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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

4.5  

Vijay Kumar parashar "साखी"

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ईमानदार अकेला है

ईमानदार अकेला है

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आजकल ईमानदार अकेला है

हर जगह बेईमानों का मेला है

जो करता यहां बात सत्य की

वो सबको लगता,यहां करेला है

जो बोलता है,यहां मीठी वाणी

उसके पीछे चापलूसी झमेला है

जो चलाता,स्वाभिमान थेला है

वो जलता दीप,आज अकेला है

जो करता यहां,झूठ का खेला है

लोगो को लगता,वो अलबेला है

जो ईमानदारी का खाता केला है।

लोग तो समझते उसको हठेला है

जो बात करता ईमानदारी की

लोग कहते उसे भाई सौतेला है

आजकल ईमानदार अकेला है

हर जगह बेईमानों का मेला है

पर कभी नही जीतता अँधेरा है

अंत मे जीतती बस भोर बेला

हैईमानदार तो एक ऐसा रेला है

जो पिघलाता पत्थरों का ठेला है

ईमानदार रहे चाहे अकेला है

पर उसके पास रोशन सवेरा है

वो लम्बी दौड़ का ऐसा घोड़ा है

जो पार करता हर जगत-घेरा है

बेईमानी से मिले कितना पैसा है

अंत में टिकता ईमानदारी मेला है

ईमानदारी एक ऐसा रत्न अकेला है

रवि का भी प्रकाश इससे फैला है।



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