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Abhishu sharma

Abstract

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Abhishu sharma

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जानती है वो

जानती है वो

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चढ़ती-जलती धूप में फुहारों की बौछारों से

 हृदय की चारपाई पर मखमल की चादर बिछा 

घर-आँगन में बिजली-सी गिरती है वो ,की 

थप्पड़ मारकर गले लगाना जानती है वो,

 

पता नहीं क्यों पर ये पत्थर-दिल आज भी मोम सा पिघल जाता है

 सुनकर उसकी सदा, देखकर उसकी ये अदा

इस रंगीन तमाशे का बंदर मैं,

वो ही मेरी मदारी, वो ही मेरी खुदा 

वो ही मेरा मंदिर, मेरे पाप मेरी सज़ा,

 

दर्द की गहन बेलों में उलझी-लिपटी

अपार गहरे जेहन में प्रीत की मिठास घोलकर,  

दिलो-जिगर को अपने गुलाब के काँटों से घायल कर फिर खुद ही उस पर

सहनशीलता की शीतलता में भीगे झिलमिल

इंद्रधनुष के सातों रंगों से चित्रकारी कर

मेरे मन को बहलाना, उससे खेलना जानती है वो।


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