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Satyendra Gupta

Abstract

4.5  

Satyendra Gupta

Abstract

कहां से कहां

कहां से कहां

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428


टेलिविजन की तरह जीवन हो गए है

रिमोट कंट्रोल किसी और के पास है

जो वो करना चाहता है बस वही कर पाते हैं

जो वो सुनना चाहता है बस वही सुनाते हैं


मोबाइल की तरह जीना पड़ रहा है

लगता है जैसे हरदम बयस्त हुं

कभी कभी लगता है है मेमोरी भर,


जाने से दिमाग हैंग हो रहा है

कीपैड भी सुस्त पड़ जाता है

लिखने को कुछ और कुछ लिख रहा है


इससे अच्छा तो वो समय था

जब मोबाइल और टेलीविजन नही था

लोग पत्रों से अपनी भावना लिखते थे

पढ़ने वाले उसी भावों से पढ़ते थे

हाल चाल जानने के लिए


लोग एक दूसरे से मिला करते थे

आज एक साथ रहकर भी 

बात नही कर पाते है

मोबाइल में व्यस्त रहने के कारण

अपनापन खोते जा रहे है।


काश! अपना जीवन होता पहले जैसा

आता ही नहीं मोबाइल और टेलीविजन

सादगी भरा जीवन जीते आजीवन

इतनी सुविधा होने के वावजुद भी


लोगो के पास सुकून बचा है कहां

लोग पहले से भी ज्यादा परेशान है यहां

लोग पहले से भी ज्यादा परेशान है यहां।।


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