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Raju Kumar Shah

Abstract


4.5  

Raju Kumar Shah

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मेरे हिस्से ही क्यों आता

मेरे हिस्से ही क्यों आता

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मैं नहीं समझता मेरे हिस्से ही क्यों आता है

गम का मंजर जो हल्का होता सा,

और तुरंत बदल जाता है!

जब रोप रहे थे अरमानों को मिट्टी में,

वें पौधे खुशियों के!

खिलने थे जो फूल बनकर! वह कांटों में बदल जाता है!

सूखे नहीं मेरे रास्ते, मैं सना रहा कीचड़ में,

कहीं तलाश भी लूं सूखी जमीं,

तो वहां का मौसम बारिशों में बदल जाता है!

ऐसा नहीं है कि उष्ण सी चाहतों को बर्फ़ का साथ नहीं मिलता!

पर इतनी गर्म है तासीर किस्मत की,

बर्फ़ पानी सा पिघटकर कहीं और निकल जाता है!

पर! यकीन नहीं टूटता, गिरकर आसमानों से,

मैं बिखरता हूं जमीं पर,

और हौसला आसमां से ऊपर चला जाता है!

इंतजार में हूं, अपनी तकलीफों से बेखबर बेपरवाह!

गीली गीली लकड़ियों को समेटता,

क्योंकि सुना है!

शिद्दत से पानी में आग जल जाता है!


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