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Prem Bajaj

Tragedy

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Prem Bajaj

Tragedy

नयनहीन

नयनहीन

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नैना मेरे खुल नहीं सकते जगत को ना मैं देख पाता ,

खोल अपने नैन-द्वार को देख ना पाऊं धरा -गगन को ।


मुझसे ना जाने क्या दोष भया पिछले किसी जन्म में ,

ना जाने क्यों निष्ठुर हो गया विधाता छीन लिए जो नैना मेरे ।


क्यो ना आई दया मुझ पर , क्यों ना तुझको लाज आई, 

क्यों मुझ पर इतनी क्रुरता बरसाई ।


भेजा जगत में बना कर के नयनहीन,

मां की साधना की भी तुने कद्र ना जानी ।


खुद को कोस रही है हर पल, कहती  क्यों मुझको वो लाई जगत में ,……

कहती , लाल क्या होगा तेरा हाल ।


कोऊ ना जाने देकर के जन्म तुझको गुज़री क्या मुझ अभागिन पर है , 

काश मैं देती तुझको ज्योति अपने नैनों की ।


मेरे नैनों की ज्योति तेरे नैनों में हंसती । 

दे दी सूरज - चांद को रौशनी एक किरण मुझको भी दे देता ,  

करता  मै  तेरा उपकार सदा ।


रह कर जगत में रहुंगा जग से अनजान सदा काश देखूं मैं भी जग को खोल के चक्षु ये 

पर तेरा रहेगा मुझ पर ये अभिशाप सदा।


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