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Hilal Saeed

Abstract


5.0  

Hilal Saeed

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कभी ख्याल से जिसके

कभी ख्याल से जिसके

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कभी खयाल से भी जिसके

शदीद मोहब्बत की हमने हर बार,

अब बात भी हो तो खुद पर

मलाल करता हूं हर बार।


वो ना था कभी मेरा यह

यकीन खुद को दिलाया है,

कुछ इस तरह भी मैंने

मोहब्बत से पीछा छुड़ाया है।


दिल हर दिन हर पल जिसकी

तमन्ना में था मसरूफ रहा,

अब बे-दिली इस कदर है कि

अपनी खवाहिशाैं से रिशता न रहा।


जिसके पल भर भी दूर जाने से

सहम जाता था ये दिल बाखुदा,

आज चाहता है की न याद आये वाे मुझे

उसकाे भी न याद आऊँ में बाखुदा।


एक वाे शख्स जाे हासिल था

फकत उसी की तमन्ना रही मुझकाे,

वाे रूकसत हुआ ऐसे कि फिर

दाेसती मेरे अशंकाे से रही मुझकाे।


वो था जब तो धड़कनें भी

ना थी मेरे बस में,

अब जो नहीं है सुकून में है दिल,

मिला हूं मैं यूं भी खुद से।


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