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Navin Madheshiya

Abstract


5.0  

Navin Madheshiya

Abstract


हुई है बरसात फिर भी

हुई है बरसात फिर भी

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हुई है बरसात फिर भी

 मेरा मन जल रहा।


भीगा है मेरा मन

भीगा है मेरा तन

 फिर भी मेरा मन जल रहा

हुई है बरसात फिर भी

 मेरा मन जल रहा।


 भीगा है मेरा बदन

 भीगा है उसका बदन

 भीगे हैं हम दोनों फिर भी

 मेरा मन जल रहा

हुई है बरसात फिर भी

 मेरा मन जल रहा।


 बरसा है बादल भी 

बरसा है नयन भी

 कि दोनों ओर झर बरस रहे

हुई है बरसात फिर भी

 मेरा मन जल रहा।


 कैसे भुला दूं उन पावन रिश्तों को

 जो भीगे हैं इस बरसात में

 मैं उनको समेट रहा

 वो मुझसे फिसल रहे

हुई है बरसात फिर भी

 मेरा मन जल रहा।


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