श्रम साधक का बहे पसीना
श्रम साधक का बहे पसीना
चौपाई छंद श्रम साधक का बहे पसीना श्रम साधक का बहे पसीना। चाहे सुख से वो भी जीना।। करना चाहे सपने पूरे। जो भी अब तक रहे अधूरे।। श्रम साधक उन्नति पथ चलता। निज परिजन का पालन करता।। तभी राष्ट्र भी आगे बढ़ता। नव विकास की गाथा लिखता।। श्रम साधक का मोल समझना। हेय दृष्टि मत आप देखना।। श्रम साधक का मूल्य समझिए। दे सम्मान निकट ही रखिए।। मानो इनको आप धरोहर। ये भी तो हैं आप सहोदर।। बहा रहे दिन रात पसीना। हँसी-खुशी चाहते जीना।। ये कोई अपराध नहीं है। हक इनका खैरात नहीं है।। भीख नहीं ये माँग रहे हैं। जाने कितने कष्ट सहे हैं।। हम भी तो कर्तव्य निभाएँ। श्रम साधक को गले लगाएँ।। नित नूतन गाथा है लिखता। श्रम से कभी न पीछे हटता।। बस! ऐसा श्रम साधक होता। बीज सदा खुशियों के बोता।। करता निशदिन श्रम से सेवा।। पर खा पाता कब वो मेवा।। सुधीर श्रीवास्तव
