Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

मेरे मन को

मेरे मन को

1 min 271 1 min 271

मेरे मन से उतरकर,

जब तू बसता हैं मेरी सांसों में...


मैं मुझे नहीं जान पातीं...

क्या हो रहा हैं मेरे अंदर... ? 


मेरे तन-बदन में... 

समझ नहीं आता हैं मुझे... ?


बस...

तेरी सांसों को मेरे अंदर

समेटना अच्छा लगता है मुझे...


तुझे लपेटकर सोना 

बहुत भाता हैं मेरे मन को...





Rate this content
Log in

More hindi poem from UMA PATIL

Similar hindi poem from Abstract