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Sumit Malhotra

Abstract


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Sumit Malhotra

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राह तेरी-मेरी

राह तेरी-मेरी

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राह तेरी-मेरी हुई जुदा जुदा,

हमको बचाएं रब और खुदा।

राहों में ऊंची-नीची डगरिया,

चलते-चलते ज़रा संभलना।


ठोकरें खाते हुए गिरना नहीं,

धीरे-धीरे क़दम हमनें उठाना।

सफर वो मुश्किल था क्योंकि,

हमारे जीवनसाथी संग ना था।


अंजान सफ़र अंजान राहों पर,

दूर-दूर तक साथ कोई नहीं था।

अकेलापन महसूस किया था मैंने,

उनके छोड़कर चले जाने के बाद।


सचमुच ग़लत राहों पर चल पड़ते,

इतना खुशनसीब बाल-बाल बचा।


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