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Jalpa lalani 'Zoya'

Abstract


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Jalpa lalani 'Zoya'

Abstract


क़त्ल-ए-मोहब्बत

क़त्ल-ए-मोहब्बत

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मल्लिका-ए-हुस्न के सज़दे में हमने सर झुकाया है

राह का पत्थर समझकर हमें इस कदर ठुकराया है


तीर आँखों से चलाकर दिल के पार किया है उसने

क़त्ल-ए-मोहब्बत  का इल्ज़ाम  हमी पर लगाया है


हम अगर  ग़म भी सुनाए उन्हें तो लगता है लतीफ़ा

ग़म-ए-इश्क़ का फ़साना उसने महफ़िल में सुनाया है


अपनी मोहब्बत  की  इतनी नुमाईश  क्या कम थी?

कि मेरे ग़म को भी उसने सार-ए-आम बिकवाया है


आना मेरे पास जब तेरा खाली दिल रंज से भर जाए

मैंने  तो हरदम  तेरे  ज़ख़्म  पर  मरहम  ही लगाया है।



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