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Shravani Balasaheb Sul

Abstract

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Shravani Balasaheb Sul

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यह रात की तन्हाई

यह रात की तन्हाई

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यह रात की तन्हाई न जाने 

क्या क्या कहती रहे 

चंचल सी नदी मजबूरन 

बहाव को भेद के बहती रहे 

चढ़ती ढलती तपिश सह के 

सूरज से चांद हो जाता है

वक्त लम्हा लम्हा खरोंच के 

रात किनारे आबाद हो जाता है

इस शालीन शमा में खौफ है 

गुमनाम गुमराह हो जाने का

इसी में मगर यकीन है यकीनन 

दफ्न हो रखे मैखानों का

चेहरे के जहन के जिस्त के 

तमाम नकाब उतर जाते यूँ ही

यूँ ही यह रात की तन्हाई 

नकाबों को तक बेनकाब कर रही 



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