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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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लोभ मोह में उलझा मानव

लोभ मोह में उलझा मानव

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सरसी छंद गीत (१६, ११) लोभ मोह में उलझा मानव लोभ मोह में उलझा मानव,   बनी हुई है पीर। कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।। इस दुनिया की गजब कहानी, सभी  सुनाते  रोज। अपने निजी स्वार्थ की दुनिया, सभी रहे हैं खोज।। राज कभी  इसके  पीछे का,  बिल्कुल नहीं पनीर।। राज छुपा  इस रोग  बीच में, दिखे  न  कोई  चीर।। बेशर्मी  इन  सबकी  देखो,       खड़े  हुए  सब  मौन। इन्हें देखकर कहना मुश्किल, आखिर ये सब कौन।। पर  इनके  भीतर  की  मंशा,     करती  इन्हें  अधीर। कैसे  कोई  समझाए  इनको,     व्यर्थ  बहाते  नीर।। नहीं कदर वो  करें किसी की, मन के कुत्सित भाव। इसीलिए  तो  समझ न  पाते,    दूजी  पीड़ा  घाव।। इनका  नहीं  दर्द  से  नाता,  व्यर्थ  हृदय  की  चीर।। कैसे  कोई  समझाए  इनको,     व्यर्थ  बहाते  नीर।। पाप-कर्म  जीवन का  हिस्सा, धन-दौलत  ईमान। इसके आगे  और नहीं  कुछ,  इनको होता ज्ञान।। मान रहे  ये फेल  सभी हैं,  जग के  पीर फकीर।। कैसे  कोई  समझाए  इनको, व्यर्थ  बहाते  नीर।। मानव जीवन की कुर्बानी, भला करें क्यो याद। यह तो इनको ऐसे लगता, करते हम फरियाद।। घड़ियाली आँसू से इनके, बचकर  रहो  सुधीर। कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ  बहाते  नीर।। सुधीर श्रीवास्तव  


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