नयनहीन
नयनहीन
नैना मेरे खुल नहीं सकते जगत को ना मैं देख पाता ,
खोल अपने नैन-द्वार को देख ना पाऊं धरा -गगन को ।
मुझसे ना जाने क्या दोष भया पिछले किसी जन्म में ,
ना जाने क्यों निष्ठुर हो गया विधाता छीन लिए जो नैना मेरे ।
क्यो ना आई दया मुझ पर , क्यों ना तुझको लाज आई,
क्यों मुझ पर इतनी क्रुरता बरसाई ।
भेजा जगत में बना कर के नयनहीन,
मां की साधना की भी तुने कद्र ना जानी ।
खुद को कोस रही है हर पल, कहती क्यों मुझको वो लाई जगत में ,……
कहती , लाल क्या होगा तेरा हाल ।
कोऊ ना जाने देकर के जन्म तुझको गुज़री क्या मुझ अभागिन पर है ,
काश मैं देती तुझको ज्योति अपने नैनों की ।
मेरे नैनों की ज्योति तेरे नैनों में हंसती ।
दे दी सूरज - चांद को रौशनी एक किरण मुझको भी दे देता ,
करता मै तेरा उपकार सदा ।
रह कर जगत में रहुंगा जग से अनजान सदा काश देखूं मैं भी जग को खोल के चक्षु ये
पर तेरा रहेगा मुझ पर ये अभिशाप सदा।
