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Lipi Sahoo

Abstract


4.7  

Lipi Sahoo

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फरेबी

फरेबी

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कोई कानों में

आकर चुपके से कहा


ज़िन्दगी पहली बारिश में भीगी

मिट्टी की खुशबू है

मैंने इक़रार किया

पर थाम लिया उसमे समाने से पहले


ज़िन्दगी एक साज़ है

अनसुनी बांसुरी की धुन 

मान कर उसमें डूबने ही वाली थी

धुन ही बंद करवा दिया


फिर से आकर बोले

जिन्दगी एक सुहाना सफ़र

सिर्फ वक्त के साथ ताल मिलाना है

कदम बढ़ाया तो रोक दिया


बार बार आ कर 

सिर्फ गुमराह किया

उलझन में हुं

जिऊँ तो कैसे जिऊँ


अब तो यक़ीन होने लगा

एक अनसुलझी पहेली सी

बेवफ़ा निकले ओ हमनवा !

एक हसीन फ़रेब हो ज़िन्दगी की तरह।


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