साझे का दर्द
साझे का दर्द
मैं जर्जर हूँ, कमजोर नहीं
मैं अविचल हूँ, निष्ठुर नहीं
मैं घर हूँ, हवेली नहीं
मैं मकान हूँ, मकाँ नहीं।
भले ही मैं बिखरा सा हूँ
थोड़ा टूटा फूटा सा हूँ
लेकिन आज भी मैं
सबकी यादों में बसा हूँ।
मेरे ही अंदर जन्मे थे तुम
मेरे ही संग बड़े हुए तुम
मेरी ही ख़मटी पकड़ कर
खड़ा होना सीखे हो तुम
मेरे आँगन में घुटनो से चले
मेरी डिंडयाली में तुतलाये तुम
मेरी दहलीज पर खडे होकर
खिलखिलाकर हॅसे हो तुम।
मैंने बचपन देखा, जवानी देखी
मैंने गुस्सा देखा, प्रेम करना सीखा
मैंने प्रणय देखा, मैंने बिखराव देखा
मैंने टूटे रिश्तो को जुड़ते हुए देखा।
मैंने यँहा भूख से बिलखते देखा
बेटी कि विदाई पर रोते देखा
नई नवेली बहु के लाज को देखा
तनी छाती को कमर से झुके देखा ।
अठखेली लेती जवानी को देखा
बूढी आँखो को निहारते देखा
रिश्तो को बदलते हुए देखा
घर से परिवार को अलग होते देखा।
वक़्त को बदलते हुए देखा
अपनो को अलग होते हुए देखा
अपनी दहलीज को छोड़ते देखा
खुद से दूर होते अपनों को देखा।
सब कुछ होते हुए चुप रहना सीखा
अपनी शाखाओ को टूटने पर चीखा
खड़ा हूँ अपनी जगह पर खुश था
साझा हूँ मैं यह बात करते हुए देखा।
मैंने सब कुछ सहा अपनों के लिए
अपनों को ही अब मुँह फेरते देखा
कभी बारातीयों के लिए सजा हूँ
खुद को वीरान होते हुए भी देखा।
अब बूढा हूँ किसी को जरूरत नहीं
साझा हूँ इसलिए किसी को फ़िक्र नहीं
घर तो पहले था अब तो खंडर हो रहा हूँ
क्या बताऊं दर्द, साझे होने पर रो रहा हूँ।
