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Sonam Kewat

Abstract Others

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Sonam Kewat

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सूरज और चांद

सूरज और चांद

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तू सूरज है तो मैं चांद हूं,

तू जलता हुआ आग हैं 

तो मैं बुझती हुई राख हूं।

तुझमें गर्मी है लोगों को जलाने खातिर,

मेरे शीतलता आग को बुझाती आखिर।

चांद और सूरज दोनों की बात अलग है,

क्योंकि दोनों की अपनी ही जिंदगी है।

सूरज घूमता रहता हैं दिन में,

तो चांद रातों में गुम कहीं है।

बस यूं ही समझो कि सूरज में आग,

और चांद में भरपूर त्याग है।

एक दूसरे से मिल नहीं पाते कभी 

ये भी उन दोनों का भाग्य है।

जलन की गर्मी ऐसी थी की,

सूरज को खूब बेचैन किया।

चांद ने अपने टुकड़े से फिर, 

थोड़ा हिस्सा सूरज को दिया।

सूरज धीरे धीरे समझ रहा था,

चांद की चांदनी शीतलता को।

और प्रेम कर बैठा चांद से, 

जानता था पा नहीं सकता उसको। 

अब चांद की चांदनी हर रोज,

हिस्सा गंवाकर आधी हो जाती थी।

कभी अमावस तो कभी पूर्णिमा बनकर,

रोज सूरज की राह निहारती थी।

सूरज भी चांद को पाने खातिर,

पूर्व से पश्चिम चलता रहा।

रोज सुबह निकलता था और, 

हर शाम इंतजार में ढलता रहा। 

अब इसी तरह दिन से रात,

और रात से दिन का पहरा था।

दिन और रात मिलाकर शाम हुई,

ये वक्त काफी सुनहरा था।

सिंदूरी सा रंग है फिजाओं में,

पंछियों की आवाज सुरताल छेड़ रही थी। 

लहरों में उमंग ऐसी बढ़ी कि,

एक किनारे से दूजे किनारे खेल रही थीं।


अब प्रकृति का सौंदर्य है कि, 

सूरज को ढलने पर और,

चांद को निकलने पर मजबूर किया।

चांद और सूरज को मिला दिया,

उनके बीच की दूरी को दूर किया।

कभी आती है चांद मिलने सूरज को, 

तो कभी सूरज चांद से मिलने आता है।

दिन भर जलता हुआ सूरज,

सिर्फ चंद के शीतलता में सुकून पता है।

तब से आज तक चलता है ये सिलसिला,

इंतजार में हर प्रेमी तड़पाए जाते हैं।

गहरा हो जाए जब प्रेम सूरज और चांद सा, 

तो आखिर में हर शाम वो मिलाए जाते हैं।



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