ये लम्हे
ये लम्हे
जी लो यह लम्हे खुल के, कि ये फिर ना मिलेंगे
जीवन की आपाधापी में, पड़ाव के ये क्षण फिर ना मिलेंगे।
संभाल लो कुछ बिखरे से रिश्ते, कुछ उलझे से लम्हे,
कि उलझने सुलझाने को, ये बंदोबस्त फिर ना मिलेंगे।
जी लो यह लम्हे खुल के , कि ये फिर ना मिलेंगे,
उकेर लो कागज पर कोई भूली बिसरी तस्वीर फिर ,
कि कशमकश दुनिया की, में उकेरने को फिर कोई अक्स ना मिलेंगे।
जी लो यह लम्हे खुलके कि ये फिर ना मिलेंगे,
मिल बैठ के शिकवों शिकायतों को कर दो दरकिनार
गिरहें खोलने को ये सन्नाटे वीराने फुर्सतों के दौर फिर ना मिलेंगे।
