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ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

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केवल आगे बढ़ना है

केवल आगे बढ़ना है

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दो कदम चल कर तो देख

राहें पथिकों से पटी पड़ी हैं।

हो जातीं आसानी से हासिल

मंज़िल मेहनत से जो दूर खड़ी हैं।

जीता जाता युद्ध हौसलों से

चाहें करोड़ों सेना सामने डटी हों।


बनता इतिहास ब मुश्किल मेरे यारों

वो लड़ाई जो बुद्धि से लड़ीं गई हो।

तंग करना तो आदत है नसीबों का लेकिन ...

मेहनत के इबारतों की इमारतें भी कम नहीं है।


पल पल क्षीण हो रहा इस जीवन का

का हर पल।

वो क्षण जो हर पल कहीं ना कहीं

रहीं हैं।

वक्त का रुख़ बदल देते हैं अक्सर

वे लोग होते हैं स्वाभिमानी

पढ़ीं हैं हज़ारों कहिनियां जिनकी

सुना है उनका नाम कइयों की जुबानी।


हमें भी वक्त की राह पर अब चलना होगा।

सूर्य की किरणों को समेटना होगा।

बहुत हुआ अंधकार का खेल

खेल अब जीत वाला खेलना होगा।

सुरते हाल चाहे जैसा भी हो

राहें वफ़ा पर चलना होगा।

केवल आगे बढ़ना होगा।


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