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parag mehta

Abstract


5.0  

parag mehta

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झिझक

झिझक

1 min 170 1 min 170

दिल मेरा भी धड़कता है ,

पत्थर सा ही सही, पर झिझकता है !


लफ्ज़ यूँ लिखने को हज़ार हैं ,

शौखियों के बाज़ार हैं !


पर कहने की बात जो आये ,

तो फिर ये सारे ही लाचार हैं !


गुरूर नहीं है मुझे कोई ,

बस यह जुबां है कहीं खोयी !


पता नहीं ज़रूरत थी या नहीं ,

पर अब तो चाहत यही सही !


थोड़ा सा विश्वास ले आऊं ,

जो कहना है , वह कह पाऊं !


आजकल पता नहीं किसका शोर है ?

ये ध्यान ज़रूर कहीं तो और है !


पर कभी अगर सुन सको ,

तो फिर गौर से सुन लेना !


कि दिल मेरा भी धड़कता है !

पत्थर सा ही सही , पर यह झिझकता है !!


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