वो शहर
वो शहर
वो शहर
जो तेरे होने से आबाद था
तेरे न होने से
उजड़ा-उजड़ा सा लगता है।
वो तन्हा सा रास्ता
जहाँ हम मिल गए थे यूहीं
तेरे न होने से
और ज्यादा तन्हा-तन्हा सा लगता है।
शहर का वो भीड़ भरा कैफे
जहाँ तेरे साथ
एक कप कॉफी पर
भीड़ में भी तन्हा हो जाते थे हम
तेरे न होने से
बहुत ही बेगाना-बेगाना सा लगता है।
वो दिन जब तूने
बिना कुछ कहे ही
ख़ामोशी से
अलविदा कहा था मुझे
और उस शहर को
वो दिन आज भी
मेरे सीने में फांस की तरह
चुभा-चुभा सा लगता है।
न तू है उस शहर में अब
न ही मैं उस शहर का हूँ अब
लेकिन मेरे वजूद का वो हिस्सा
जो तेरे इंतजार में
वहीं उस शहर में छूट गया था कहीं
वो आज भी मुझ से जुदा-जुदा सा लगता है।

