनजान राह की रोशनी
अनजान राह की रोशनी
सिद्धार्थ एक ऐसा ब्रांच था जिसे पुरानी इमारतों और खामोश गलियों में सुकून मिलता था। शहर की भाग-दौड़ से दूर, एक पुराने किले के पास बस छोटे से गाँव में वो अक्सर अपनी डायरी लेकर बैठ जाता था। उसका मानना था कि हर दीवार की अपनी एक ज़ुबान होती है, बस सुनने वाला चाहिए।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आसमान नरम गुलाबी और संतरे रंग में रंगा था, सिद्धार्थ ने एक पुरानी हवेली देखी जो अब खंडहर बन चुकी थी। गाँव वाले कहते थे कि उस हवेली में एक ऐसा कमरा है जो सालों से बंद है और जो भी उसके करीब गया, वो रास्ता भटक गया। सिद्धार्थ के लिए ये कोई कहानी नहीं, बाल्की एक नई कहानी का आगाज था।
वो हवेली के अंदर दाखिल हुआ। चारों तरफ मिट्टी और पुरानी लकड़ी की महक थी। चलते-चलते उसकी नज़र एक बड़े से आईने पर पड़ी जो धूल से ढका था। जैसे ही उसने अपना हाथ उस पर फेरा, उसके आईने के पीछे एक छोटा सा दरवाज़ा नज़र आया। दिल की धड़कन तेज़ थी, पर फुज़ूल के दर से ज़्यादा उसमें कुछ नया जानने की तड़प थी। उसने दरवाज़ा ढकाला। वो बंद कमरा दरसअल एक पुरानी लाइब्रेरी थी। वहाँ हज़ारों किताबें थीं, पर सबसे बाल करने वाली बात ये थी कि हर किताब का पन्ना खाली था। कमरे के बीच में एक पुरानी मेज थी जहाँ एक कलम (पेन) और एक चिराग रखा था। सिद्धार्थ ने जैसे ही उस चिराग को जलाया, किताबों के खाली पन्नों पर शब्द अपने आप उभरने लगे। वो बाल रह गया। ये किताबें उन लोगों की थीं जो कभी अपने सपने पूरे नहीं कर पाए। हर किताब एक अधूरी कहानी थी। सिद्धार्थ को एहसास हुआ कि ये जगह कोई जादू नहीं, बाल्की एक मौका है—उन अधूरी कहानियों को अंजाम तक पहुँचाने का। उसने वहाँ बैठकर लिखना शुरू किया। उसने उन लोगों को उम्मीद दी, उनके दुखों को शब्दों में ढाल कर उन्हें मुक्ति दी। पूरी रात वो लिखता रहा। जब सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, वो लाइब्रेरी गायब हो चुकी थी। सिद्धार्थ अब हवेली के बाहर खड़ा था, पर उसके हाथ में एक नई डायरी थी जिसमें उसने अपनी ज़िंदगी का नया मकसद लिख लिया था। उसने समझा था कि हर पुरानी कहानी को एक नया मोड़ देना ही असली कलाकार है।
गांव वाले अब भी उस हवेली से डरते हैं, पर सिद्धार्थ के लिए वो जगह उसकी कामयाबी की पहली सीधी थी। उसने शहर लौटकर उन अधूरी कहानियों को दुनिया के सामने रखा, और देखते ही देखते वो एक मशहूर लेखक बन गया

