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दयाल शरण

Abstract


4.0  

दयाल शरण

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स्वप्न से संवाद

स्वप्न से संवाद

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जिस्म थक जाए 

जब सोने का 

बहाना खोजे

मन में छुपे 

स्वप्न आपको

जगाने का 

बहाना खोजे


नींद भर लेना 

जरा शहद भरी 

मुट्ठी में

वक्त नाज़ुक है, 

कोई आपको, 

ख़ुद आपसे

मिलवाने का

बहाना खोजे


आपके हिस्से में

अब क्या है

हमारे हिस्से में

क्या आएगा

ख्वाब तितली हैं

बड़े बेफिक्र

पंख फैलाने का

बहाना खोजें


सुबह से शाम तक

वो रोटी कमाने 

निकला तो है

घड़ी की सूई सा

धुरी पे नाचने 

निकला तो है

जुबा पे प्यास

जीवन में ललक

नई जमीं खोजे।।


नींद भर लेना 

जरा शहद भरी 

मुट्ठी में

वक्त नाज़ुक है, 

कोई आपको, 

ख़ुद आपसे

मिलवाने का

बहाना खोजे!



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