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नकचढ़ी बारिश

नकचढ़ी बारिश

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तेरा आना भी हो गया है नकचढ़ी बारिश की तरह 

बस रोज उम्मीद बंधती है और रोज टूट जाती है 


जब लिखा ही नहीं है मेरी किस्मत में मिलना तुझसे 

तो क्यों रोज रोज बदली उम्मीदों की छाती है 


सूख गए है दरख्त दिल का तेरे इन्तजार में 

आँखे इक बून्द के इन्तजार में पथराई जाती है 


क्या उनको दिखता नहीं दर्द मेरे सूखे होंठो पे 

क्यों वो बहानो के बादलो पे बैठ के चली जाती है 


दिन बीते राते बीती अब तो महीनों गुजर गए 

सब कुछ बिखर गया बस उम्मीद नहीं जाती है 


आँखों का बहता दरिया ना जाने कब सूख गया 

इक बारिश है जो हालात मेरे समझ नहीं पाती है 


गमो के सूरज की तपिश बढ़ती जाती है हर दिन 

अब तो रातों में चाँद की चांदनी भी हमे जलाती है 


ये बारिश यूँ तो दिलजली ना कर मुद्दतों के प्यासों से 

तुम्हे इश्क में दिल्लगी सूझती है यहां जान जाती है 


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