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Hilal Saeed

Tragedy


5.0  

Hilal Saeed

Tragedy


खामोशी

खामोशी

1 min 165 1 min 165

ना जाने कैसी खामोशी है जो मुझसे नही निकलती,

बोलना की ख्वाहिश में लफ्ज़ नही मिलते, ज़ुबाँ नही खुलती।


हर पल समझाता हूँ खुदको, अब तनहा हूं मै,

खामोशी! पता चलता है कि जिंदा हूं मै।


खामोश रातों से गुफ्तगु करना अब मुझे अच्छा लगने लगा है,

खुद को खामोशी से सुनना अब आदतों में जो आ गया है।


अब महफिलों को छोड़ जाना अच्छा लगता है,

पलको पर अश्कों को सजाना अब अच्छा लगता है।


यारी ऐसी है अश्कों से, रुकते नही ये अब आखों में,

तनहाई में अक्सर ठहर जाते हैं आकर पलको पे।


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