Dr Jogender Singh(घोंघा)

Children Stories


4.0  

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अलमस्त डुग्गु

अलमस्त डुग्गु

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"डुग्गु तुमने अपना सब सामान रख लिया ना ?" विनीता ने रसोई से आवाज़ लगाई।

" हाँ मौसी, रख लूँगा अभी तो आठ ही बजे हैं। " नाश्ता कर लूँ फिर पूरा बॉक्स लगा लूँगा। 

नहा लिए तुम ? नाश्ता लगा दूँ। तुम्हारे मौसा जी कर चुके हैं नाश्ता। 

जा रहा हूँ नहाने, आप बना लो। 

तुम नहा कर आओ, तब लगाऊँगी मैं नाश्ता। ठंडा हो जायेगा।" कितना सुस्त है यह लड़का , सुधर नहीं सकता।" विनीता बुदबुदाई। 

दरअसल डुग्गु की हाई स्कूल की परीक्षा थी। आख़िरी पेपर बचा था। पिछला पेपर सात दिन पहले हुआ था साइंस का। सात दिन बाद गणित का आख़िरी पेपर था। 

इस लड़के के पेपर ख़त्म हो जाये तो थोड़ा चैन मिले। विनीता अरविन्द से बोली।

इसको ज़रा भी टेन्शन नहीं होती। अरविंद ने पेपर उठाते हुए कहा। मैं इसको सेंटर पर छोड़ ऑफ़िस चला जाऊँगा, दो बजे फिर ले लूँगा। 

ठीक है। विनीता बैठते हुए बोली। डुग्गु अपनी मौसी के पास रह कर पढ़ाई कर रहा था, पिछले चार साल से। डुग्गु यानी राकेश। राकेश का प्यार का नाम डुग्गु था। वैसे तो सीधा बच्चा था, हर काम सलीके से करता, परंतु हर काम को अपने तरीक़े से। डुग्गु को यह समझ नहीं आता कि लोग टेन्शन क्यूँ करते हैं ? या उसने अपनी समस्याओं के साथ सामंजस्य बिठा लिया था। डाँट खा कर भी अपने मन की ही करता,( धीरे से, चुपके से )। 

विनीता का लड़का सोनू डुग्गु से पाँच साल छोटा, पढ़ने में होशियार। सोनू दिन भर जासूस की तरह डुग्गु की हर हरकत पर नज़र रखता। तुर्रा यह कि स्कूल भी दोनों का एक। विनीता जैसे ही बैंक से वापिस आती सोनू डुग्गु की सारी हरकतें सिलसिलेवार बताने में जुट जाता। "मम्मी डुग्गु भैया पूरे तीन घंटे से टी॰ वी॰ देख रहे हैं।" मम्मी डुग्गु भैया फ़ेसबुक पर फ़लाँ लड़की से बात कर रहे थे। डुग्गु बेचारा बस सोनू को घूर कर रह जाता।

देवी जो घर में खाना बनाती थी, धीरे से सोनू की शिकायत की गवाह बन जाती। बस फिर विनीता का भाषण शुरू।" क्या चाहते हो तुम डुग्गु ? बेटा पढ़ लिया करो। क्यों नाक कटवाने पर तुले हो।"

डुग्गु चुपचाप सुनता रहता। अगले दिन फिर से गलती दोहराने को।

" मौसी नाश्ता लगा दीजिए " डुग्गु नहा कर आया। 

सवा नौ होने वाले थे, दस बजे से परीक्षा थी। मैं गाड़ी निकालता हूँ, तुम नाश्ता कर नीचे आ जाना। अरविंद कार की चाबी उठाते हुए बोला।

ठीक मौसा जी। 

डुग्गु ने नाश्ता ख़त्म कर, अपने पाउच को खोजा जिसमें अड्मिट कार्ड भी रखा था। मिल ही नहीं रहा था। 

डुग्गु जाओ, मौसाजी इंतज़ार कर रहें है। विनीता ने घड़ी देखी नौ बज कर तीस मिनट हो गए। क्या ढूँढ रहे हो ? विनीता ने डुग्गु से पूछा। दस बजे से परीक्षा शुरू हो जायेगी।

मौसी प्रवेश पत्र नहीं मिल रहा। 

तुमसे लाख बार कहा, सुबह से सारा सामान लगा लिया करो। बैग चेक करो। सोनू बेटा पापा को फ़ोन करो। बता दो पापा को कि भैया का अड्मिट कार्ड नहीं मिल रहा। 

विनीता और डुग्गु सारे कमरे को छानने लगे। सोनू भी फ़ोन करने के बाद डुग्गु की किताबें उलट पलट कर प्रवेश पत्र ढूँढने लगा। 

मिल जायेगा मौसी , परेशान मत हो। डुग्गु बोला।

विनीता की इच्छा हुई उसको थप्पड़ लगाने की, पर उसकी परीक्षा का ख़्याल आते ही बस घूर कर रह गयी। 

तब तक अरविंद भी वापिस आ गया। " चलो चलते है। तुम अपनी एक फ़ोटो ले लो।" 

जी ! डुग्गु ने एक फ़ोटो ले ली। 

अब क्या होगा ? विनीता ने अरविंद से पूछा। 

इसको सेंटर पर किसी तरह बिठवा कर मैं स्कूल जा कर डूप्लिकेट अड्मिट कार्ड बनवाने की कोशिश करूँगा। 

आप ग़ुस्सा मत करना। विनीता ने धीरे से बोला। पेपर है इसका।

डुग्गु और अरविंद गाड़ी में बैठ गए। याद करने की कोशिश करो साइंस के पेपर के बाद कहाँ / कहाँ गए थे ? 

मौसा जी घर ही तो आए थे ,आपके साथ। डुग्गु शांत था।

हूँ— अरविंद सोच रहा था कि कैसे सेंटर इंचार्ज से रिक्वेस्ट करूँगा, फिर स्कूल जा कर प्रिन्सिपल से मिलना। क्या पता सेंटर हेड माने या ना माने, बच्चे के भविष्य के लिए मान जायेगा। ऑफ़िस की तो छुट्टी करनी पड़ेगी।अ रविंद सोचता जा रहा था। " सुनो डुग्गु साइंस के पेपर के बाद सेंटर की बग़ल में जो सरदार जी की दुकान है, वहाँ कोल्ड ड्रिंक पी थी। कहीं बॉक्स वहीं तो नहीं छूट गया था ? " 

नहीं मौसाजी वहाँ नहीं छूटा। डुग्गु भरोसे से बोला। 

फिर भी अरविंद ने गाड़ी सरदार जी की दुकान पर रोक दी। " सरदार जी एक बॉक्स —- 

अरविंद की बात पूरी होने से पहले ही सरदार जी ने एक बॉक्स तेज़ी से अरविंद की तरफ़ बड़ाया। मानो उसमें बम्ब हो।" भाई साहब हफ़्ते भर से टेन्शन में हूँ कि कोई बच्चा अपना अड्मिट कार्ड इस बॉक्स में छोड़ गया और लेने भी नहीं आया।" 

अरविंद तब तक बॉक्स चेक कर चुका था, डुग्गु का ही बॉक्स था, अड्मिट कार्ड के साथ। 

थैंक यू सरदार जी। अरविंद ने चैन की साँस ली।

"मैं कहता था न मिल जायेगा। " डुग्गु बोला। 

"बेस्ट ओफ़ लक " अरविंद अपने ग़ुस्से को दबाते हुए बोला। 

थैंक यू मौसा जी। डुग्गु शांत था। दिन में रिक्शे से आ जाऊँगा। दोस्तों के साथ थोड़ी मौज / मस्ती करूँगा।

ठीक है। अरविंद ने डुग्गु को पैसे पकड़ाते हुए कहा। अड्मिट कार्ड मत भूलना। 

अरे नहीं मौसा जी। डुग्गु मुस्कुराया।बाई।

बाई। " अलमस्त डुग्गु " अरविंद ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए सोचा।



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